वैश्विक महायुद्ध संदर्भ भारत,देश में पेट्रोलियम और एलपीजी संकट का भविष्य।अमेरिका इजरायल और ईरान युद्ध की शांति वार्ता विफल होने के पश्चात युद्ध के बदलते परिदृश्य में शांति और युद्ध के बीच की रेखा लगातार सिमटती जा रही है। विशेषकर अमेरिका और ईरान के बीच चल रही शांति वार्ताएँ जितनी आशा जगाती हैं, उतना ही भय भी उत्पन्न करती हैं पहली शांति वार्ता असफल हो चुकी है,एक बार फिर वैश्विक तनाव महायुद्ध की दिशा में बढ़ सकता है। ऐसे में भारत जैसे अन्य और विकासशील देशों के लिए संकट केवल कूटनीतिक या सामरिक नहीं होगा, बल्कि इसका सबसे बड़ा प्रभाव आर्थिक ढांचे और आम जनजीवन पर भी पड़ने की संभावना है विशेषकर पेट्रोलियम और एलपीजी जैसी बुनियादी आवश्यकताओं पर यह वैश्विक महायुद्ध बहुत भारी पड़ सकता है।भारत आज विश्व की सबसे बड़ी जनसंख्या वाले देशों में अग्रणी है। इतनी विशाल आबादी वाले विकराल देश के लिए ऊर्जा की निरंतर आपूर्ति एक बड़ी चुनौती और समस्या हो सकती है। भारत अपनी पेट्रोलियम आवश्यकताओं का लगभग 80-85 प्रतिशत आयात करता है, जिसमें पश्चिम एशिया, विशेषकर ईरान और कतर जैसे पड़ोसी देश की महत्वपूर्ण भूमिका रहती हैं। यदि अमेरिका और ईरान के बीच तनाव फिर से युद्ध का रूप लेता है, तो सबसे पहले तेल आपूर्ति श्रृंखला बाधित होगी। खाड़ी क्षेत्र में किसी भी प्रकार का सैन्य संघर्ष तेल के उत्पादन और परिवहन दोनों को प्रभावित करता है, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें आसमान छूने लगती हैं।read more:
https://worldtrustednews.in/on-march-11th-the-battle-for-cow-protection-will-be-declared-in-lucknow/ ऐसी स्थिति में भारत पर दोहरा दबाव पड़ेगा। एक ओर आयात महंगा होगा, जिससे सरकार का राजकोषीय संतुलन बिगड़ेगा, वहीं दूसरी ओर पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ने से महंगाई की लहर पूरे देश को अपनी चपेट में ले सकती है। परिवहन महंगा होगा, खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ेंगी, और मध्यम व निम्न वर्ग का जीवन और कठिन हो जाएगा। एलपीजी की स्थिति भी इससे अछूती नहीं रहेगी। आज भारत में करोड़ों परिवार खाना पकाने के लिए एलपीजी पर निर्भर हैं। प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना जैसी पहल ने ग्रामीण और गरीब परिवारों को गैस सिलेंडर तक पहुंच तो दी है, लेकिन यदि अंतरराष्ट्रीय संकट के कारण एलपीजी की कीमतें बढ़ती हैं या आपूर्ति बाधित होती है, तो यह योजना भी अपने उद्देश्य से भटक सकती है। गरीब परिवार पुनः लकड़ी और कोयले जैसे पारंपरिक ईंधनों की ओर लौटने को मजबूर हो सकते हैं, जिससे न केवल पर्यावरणीय नुकसान होगा, बल्कि महिलाओं और बच्चों के स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।इस वैश्विक संकट का एक और महत्वपूर्ण पहलू बेरोजगारी से जुड़ा है। जब पेट्रोलियम उत्पाद महंगे होते हैं, तो उद्योगों की लागत बढ़ती है। उत्पादन घटता है, निवेश कम होता है और अंततः रोजगार के अवसर सिकुड़ जाते हैं। भारत पहले से ही बेरोजगारी की चुनौती से जूझ रहा है, ऐसे में यदि ऊर्जा संकट गहराता है, तो यह समस्या और विकराल रूप ले सकती है। छोटे और मध्यम उद्योग, जो देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं, सबसे पहले प्रभावित होंगे।इसके अतिरिक्त, भारत की मुद्रा पर भी दबाव बढ़ेगा। डॉलर के मुकाबले रुपया।के कमजोर होने की आशंका बलवती हो जाएगी , जिससे आयात और महंगा हो जाएगा। विदेशी निवेशकों का विश्वास भी डगमगा सकता है, जिससे पूंजी का पलायन संभव है। यह समग्र आर्थिक अस्थिरता देश को एक गंभीर वित्तीय संकट की ओर धकेल सकती है।read more:
https://worldtrustednews.in/women-and-girls-were-made-aware-under-the-mission-shakti-campaign/ ऐसे चुनौतीपूर्ण समय में भारत के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह होगा कि वह इस संकट का सामना कैसे करे। केवल वैश्विक घटनाओं पर निर्भर रहना अब पर्याप्त नहीं है। भारत को अपनी ऊर्जा नीति में आत्मनिर्भरता की दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे। नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों जैसे सौर, पवन और जैव ऊर्जा को बढ़ावा देना समय की मांग है। इसके साथ ही रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार को मजबूत करना और वैकल्पिक आपूर्ति स्रोतों की तलाश भी आवश्यक है।साथ ही, सरकार को जनसंख्या नियंत्रण, रोजगार सृजन और आर्थिक सुधारों पर भी गंभीरता से काम करना होगा। क्योंकि जब तक देश की आंतरिक संरचना मजबूत नहीं होगी, तब तक बाहरी संकटों का प्रभाव और अधिक घातक होता रहेगा।अंततः यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि यदि अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध की स्थिति पुनः उत्पन्न होती है, तो भारत के लिए यह केवल एक अंतरराष्ट्रीय घटना नहीं होगी, बल्कि यह एक घरेलू संकट का रूप ले लेगी। पेट्रोलियम और एलपीजी की समस्या केवल ऊर्जा का प्रश्न नहीं रहेगा, बल्कि यह आम आदमी की रसोई, उसके रोजगार और उसके जीवन स्तर को सीधे प्रभावित करेगा।आज आवश्यकता है दूरदर्शिता की, संतुलित कूटनीति की और ठोस नीतिगत निर्णयों की। क्योंकि आने वाला समय केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक और मानवीय संकटों की भी परीक्षा लेने वाला हो सकता है। यदि भारत ने अभी से तैयारी नहीं की, तो यह संभावित संकट वास्तव में एक विकराल रूप ले सकता हैजिसका खामियाजा आने वाली पीढ़ियों को भुगतना पड़ेगा।
संजीव ठाकुर,वरिष्ठ पत्रकार,लेखक, चिंतक,स्तंभकार, रायपुर, छत्तीसगढ़, 9009 415 415,
कविता,
संजीव-नी
नन्हे सपनों का धीमा उजाला।
कभी देखा आपने
एक बच्चे की आँख
में ठहरा हुआ आकाश
वह बहुत नन्हा सा,
पर उसमें बादल
पूरे-पूरे तैरते ।
नन्हे हाथों की
जब वह अपनी
उँगलियाँ फ़ैलाएकता
तो लगता
वह आकाश समेट लेना चाहता
धीरे से बिना गिराए,बिना हिलाये,
पर दुनिया को जल्दी होती
वह बच्चों के सपनों को
समझने से पहले ही
उन्हें समझदार बना देती।
एक बच्चा
जो रंगों से खेलना चाहता ,
हमने सिखा दिया
रंगों की कीमत,
जो मिट्टी में घरौंदे बनाता
उसे बता दिया
घर सिर्फ ईंटों से बनते ,
और जो चुपचाप
आसमान को ताकता देर तक,
उससे कहा गया
आसमान खाली है,
कभी लगता
सपने टूटते नहीं
बस धीरे-धीरे
दरक जाते
और फिर
अपने ही भीतर बस जाते ।
नन्हे बच्चों के सपने
बहुत हल्के होते
इतने कि
एक कठोर शब्द भी
उन्हें मुरझा देते ।
वे पूछते नहीं
बस महसूसते
कि कुछ बदल गया,
कुछ जो उनका,
उतना उनका नहीं रहा,
फिर भी,
किसी कोने में
वे एक छोटा-सा सपना संजों लेते,
जैसे कोई दीपक
हवा से बचाकर संजोता
चंद उजास के कतरे,
उसी छोटे से सपने में
अब भी एक पूरा संसार रहता ,
और एक बच्चा
धीरे-धीरे
उसे फिर से
अपनी आँखों में उगाने की कोशिश करता है।
क्योंकि
बच्चे हारते नही
वे बस
थोड़ी देर शांत हो जाते ।