वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी सिलिया फ़्लोरेस को अमेरिकी सेना द्वारा चलाए गए ऑपरेशन एब्सोल्यूट रिसॉल्व नामक एक सैन्य अभियान के दौरान गत 3 जनवरी, 2026 को वेनेज़ुएला की राजधानी काराकास से हिरासत में ले लिया गया था। इस समय वे न्यूयॉर्क की एक फ़ेडरल जेल में हिरासत में हैं। अमेरिकी न्याय विभाग का आरोप है कि मादुरो ने कोलंबिया के विद्रोही समूह एफ़ ए आर सी और लैटिन अमेरिका के बड़े ड्रग कार्टेल्स के साथ मिलकर पिछले दो दशकों से अमेरिका में भारी मात्रा में कोकीन भेजने की साज़िश रची। अमेरिकी पक्ष का कहना है कि वेनेज़ुएला के शीर्ष अधिकारियों ने पैसों और सत्ता के लालच में ड्रग तस्करों को सुरक्षा प्रदान की। उधर अंतरराष्ट्रीय ख़ुफ़िया डेटा और ख़ुद अमेरिकी एजेंसियों की कुछ रिपोर्ट्स दर्शाती हैं कि वेनेज़ुएला दुनिया का मुख्य ड्रग उत्पादक देश नहीं है। इसके अलावा, ट्रम्प प्रशासन ने मादुरो को ‘ट्रेन दे एरागुआ’ जैसे आपराधिक गिरोहों से भी जोड़ने की कोशिश की, लेकिन अमेरिकी ख़ुफ़िया एजेंसियों को इसके भी पुख़्ता सबूत नहीं मिले। निकोलस मादुरो ने भी अमेरिकी अदालत में ख़ुद को निर्दोष बताते हुए इन सभी आरोपों को सिरे से ख़ारिज किया है। रूस और चीन जैसे मादुरो समर्थक कई देशों का मानना है कि यह आरोप पूरी तरह से “राजनीतिक हथियार” और एक बहाना हैं। दरअसल अमेरिका का असली मक़सद वेनेज़ुएला में सत्ता परिवर्तन कर अपनी पिट्ठू सरकार बनाकर वहां के दुनिया के सबसे बड़े तेल भंडारों पर अमेरिकी कंपनियों का नियंत्रण स्थापित करना था। ख़ुद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने मादुरो की गिरफ़्तारी के बाद यह बयान भी दिया था कि अमेरिका अब वेनेज़ुएला को चलाएगा और तेल संसाधनों पर ध्यान देगा। अमेरिकी अदालत में मादुरो का मुक़दमा भी 1 जून, 2027 से शुरू होने जा रहा है।परन्तु यह स्पष्ट है कि अमेरिका ने गंभीर आपराधिक और ड्रग्स के आरोपों को आधार बनाकर ही इस बड़े सैन्य हस्तक्षेप और वेनेज़ुएला के राजनीतिक तख़्तापलट को अंजाम दिया।इसके बाद इसी वर्ष 2026 में अमेरिका ने वेनेज़ुएला के कच्चे तेल के शिपमेंट और वित्तीय संपत्तियों पर सीधे तौर पर नियंत्रण हासिल किया है। जनवरी से अब तक अमेरिका ने स्किपर, मैरिनेरा, और बर्था जैसे वेनेज़ुएला से जुड़े कई तेल टैंकरों को समुद्र में प्रतिबंधित कर ज़ब्त किया जिनमें से अकेले ‘बर्था’ टैंकर में 19 लाख बैरल और ‘मैरिनेरा’ आदि से क़रीब 20 लाख बैरल तेल ज़ब्त किया गया।
read more:https://pahaltoday.com/demand-to-remove-government-country-liquor-shop-villagers-stage-protest-at-the-collectorate/#google_vignetteएक वित्तीय विश्लेषण के अनुसार, अमेरिका ने वेनेज़ुएला के तेल निर्यात पर नियंत्रण करके इस साल 13 अरब डॉलर से अधिक की नक़द राशि अमेरिकी खातों में जमा की है, जिसे अमेरिकी ट्रेज़री विभाग द्वारा मॉनिटर किया जा रहा है। गोया अमेरिका ने अब तक भौतिक रूप से करोड़ों बैरल निकाला हुआ तेल और 13 अरब डॉलर का कैश राजस्व अपने नियंत्रण में लिया है और काग़ज़ी व रणनीतिक तौर पर वेनेज़ुएला की ज़मीन के नीचे मौजूद 65 अरब बैरल के विशाल तेल भंडार के संचालन और दोहन का क़ानूनी अधिकार हासिल कर लिया है। ग़ौरतलब है कि वेनेज़ुएला के पास लगभग 303 अरब बैरल का दुनिया का सबसे बड़ा प्रमाणित कच्चा तेल भंडार है। और अमेरिका ने इसके लगभग पांचवें हिस्से पर नियंत्रण पा लिया है। यह 65 अरब बैरल का आंकड़ा कितना विशाल है, इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यह अमेरिका के 46 अरब बैरल के अपने कुल तेल भंडारसे भी कहीं अधिक है। और यदि इसे भारत के संदर्भ में देखें तो यह भारत की लगभग 40 वर्षों के तेल आयात के बराबर है। ठीक इसी तर्ज़ पर अमेरिका ईरान में भी तेल की लूट करना चाह रहा है। ईरान के पास लगभग 208 से 209 अरब बैरल का प्रमाणित तेल भंडार है। इस भंडार के साथ ईरान वैश्विक स्तर पर तीसरे स्थान पर आता है। इसी तेल भंडार पर क़ब्ज़ा जमाने के लिये अमेरिका कभी ईरान में सत्ता विरोधी विद्रोह का फ़साना गढ़ता है तो कभी वर्तमान सत्ता को आतंकवादियों को बढ़ावा देने वाली सत्ता बताता है। और जब इन चालों व साज़िशों से भी बात नहीं बनती तो इस्राईल व अमेरिका मिलकर ईरान पर अकारण आक्रमण कर देते हैं। परन्तु ईरानी हुक्मरान पिछले 4 दशकों से अमेरिका की इस चाल से भली भांति वाक़िफ़ हैं कि वह ईरान में एक बार फिर से वहां के पूर्व शासक रज़ा शाह पहेलवी की ही तरह अपनी कठपुतली सरकार बनाकर बिठाना चाहता है। ठीक उसी तरह जैसे सऊदी अरब सहित अन्य कई खाड़ी देशों में उसके इशारों पर चलने वाले शासक सत्तासीन हैं और लगभग वे सभी अमेरिका को न केवल उसकी मर्ज़ी के अनुसार उसे तेल निर्यात कर रहे हैं बल्कि अपने अपने देशों की सुरक्षा के नाम पर अमेरिका से हथियार भी ख़रीदते रहते हैं। इतना ही नहीं बल्कि ऐसे देशों को अमेरिका ने उनकी सुरक्षा का भी भरोसा दिलाया है। जिस भरोसे को ईरान ने पिछले दिनों उस समय चकनाचूर कर के रख दिया जबकि ईरान ने पिछले दिनों हुये युद्ध के दौरान मध्य एशियाई देशों में मौजूद कई अमेरिकी सैन्य ठिकानों को ही तबाह कर डाला। मध्य पूर्व के खाड़ी देशों में सऊदी अरब पारंपरिक रूप से अमेरिका को तेल निर्यात करने वाला सबसे प्रमुख मुस्लिम देश है।अमेरिकी रिफ़ाइनरियों के लिए सऊदी अरब भारी कच्चे तेल का एक महत्वपूर्ण स्रोत बना हुआ है। सऊदी अरब के बाद खाड़ी देशों में इराक़, अमेरिका को कच्चा तेल निर्यात करने वाला दूसरा सबसे बड़ा मुस्लिम देश है। कुवैत भी अमेरिकी रिफ़ाइनरियों को अपनी तेल आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए लगातार कच्चे तेल की आपूर्ति करता है।संयुक्त अरब अमीरात अथवा यूएई भी समय-समय पर अमेरिकी बाज़ारों में कच्चा तेल और परिष्कृत पेट्रोलियम उत्पाद भेजता है। इसके अलावा अफ़्रीकी मुस्लिम बहुल देशों में लीबिया से भी अमेरिका हाल के वर्षों में अच्छी मात्रा में कच्चा तेल आयात करता रहा है। इसी तरह नाइजीरिया का ‘स्वीट क्रूड’ यानी कम सल्फ़र वाला तेल अमेरिकी बाज़ार में निर्यात किया जाता है। उत्तरी अफ़्रीक़ी देश अल्जीरिया भी अमेरिका को कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों की आपूर्ति करता है। और इस तरह वैश्विक स्तर पर तेल दोहन के परिणाम स्वरूप पिछले कुछ वर्षों में अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा तेल उत्पादक देश बन चुका है। इस वजह से मध्य पूर्व और ओपेक देशों से अमेरिका की तेल निर्भरता काफ़ी घट गई है। अमेरिका अपनी ज़रूरत का सबसे बड़ा हिस्सा अब ओपेक देशों के बजाय अपने पड़ोसी देश कनाडा और मैक्सिको से आयात करता है। हाँ कुछ अमेरिकी क़ानून और प्रतिबंधों की वजह से और ख़ासकर अमेरिका की कठपुतली सत्ता न होने की वजह से भी ईरान जैसे देश से अमेरिका कच्चा तेल आयात नहीं कर पाता। इसलिये अमेरिका को तेल उत्पादक देशों में अपनी पिट्ठू सरकार चाहिये ताकि अपनी मर्ज़ी व अपनी सुविधानुसार मनमाने तरीक़े से विश्व के तेल भंडारों पर अपना नियंत्रण क़ायम किया जा सके ? संपर्क 9896219228
तनवीर जाफ़री