पुस्तकालय की पुरानी किताब

नगर पालिका के पुराने केंद्रीय पुस्तकालय के बाहर कंक्रीट की टूटी सीढ़ियों पर पचहत्तर साल के हरिशंकर जी हर दोपहर ठीक एक बजे अपनी लाठी टेकते हुए आकर बैठ जाते थे। उनके कांपते हाथों में जिल्द चढ़ी एक पुरानी मोटी किताब रहती थी जिसका पहला पन्ना बड़ी बेरहमी से बीच से फाड़कर अलग कर दिया गया था। पुस्तकालय का नया क्लर्क जब भी उन्हें उस फटे पन्ने वाली किताब को अपनी धोती के छोर से बार-बार पोंछते देखता तो चाय का कुल्हड़ मेज़ पर रखते हुए ठहाका लगाकर कहता कि “बाबा जब इस पूरी लाइब्रेरी का डिजिटलीकरण हो चुका है और सारे ग्रंथ कंप्यूटर की स्क्रीन पर मौजूद हैं तो इस आधी फटी किताब को रोज़ अपनी छाती से चिपकाकर यहाँ अफ़सरों के आगे नुमाइश क्यों लगाते हो।” हरिशंकर जी अपनी पुरानी धुंधली ऐनक को ठीक करते और बहुत धीमी आवाज में मुस्कुराकर कहते कि “बेटा यह फटा हुआ कागज़ केवल बेजान जिल्द नहीं है बल्कि इस पूरे महकमे की वो कड़वी सच्चाई है जिसे तुम्हारे ये चमचमाते कंप्यूटर कभी नहीं दिखा पाएंगे।” आसपास खड़े तमाम मुंशी और शोधार्थी उनका उपहास उड़ाते हुए कहते कि “लगता है इस बुढ़ापे में मासाब की मति मारी गई है जो एक फटी किताब को अपनी ढाल बनाकर पूरे साहित्य और संस्कृति विभाग से उलझने चले आए हैं।” हरिशंकर जी किसी की बात का तनिक भी बुरा माने बिना उस किताब की फटी हुई कोर को अपनी कांपती उंगलियों से सहलाते और चुपचाप गाड़ियों के आने का इंतज़ार करते रहते थे।पुस्तकालय के सभी कर्मचारी हरिशंकर जी की इस मूक उपस्थिति से पूरी तरह वाकिफ थे और उन्हें एक सनकी रिटायर्ड शिक्षक मानकर पूरी तरह अनदेखा कर देते थे। दफ्तर का बड़ा बाबू जब भी नई किताबों की खरीद का बिल लेकर मुख्य अधिकारी के केबिन की तरफ बढ़ता तो हरिशंकर जी बहुत उम्मीद से अपनी लाठी के सहारे खड़े हो जाते और हाथ जोड़कर कहते कि “बाबू जी क्या आज उस राष्ट्रीय लेखक सम्मान और पेंशन वाले कागज़ पर साहब के दस्तखत हो गए।” बाबू गुस्से में फाइलें पटकते हुए डांटकर कहता कि “अरे बाबा जब तक डिजिटल पोर्टल पर तुम्हारी रचना का ऑनलाइन प्रमाण नहीं दिखेगा तब तक कागज़ आगे नहीं बढ़ेगा और तुम इस कबाड़ की किताब को लेकर ताउम्र यहाँ चक्कर काटते रहोगे।” हरिशंकर जी बिना किसी प्रतिवाद के वापस अपनी जगह पर जाकर बैठ जाते और उस किताब के फटे हुए पन्ने की जगह खाली धागों को अपनी हथेली से छूने का निरर्थक प्रयास करने लगते थे जो हर बार उनकी उंगलियों में चुभ जाते थे। कस्बे के लोग आपस में तरह-तरह की बातें करते थे कि शायद बाबा अपने किसी पुराने भत्ते के लिए यह सब कर रहे हैं लेकिन किसी को भी उस फटी किताब और पुस्तकालय के बड़े-बड़े दावों के बीच छुपे भयानक रहस्य की ज़रा सी भी भनक नहीं थी।read more:https://pahaltoday.com/villagers-upset-over-garbage-dumping-staged-a-protest-at-the-district-collectorate/दोपहर में अचानक संस्कृति मंत्रालय के प्रमुख सचिव महोदय राष्ट्रीय भाषा और पुस्तकालय उन्नयन सप्ताह के उपलक्ष्य में आयोजित भव्य समारोह का निरीक्षण करने पहुँचे। साहब की गाड़ी का सायरन बजते ही पूरे परिसर में खलबली मच गई और आनन-फानन में स्वागत के लिए लाल कालीन बिछाया जाने लगा ताकि कोई कमी न दिखाई दे। मंच पर नई डिजिटल लाइब्रेरी का लोकार्पण करने और साहित्यकारों के कल्याण पर लंबा भाषण देने के बाद जब सचिव महोदय पत्रकारों की भीड़ के साथ बाहर निकले तो उनकी नज़र चबूतरे पर शांत बैठे हरिशंकर जी पर पड़ी जिनकी गोद में वही फटी हुई किताब रखी थी। अपनी जनप्रिय और संवेदनशील छवि का प्रदर्शन करने के लिए सचिव महोदय तुरंत मीडिया कर्मियों को साथ लेकर हरिशंकर जी के पास पहुँचे और बड़े आदर से बोले कि “बाबा आज के इस पावन दिन पर हम आप जैसे विद्वान बुजुर्गों को नमन करते हैं बताइए आपकी क्या पीड़ा है क्या आपको साहित्यकार पेंशन योजना का लाभ नहीं मिल रहा है।” हरिशंकर जी ने अपनी सूजी हुई आँखों से सचिव महोदय को देखा और अपने कांपते हाथों से वह फटी किताब आगे बढ़ाते हुए बोले कि “साहब जी अगर वाकई न्याय करना चाहते हैं तो ज़रा इस किताब के फाड़े गए पन्ने की बची हुई मुहर को अपने हाथों से छूकर इसका सच पहचान लीजिए।”सचिव महोदय ने जब उस किताब की जिल्द के भीतर चिपकी सरकारी खरीद की मुहर को गौर से देखा तो उनके चेहरे का रंग पूरी तरह उड़ गया और हाथ कांपने लगे क्योंकि उस पर हरिशंकर जी का ही नाम बतौर लेखक दर्ज था। हरिशंकर जी की आँखों से आंसुओं के दो मोटे कतरे ढलककर उस फटे पन्ने के धागों पर गिर पड़े और वे रुंधे गले से बोले कि “साहब चालीस साल पहले जब मैंने अपनी पूरी ज़िंदगी की साधना से यह मौलिक शोधग्रंथ लिखा था तो इस दफ़्तर के बड़े अफ़सर ने मेरा पहला पन्ना फाड़कर उस पर अपना नाम चिपका दिया और मुझे गुमनाम करके सारे राष्ट्रीय पुरस्कार और पदोन्नतियाँ खुद हड़प लीं। आज आपकी कंप्यूटर प्रणाली कहती है कि इस किताब का असली लेखक मैं नहीं बल्कि वो भ्रष्ट अफ़सर था जिसकी तस्वीर आपके मुख्य द्वार पर टंगी है। मैं रोज़ यह आधी फटी किताब यहाँ इसलिए लाता हूँ ताकि आपके इस तंत्र को बता सकूँ कि जिस व्यवस्था पर तुम गर्व करते हो उसने एक गरीब शिक्षक की आत्मा और पहचान को जिंदा नोचकर अपनी दीवारों पर सजा लिया है।” यह सुनते ही सचिव महोदय का सिर शर्म से झुक गया और पूरा पुस्तकालय परिसर गहरे सन्नाटे में डूब गया।

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