स्वतंत्रता सेनानी रामादादा: जिन्होंने देश की आज़ादी के लिए सब कुछ न्योछावर किया, लेकिन कभी नहीं मांगा कोई सम्मान

गाजीपुर। नंदगंज और गाजीपुर की धरती हमेशा से वीरों और बलिदानियों की भूमि रही है। यहां के सपूतों ने भारत की आज़ादी से लेकर देश की सीमाओं की रक्षा तक हर मोर्चे पर अपने साहस का परिचय दिया। ऐसे ही महान स्वतंत्रता सेनानियों में कटघरा गांव के अमर क्रांतिकारी स्वर्गीय रामादादा का नाम बड़े सम्मान और श्रद्धा के साथ लिया जाता है।सन 1895 में शादियाबाद थाना क्षेत्र के कटघरा गांव में एक प्रतिष्ठित राजपूत परिवार में जन्मे रामादादा बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि और नेतृत्व क्षमता के धनी थे। उनके पिता स्वर्गीय खेदू सिंह उस समय के जमींदार थे और परिवार की समाज में विशेष प्रतिष्ठा थी।गांव के 92 वर्षीय जगदीश बिंद बताते हैं कि रामादादा युवावस्था में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) से जुड़े और जिला सचिव के पद तक पहुंचे। अंग्रेजी हुकूमत के दौर में जब लोग अंग्रेज अधिकारियों और पुलिस से भयभीत रहते थे, तब रामादादा निर्भीक होकर अन्याय का विरोध करते थे।एक बार कटघरा पूरबपट्टी में स्वर्गीय सहदेव सिंह और स्वर्गीय रामचरितर सिंह के साथ बैठे रामादादा के सामने तत्कालीन शादियाबाद थानेदार इस्माइल खां कुछ सिपाहियों के साथ पहुंचा और क्रांतिकारियों को पकड़ने लगा। यह देखकर रामादादा ने उसका डटकर विरोध किया, उसे घोड़े से नीचे खींच लिया और थप्पड़ जड़ दिए। किसी तरह थानेदार अपनी जान बचाकर वहां से भाग निकला। यह घटना क्षेत्र में रामादादा के अदम्य साहस का प्रतीक बन गई।read more:https://khabarentertainment.in/meritorious-students-honored-at-klgm-inter-college-incentive-amount-of-%e2%82%b961000-distributed/रामादादा गरम दल के क्रांतिकारियों के समर्थक थे और भारत छोड़ो आंदोलन में उन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई। 15 अगस्त 1942 को शादियाबाद थाने पर हुए ऐतिहासिक हमले में वे अग्रिम पंक्ति में रहे, जहां क्रांतिकारियों ने थाने में आग लगा दी, ब्रिटिश झंडा उतार फेंका और अंग्रेजी शासन को खुली चुनौती दी। इसके बाद 18 अगस्त 1942 को नंदगंज में ट्रेन से विदेशी सामान लूटकर जलाने की ऐतिहासिक घटना में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही।इन घटनाओं के बाद रामादादा सहित अनेक स्वतंत्रता सेनानियों को जेल की सजा हुई। हालांकि, इन आंदोलनों के प्रभाव से लगभग 15 दिनों तक यह पूरा क्षेत्र अंग्रेजी शासन से मुक्त रहा।देश आज़ाद होने के बाद सरकार ने उनके योगदान के सम्मान में स्वतंत्रता सेनानी पेंशन और नैनीताल में जमीन देने की पेशकश की, लेकिन रामादादा ने इसे स्वीकार करने से इनकार कर दिया। उनका मानना था कि मातृभूमि की सेवा किसी पुरस्कार या लाभ के लिए नहीं, बल्कि राष्ट्रधर्म के लिए की जाती है।9 फरवरी 1965 को रामादादा का निधन हो गया। उनके निधन के बाद वरिष्ठ नेता स्वर्गीय सरजू पांडेय ने उनकी स्मृति में एक स्वतंत्रता सेनानी स्मारक स्तंभ बनवाकर स्वयं कटघरा गांव में स्थापित कराया। आज भी प्रत्येक 15 अगस्त को क्षेत्रवासी वहां तिरंगा फहराकर और पुष्पांजलि अर्पित कर इस महान स्वतंत्रता सेनानी को श्रद्धांजलि देते हैं।रामादादा का जीवन त्याग, साहस, राष्ट्रभक्ति और निस्वार्थ सेवा का अद्भुत उदाहरण है। गाजीपुर की जनता आज भी उनकी वीरगाथा को गर्व के साथ याद करती है और आने वाली पीढ़ियों को उनके आदर्शों से प्रेरणा लेने का संदेश देती है।

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