संसद के सत्र बाधित होने से एक दशक में जनता के 3300 करोड़ रुपए बर्बाद

संसद वह स्थान है जहाँ 140 करोड़ नागरिकों के भविष्य, उनके अधिकारों, करदाताओं के पैसे के सदुपयोग तथा देश के लिए नए कानून बनाने जैसे विषयों पर चर्चा और निर्णय होते हैं। लेकिन पिछले एक दशक से देश की संसद न्याय और नीतियों के निर्माण का मंच बनने के बजाय विरोध, शोर-शराबा, बैनर दिखाने, हंगामा करने और सदन स्थगित कराने की राजनीति का अखाड़ा बनती जा रही है। संसद के इतिहास में सबसे कम उत्पादक बजट सत्र वर्ष 2018 में दर्ज किया गया था। उस समय 29 बैठकों में लोकसभा केवल 34 घंटे चली थी और 127 घंटे से अधिक समय हंगामे में व्यर्थ चला गया था। इसके कारण जनता के लगभग 198 करोड़ रुपये पानी में चले गए थे। वर्ष 2023 में अडाणी-हिंडनबर्ग मुद्दे पर हुए हंगामे के कारण पूरे सत्र में केवल 5 प्रतिशत काम हो सका और जनता के लगभग 200 करोड़ रुपये व्यर्थ खर्च हुए। लोगों की मांग है कि सामान्य कर्मचारियों की तरह सांसदों पर भी कड़े नियम लागू किए जाएँ। यदि सांसदों के विरोध के कारण संसद नहीं चलती है तो उसअवधि का उनका दैनिक भत्ता और वेतन काटा जाना चाहिए तथा उन पर भी “नो वर्क, नो पे” का नियम लागू होना चाहिए।संसद का मानसून सत्र शुरू हुए पांच दिन हो चुके हैं, लेकिन एक भी दिन सदन में कोई काम नहीं हो पाया। लगातार बढ़ते विरोध, विपक्ष के हंगामे और नारेबाजी के कारण मानसून सत्र ठप पड़ा है। शुक्रवार को कार्यवाही शुरू करने का प्रयास किया गया, लेकिन स्थिति सामान्य नहीं हो सकी और सदन की कार्यवाही सोमवार तक के लिए स्थगित करनी पड़ी। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत के लिए यह अत्यंत शर्मनाक स्थिति है कि सांसद ही संसद की कार्यवाही नहीं चलने देते। 1.40 अरब नागरिक विश्वास और आशा के साथ इन नेताओं को अपना प्रतिनिधि चुनकर संसद भेजते हैं, लेकिन सांसद आपसी सौदेबाजी, खरीद फरोख्त और राजनीतिक नाटकबाजी से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं। परिणामस्वरूप जनता के पैसे की बर्बादी होती है और उसके विश्वास पर बारबार पानी फिर जाता है।लोकतंत्र का सबसे पवित्र स्तंभ देश की संसद है। संसद वह स्थान है, जहां 140 करोड़ नागरिकों के भविष्य, उनके अधिकारों, करदाताओं के धन के सदुपयोग और नए कानूनों पर विचार विमर्श होता है। लेकिन पिछले एक दशक से संसद नीति निर्माण के बजाय विरोध, शोरशराबा, बैनर प्रदर्शन, हंगामे और सदन स्थगित कराने की राजनीति का केंद्र बन गई है। जनता अपनी मेहनत की कमाई से कर इसलिए देती है, ताकि देश की व्यवस्था सुचारु रूप से चल सके। लेकिन जब लोकसभा और राज्यसभा में बिना एक भी घंटे काम किए केवल नारेबाजी और हंगामे के कारण कार्यवाही स्थगित कर दी जाती है, तब हर मिनट जनता के लाखों रुपए बर्बाद हो जाते हैं।read more:https://khabarentertainment.in/509-vidyut-sakhis-in-bijnor-receive-thermal-printers-instant-electricity-bill-receipts-will-now-be-available-at-doorsteps/ एक रिपोर्ट के अनुसार, पिछले दस वर्षों में सांसदों के विरोध, हंगामे और राजनीतिक टकराव के कारण संसद बारबार स्थगित हुई और करदाताओं के लगभग 3300 करोड़ रुपए व्यर्थ चले गए।चिंता की बात यह है कि अब अनेक सांसद नैतिकता को भी भूलते जा रहे हैं। सत्ता में बने रहने या सत्ता प्राप्त करने के लिए कई लोग अपनी कीमत लगाने लगे हैं। अवसर आने पर सांसदों की खरीद फरोख्त और दलबदल की घटनाएं भी सामने आती रही हैं। सत्ता की इस राजनीति में जनता का हित कहीं पीछे छूट गया है। संसद की कार्यवाही के दौरान विरोध प्रदर्शन और जनता के मुद्दों की उपेक्षा आम बात बन गई है। हर वर्ष सांसदों पर करोड़ों रुपए खर्च किए जाते हैं, लेकिन उसका अपेक्षित परिणाम दिखाई नहीं देता।उल्लेखनीय है कि संसद भवन का संचालन केवल सांसदों के वेतन तक सीमित नहीं है। इस विशाल परिसर को चलाने के लिए आधुनिक तकनीक, सुरक्षा व्यवस्था, कर्मचारियों के वेतन, सांसदों के भत्ते, मुद्रण, बिजली तथा अन्य व्यवस्थाओं पर भारी खर्च होता है। एक रिपोर्ट के अनुसार, लोकसभा और राज्यसभा दोनों सदनों को चलाने का अनुमानित खर्च प्रति मिनट लगभग 2.50 लाख रुपए है। इस प्रकार संसद चलाने का खर्च प्रति घंटे लगभग 1.5 करोड़ रुपए तक पहुंच जाता है। सामान्यतः संसद प्रतिदिन छह घंटे चलती है। यदि दोनों सदन सुचारु रूप से चलें तो प्रतिदिन का संचालन खर्च लगभग 8 से 9 करोड़ रुपए होता है।चिंताजनक तथ्य यह है कि केवल कुछ घंटे या कुछ दिन ही नहीं, बल्कि पूरे वर्ष में संसद जितनी चलती है, उसके मुकाबले व्यर्थ जाने वाले समय का आंकड़ा लगातार बढ़ता जा रहा है। भारत में सामान्यतः वर्ष में तीन सत्र होते हैं, बजट सत्र, मानसून सत्र और शीतकालीन सत्र। सामान्यतः संसद वर्ष में केवल 70 से 80 दिन ही काम करती है। संसद सचिवालय, सांसदों के वेतन, पेंशन, भत्ते, यात्रा व्यय तथा रखरखाव एवं बुनियादी ढांचे पर होने वाले खर्च को जोड़ें तो संसद पर हर वर्ष हजारों करोड़ रुपए खर्च किए जाते हैं।बजट सत्र वर्ष का सबसे महत्वपूर्ण सत्र माना जाता है। लेकिन हाल के एक बजट सत्र में लोकसभा में विरोध और स्थगन के कारण 20 से 25 घंटे का समय नष्ट हो गया, जबकि राज्यसभा में भी 12 से 15 घंटे की कार्यवाही बाधित रही। केवल इस एक सत्र में हुए विरोध प्रदर्शनों से देश को 57 करोड़ रुपए से अधिक का नुकसान हुआ।
संसद के इतिहास का सबसे कम उत्पादक बजट सत्र वर्ष 2018 में रहा। उस समय 29 बैठकों में लोकसभा केवल 34 घंटे चली और 127 घंटे से अधिक समय हंगामे की भेंट चढ़ गया। इसके कारण जनता के लगभग 198 करोड़ रुपए व्यर्थ चले गए।
यदि इतिहास पर नजर डालें तो कई ऐसे सत्र रहे हैं, जिनमें हंगामे के अलावा कुछ नहीं हुआ। वर्ष 2021 में पेगासस जासूसी विवाद और किसान आंदोलन के कारण संसद का अधिकांश समय बाधित रहा। लगातार विरोध के कारण लोकसभा की उत्पादकता केवल 21 प्रतिशत और राज्यसभा की 28 प्रतिशत रही। दोनों सदनों के लगभग 150 घंटे से अधिक समय की बर्बादी हुई और करदाताओं को लगभग 133 करोड़ रुपए का आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा।इसी प्रकार वर्ष 2023 में अडाणी-हिंडनबर्ग रिपोर्ट पर हुए विवाद के कारण बजट सत्र का दूसरा चरण लगभग ठप हो गया। विपक्ष संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) से जांच की मांग कर रहा था, जबकि सत्तापक्ष राहुल गांधी के विदेशी बयान पर माफी की मांग कर रहा था। परिणामस्वरूप लोकसभा में केवल 5 प्रतिशत और राज्यसभा में 6 प्रतिशत कार्य ही हो सका। इस कारण जनता के लगभग 180 से 200 करोड़ रुपए व्यर्थ खर्च हुए।वर्ष 2023 के शीतकालीन सत्र में संसद की सुरक्षा में हुई चूक और सदन के भीतर स्मोक बम लेकर घुसने की घटना को लेकर भी बड़ा विवाद हुआ। गृह मंत्री के बयान की मांग को लेकर व्यापक विरोध हुआ और लोकसभा तथा राज्यसभा से 146 सांसदों को निलंबित किया गया। भारतीय संसदीय इतिहास में यह एक बड़ा निर्णय था। उस समय भी अधिकांश कार्यवाही बाधित रही और लगभग 150 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ।वर्ष 2024 में नीट परीक्षा पेपर लीक और मणिपुर हिंसा के मुद्दे संसद में छाए रहे। विपक्ष के विरोध के कारण दोनों सदनों का अधिकांश समय हंगामे में बीता और जनता के लगभग 100 करोड़ रुपए व्यर्थ चले गए।पिछले वर्ष के मानसून सत्र में भी लोकसभा में देशहित के मुद्दों पर 120 घंटे चर्चा होनी थी, लेकिन केवल 37 घंटे ही काम हुआ। 83 घंटे व्यर्थ चले गए। अर्थात केवल 31 प्रतिशत काम हुआ और 69 प्रतिशत समय हंगामे में नष्ट हो गया। राज्यसभा में भी 120 घंटे के निर्धारित समय में केवल 47 घंटे कार्य हुआ, जबकि 73 घंटे व्यर्थ गए। वहाँ भी केवल 38 प्रतिशत काम हो सका और 62 प्रतिशत समय जनता के हित में उपयोग नहीं किया गया। इस कारण जनता के लगभग 204 करोड़ रुपए बर्बाद हो गए।जानकारों का कहना है कि संसद चले या न चले, सांसदों की सुविधाओं पर कोई असर नहीं पड़ता। उनके वेतन में एक पैसा भी कटौती नहीं होती। भत्ते और अन्य सुविधाएं भी यथावत मिलती रहती हैं। एक सांसद को प्रतिमाह लगभग 2.86 लाख रुपए का वेतन मिलता है। इसके अतिरिक्त उन्हें वर्ष में 34 घरेलू हवाई यात्राएं निःशुल्क मिलती हैं। देश की किसी भी ट्रेन में प्रथम श्रेणी में मुफ्त यात्रा की सुविधा उपलब्ध होती है और यह सुविधा उनके परिवार को भी दी जाती है। इसके अलावा प्रतिवर्ष 50,000 यूनिट मुफ्त बिजली तथा 4,000 किलोलीटर मुफ्त पानी मिलता है। सांसदों और उनके परिवारों को सर्वोत्तम सरकारी चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराई जाती हैं। कार्यकाल के दौरान उन्हें किरायामुक्त सरकारी आवास मिलता है। संसद सत्र के दौरान प्रतिदिन 2,500 रुपए का परिवहन भत्ता भी दिया जाता है।इसके अतिरिक्त प्रत्येक सांसद को अपने संसदीय क्षेत्र के विकास के लिए प्रतिवर्ष लगभग 5 करोड़ रुपए तक की राशि उपलब्ध कराई जाती है, जिसके उपयोग को लेकर भी समय-समय पर शिकायतें सामने आती रही हैं।लोगों की मांग है कि सामान्य कर्मचारियों की तरह सांसदों के लिए भी कठोर नियम बनाए जाएं। यदि उनके विरोध के कारण संसद की कार्यवाही बाधित होती है तो उस अवधि का उनका दैनिक भत्ता और वेतन काटा जाए तथा ‘नो वर्क, नो पे’ का सिद्धांत लागू किया जाए। इसके अलावा ब्रिटेन की संसद की तर्ज पर ‘ऑपोजिशन डेज’ निर्धारित किए जाएं, जिनमें विपक्ष द्वारा तय किए गए मुद्दों पर अनिवार्य रूप से चर्चा हो। लोगों का मानना है कि संसद जनता की आवाज है और जनता के कर के पैसे से चलती है। विरोध करना लोकतंत्र का अधिकार है, लेकिन विरोध सदन के भीतर बहस और चर्चा के माध्यम से होना चाहिए, न कि सदन की कार्यवाही ठप करके। यदि संसद का समय इसी प्रकार व्यर्थ होता रहा तो आम नागरिकों का लोकतांत्रिक व्यवस्था से विश्वास उठ सकता है।

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