रागिनी कुमारी
सीतामढ़ी, बिहार।किसी भी लड़की के सपने छोटे नहीं होते, लेकिन अक्सर समाज उसकी दुनिया छोटी कर देता है। जब वह पहली बार स्कूल के लिए निकलती है, तब वह भी डॉक्टर, शिक्षक, इंजीनियर, पुलिस अधिकारी बनकर अपने पैरों पर खड़े होने का सपना देखती है। लेकिन जैसे-जैसे उसकी उम्र बढ़ती है, घर की जिम्मेदारियाँ और शादी की चर्चाएँ उसके सपनों की जगह लेने लगती हैं। कई ग्रामीण परिवारों में आज भी लड़कियों की शिक्षा को उसके भविष्य का आधार नहीं, बल्कि शादी तक का एक पड़ाव भर माना जाता है।सीतामढ़ी के कई ग्रामीण इलाकों में आज भी ऐसे परिवार मिल जाएंगे, जहाँ मां-बाप को बेटियों की पढ़ाई से अधिक उनकी शादी की चिंता रहती है। परिवारों की यह चिंता केवल बेटी की शादी की नहीं होती, बल्कि उस सामाजिक दबाव की भी होती है, जिसमें एक तय उम्र के बाद अविवाहित लड़की को सवालों की तरह देखा जाने लगता है। इसलिए वे चाहते हैं कि बेटी जितनी जल्दी पढ़ाई पूरी करे, उतनी जल्दी उसका विवाह कर दिया जाए। आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए यह निर्णय और कठिन हो जाता है। सीमित आय, अस्थिर रोजगार और रोजमर्रा की जरूरतों के बीच जब शिक्षा पर खर्च करने की बारी आती है, तब पितृसत्तात्मक सोच अक्सर संसाधनों के बँटवारे को भी प्रभावित करती है।ऐसे में जब सीमित संसाधनों में किसी एक बच्चे की पढ़ाई पर खर्च करने की बात आती है, तो प्राथमिकता अक्सर लड़कों को दी जाती है।यह सवाल केवल आर्थिक नहीं है, बल्कि सामाजिक सोच से भी जुड़ा है। आखिर जब एक ही घर में लड़की और लड़का दोनों पढ़ना चाहते हैं, तो प्राथमिकता लड़के को ही क्यों मिलती है? इसका उत्तर किसी कानून में नहीं,बल्कि उन सामाजिक धारणाओं में छिपा है जो पीढ़ियों से लड़कों और लड़कियों के लिए अलग-अलग भविष्य तय करती रही हैं।लंबे समय से यह माना जाता रहा है कि बेटा ही परिवार का सहारा बनेगा, माता-पिता की देखभाल करेगा और उनका का नाम आगे बढ़ाएगा। इस सोच में बेटी की शिक्षा को उसके अधिकार की जगह एक खर्च की तरह देखा जाता है, जबकि लड़कों की पढ़ाई को परिवार के भविष्य में निवेश माना जाता है। यह सोच लड़कियों की क्षमता को कम ही नहीं करती है, बल्कि उनके अवसरों को ही सीमित कर देती है।शिक्षा से जुड़े फैसले केवल आर्थिक परिस्थितियाँ तय नहीं करतीं। घर के भीतर मौजूद सत्ता संबंध भी इसमें बड़ी भूमिका निभाते हैं। सीतामढ़ी के ग्रामीण क्षेत्रों में काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि अनेक परिवारों में किशोरियाँ घरेलू हिंसा को बहुत करीब से देखती हुई बड़ी होती हैं। कई घरों में महिलाओं की आर्थिक निर्भरता के कारण उनकी आवाज़ कमजोर पड़ जाती है। जब महिलाओं के पास रोजगार के साधन नहीं होते, तो वे पूरी तरह पुरुषों की आय पर निर्भर रहती हैं। read more:https://worldtrustednews.in/yogi-government-makes-extensive-preparations-for-uninterrupted-power-supply-during-kanwar-yatra-uppcl-gears-up/ऐसे माहौल में लड़कियाँ को बचपन से यह सिखाया जाता है की आर्थिक रूप से मजबूत होना उनके जीवन की प्राथमिकता नहीं है। दूसरी ओर, कई माता-पिता भी यही मान लेते हैं कि यदि बेटी अधिक पढ़-लिख भी जाए, तब भी उसे घर ही संभालना है। इस सोच का सबसे बड़ा नुकसान यह होता है कि लड़कियों की न सिर्फ शिक्षा छूट जाती है बल्कि उनकी आत्मनिर्भरता और आत्मविश्वास भी कमजोर पड़ जाता है।हालांकि, पिछले दो दशकों में बिहार में बालिका शिक्षा की स्थिति में उल्लेखनीय बदलाव भी आया है। एक समय था जब राज्य में लड़कियों का स्कूल तक पहुँचना ही बड़ी चुनौती थी। लेकिन विभिन्न सरकारी योजनाओं, सामाजिक अभियानों और समुदाय स्तर पर बढ़ती जागरूकता के कारण आज अधिक लड़कियाँ स्कूल पहुँच रही हैं। 2007 में बिहार सरकार की मुख्यमंत्री बालिका (बाद में बालक/बालिका) साइकिल योजना और इसके बाद मुख्यमंत्री पोशाक योजना तथा अन्य प्रोत्साहन योजनाओं ने लड़कियों की स्कूल तक पहुँच बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।सबसे महत्वपूर्ण पहल मुख्यमंत्री कन्या उत्थान योजना रही, जिसकी शुरुआत 2018 में की गई। इस योजना के तहत जन्म से लेकर स्नातक तक विभिन्न चरणों में किशोरियों को आर्थिक सहायता प्रदान की जाती है। वर्तमान व्यवस्था के अनुसार स्नातक उत्तीर्ण अविवाहित छात्राओं को ₹50,000 तक की प्रोत्साहन राशि दी जाती है। इसके अतिरिक्त माध्यमिक और उच्च माध्यमिक स्तर पर भी विभिन्न प्रोत्साहन योजनाओं के माध्यम से छात्राओं को आर्थिक सहायता उपलब्ध कराई जाती है, ताकि वे पढ़ाई बीच में न छोड़ें।इन योजनाओं का असर आंकड़ों में भी स्पष्ट दिखाई देता है। बिहार में महिला साक्षरता दर में लगातार सुधार हुआ है। जनगणना 2001 में राज्य की महिला साक्षरता दर लगभग 33.1 प्रतिशत थी, जो राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5, 2019-21) और विभिन्न सरकारी आकलनों के अनुसार बढ़कर लगभग 60 प्रतिशत के आसपास पहुँच चुकी है। माध्यमिक और उच्च माध्यमिक स्तर पर भी छात्राओं का नामांकन लगातार बढ़ा है। दसवीं और बारहवीं की परीक्षाओं में छात्राओं का परिणाम लड़कों से बेहतर रहा है।फिर भी एक बड़ा प्रश्न आज भी बना हुआ है कि यदि दसवीं और बारहवीं में लड़कियों की संख्या और सफलता दोनों अच्छी हैं, तो इंजीनियरिंग, पॉलिटेक्निक, आईटीआई, कंप्यूटर, विज्ञान एवं अन्य तकनीकी पाठ्यक्रमों में उनका दाखिला अपेक्षाकृत कम क्यों दिखाई देता है? इसके पीछे कई कारण हैं। पहला कारण आर्थिक है। तकनीकी शिक्षा सामान्य स्कूल शिक्षा की तुलना में अधिक महंगी होती है। गरीबी और पितृसत्तात्मक सोच जब एक साथ काम करती हैं, तो सबसे पहले लड़कियों की शिक्षा ही समझौते का विषय बन जाती है। ऐसे में कमजोर आर्थिक स्थिति वाले परिवार अक्सर लड़कियों की बजाय लड़कों को तकनीकी शिक्षा पर खर्च करना बेहतर समझते हैं। दूसरा कारण दूरी और सुरक्षा का है। अधिकांश तकनीकी संस्थान जिला मुख्यालय या बड़े शहरों में होते हैं। ग्रामीण परिवारों को लड़कियों का घर से दूर रहकर पढ़ना असुरक्षित या सामाजिक रूप से अस्वीकार्य लगता है। तीसरा कारण सामाजिक अपेक्षाएँ हैं। कई अभिभावक मानते हैं कि तकनीकी शिक्षा में अधिक समय लगेगा और इससे लड़की की शादी देर से होगी। इसलिए वे जल्दी विवाह को प्राथमिकता देते हैं।यह भी ध्यान देने योग्य है कि केवल स्कूल में दाखिला बढ़ा देना पर्याप्त नहीं है। शिक्षा तभी सार्थक होगी, जब लड़कियाँ अपनी पसंद के विषयों में आगे बढ़ सकें, उच्च शिक्षा प्राप्त कर सकें और रोजगार से जुड़ सकें। यदि शिक्षा के बाद भी निर्णय लेने का अधिकार घर-परिवार और अभिभावकों के पास ही रहे और लड़की अपने भविष्य का चुनाव स्वयं न कर सके, तो शिक्षा का उद्देश्य अधूरा रह जाता है।सरकार की योजनाओं ने निश्चित रूप से रास्ता बनाया है, लेकिन केवल आर्थिक सहायता से सदियों पुरानी सोच नहीं बदलती। जब तक यह धारणा बनी रहेगी कि बेटा परिवार का भविष्य है और बेटी केवल किसी दूसरे घर की जिम्मेदारी है, उस वक़्त तक समान अवसरों की बात अधूरी रहेगी। ज़रूरत केवल योजनाएँ बढ़ाने की नहीं, बल्कि घरों के भीतर बैठी उस सोच को बदलने की है जो आज भी लड़कियों के सपनों की उम्र तय कर देती है। शिक्षा तब ही अपने उद्देश्य तक पहुँचेगी, जब लड़कियों को केवल पढ़ने का नहीं, अपने भविष्य का निर्णय लेने का भी बराबर अधिकार मिलेगा।