डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा
शाम के साढ़े सात बज रहे थे। चाय की दुकान पर केतली से उठती भाप ने दुकान के मालिक, मंगत राम के चेहरे को धुंधला कर दिया था। लेकिन नौ साल के छोटू के लिए दुनिया कभी धुंधली नहीं थी। वह इतनी साफ थी कि उसकी नंगी आंखों में सीधे चुभती थी। जहां जिंदगी चाय के कुल्हड़ में तैरती मलाई जैसी होती है, दिखने में तो अच्छी, पर गटक जाओ तो स्वाद गायब, छोटू की कहानी भी कुछ ऐसी ही थी।छोटू का असली नाम क्या था, यह बात सरकारी कागजों के उस ढेर में दफन थी जिसे दीमकें कब का अपना लंच बना चुकी थीं। अनाथालय की दीवारें वैसी ही थीं जैसी हमारे देश की व्यवस्था। ऊपर से पुती हुई, अंदर से सीलन से भरी। वह अक्सर अपने फटे हुए कुर्ते की आस्तीन से नाक पोंछते हुए सोचता कि अनाथ होना भी एक टैलेंट है साहब, कम से कम आपको यह चिंता नहीं होती कि पापा पैरेंट-टीचर मीटिंग में आकर बेइज्जती कराएंगे। दर्द अगर सीधा दिल पर लगता, तो नौ साल का यह ढांचा कब का भरभरा कर ढह गया होता। लोग कहते हैं बच्चे भगवान का रूप होते हैं, लेकिन छोटू को देखकर लगता था कि भगवान ने यह रूप बनाकर उसका एड्रेस लिखना भूल गए हैं।सर्दियों की वह रात कसाई की छुरी जैसी पैनी थी। हवाएं ऐसे चल रही थीं जैसे किसी ने मुहावरों की किताब से ‘खून जमा देने वाली ठंड’ को हकीकत में बदल दिया हो। छोटू एक बंद दुकान के शटर के नीचे दुबका था। उसका पेट ऐसे सुर लगा रहा था जैसे कोई नौसिखिया उस्ताद टूटी हुई सारंगी बजा रहा हो। तभी शहर के सभ्य बाबूजी वहां से गुजरे। शॉल में लिपटे, मफलर से कान बांधे। छोटू को देखकर थिटके और बोले, “बेटा, तुम्हारे माता-पिता कहां हैं?” मानो कोई क्विज कॉन्टेस्ट चल रहा हो। छोटू ने मुस्कुरा कर देखा। उसकी आंखों में दर्द का एक समंदर था, लेकिन होंठों पर तीखा तंज तैर गया, “बाबूजी, वो जरा भगवान जी के यहां वीआईपी गेस्ट बनकर गए हैं। लौटते में शायद थोड़ा लेट हो जाएंगे। तब तक के लिए क्या आप इस भगवान के रूप को दस रुपये की चाय पिलाएंगे?” बाबूजी ऐसे बिदके जैसे किसी ने उनकी जेब में जलता हुआ कोयला डाल दिया हो। वे तुरंत नौ दो ग्यारह हो गए। छोटू ने ठंडी सांस ली। हमदर्दी मुफ्त मिलती है, लेकिन समोसे के लिए नकद नारायण चाहिए होते हैं।छोटू के पास अपनी मां की कोई तस्वीर नहीं थी।read more:https://khabarentertainment.in/509-vidyut-sakhis-in-bijnor-receive-thermal-printers-instant-electricity-bill-receipts-will-now-be-available-at-doorsteps/उसके दिमाग में मां का बिम्ब बस एक धुंधली सी खुशबू था। सस्ती सी लाउंड्री साबुन और गीली मिट्टी की जुगलबंदी जैसी खुशबू। जब भी उसे बहुत तेज भूख लगती, वह अपनी आंखें बंद कर लेता और उस खुशबू को सूंघने की कोशिश करता। मगर पेट की भूख कमबख्त बड़ी सगी होती है, वह किसी बिम्ब या उपमा को नहीं मानती। वह अक्सर सोचता कि रोटी गोल होती है, दुनिया भी गोल है, लेकिन इस गोल दुनिया में मेरे हिस्से का कोई कोना नहीं है। उसने देखा था कि कैसे बड़े घरों के बच्चे गाड़ियों में बैठकर स्कूल जाते थे, उनके रोने पर मां-बाप आसमान सिर पर उठा लेते थे। और यहां? छोटू अगर घुटने छिला बैठता, तो सड़क का कंकड़ भी उससे कहता रास्ता देखकर चला कर बे!उस रात, ठंड ने अपनी सारी सीमाएं तोड़ दी थीं। छोटू के हाथ-पैर लकड़ी की तरह कड़े हो रहे थे। उसने पास पड़े अखबार के पन्नों को अपने बदन पर लपेटना शुरू किया। अखबार की हेडलाइन चिल्ला-चिल्ला कर कह रही थी देश बदल रहा है। छोटू ने हंसते हुए सोचा, देश बदले न बदले, मेरी करवट बदलनी जरूरी है, नहीं तो सुबह तक कुल्फी जम जाएगी। तभी अंधेरे में से तीन-चार आवारा कुत्ते आए। शहर के इंसानों से ज्यादा तमीज उन कुत्तों में थी। वे छोटू के चारों तरफ आकर सटकर बैठ गए। उनकी सांसों की गरमाहट छोटू के जिस्म में उतरने लगी। यह एक अजीब सा दृश्य था। एक अनाथ बच्चा, जिसे इंसानों की बस्ती ने दुत्कार दिया था, वह जानवरों की ऊष्मा में अपनी जिंदगी की भीख मांग रहा था। यह दर्द का वह मुकाम था जहां आंसू भी सूख कर नमक बन जाते हैं और रोमांच इस बात का कि क्या अगली सांस बचेगी?सुबह जब सूरज की पहली किरण चाय की दुकान के बेंच पर पड़ी, तो छोटू ने आंखें खोलीं। वह मरा नहीं था। जिंदगी ने उसे एक और दिन का ‘बोनस’ दे दिया था ताकि वह फिर से लोगों की गालियां सुन सके और मुस्कुरा सके। मंगत राम ने चिल्लाकर कहा, “ए छोटू! उठ, टेबल साफ कर! ग्राहक आने वाले हैं।”छोटू उठा, उसने अपनी फटी हुई पैंट को ऊपर खींचा, धूल झाड़ी और बोला, “आया मालिक! वैसे आज चाय में चीनी थोड़ी कम रखिएगा, शहर के लोगों की बातों में पहले ही बहुत शुगर है!” वह काम पर लग गया। उसकी पीठ पर अनाथ होने का जो अदृश्य बोझ था, उसने उसे अब अपनी रीढ़ की हड्डी बना लिया था। दर्द तो था, पर उस दर्द को लपेटकर जीने का हुनर उसने इस बेरहम शहर से सीख लिया था।