दतिया का अंतर्विरोध और भाजपा की आंतरिक संगठनात्मक चुनौतियाँ

 अशोक भाटिया

मध्य प्रदेश की राजनीति में दतिया विधानसभा उपचुनाव को लेकर जो अभूतपूर्व राजनीतिक घटनाक्रम सामने आया है, उसने न केवल राज्य की सियासत में भूचाल ला दिया है, बल्कि खुद को “काडर-बेस्ड” और अनुशासित बताने वाली भारतीय जनता पार्टी  के संगठनात्मक ढांचे पर भी गंभीर सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं। दतिया सीट से पूर्व गृहमंत्री और भाजपा के कद्दावर ब्राह्मण नेता डॉ. नरोत्तम मिश्रा का टिकट काटकर पार्टी द्वारा युवा चेहरे आशुतोष तिवारी को उम्मीदवार बनाए जाने के बाद जिस तरह की बगावत देखने को मिल रही है, उसने यह स्पष्ट कर दिया है कि सत्ता और संगठन के शीर्ष स्तर पर लिए जाने वाले फैसले हमेशा जमीनी स्तर पर सहजता से स्वीकार्य नहीं होते।यह केवल एक सीट का उपचुनाव नहीं रह गया है, बल्कि यह भाजपा की आंतरिक गुटबाजी, क्षत्रपों की महत्वाकांक्षा और “हाईकमान संस्कृति” के बीच चल रहे द्वंद्व का एक सजीव दस्तावेज बन चुका है। बगावत की यह आग न केवल दतिया बल्कि पड़ोसी जिलों तक भी फैल चुकी है, जो आने वाले समय में पार्टी के लिए एक बड़े राजनीतिक संकट का संकेत है।भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने दतिया से आशुतोष तिवारी को टिकट देकर एक बड़ा राजनीतिक जुआ खेला है। राजनीतिक गलियारों और पार्टी के आंतरिक सर्वे रिपोर्टों में यह बात निकलकर सामने आई थी कि नरोत्तम मिश्रा के पिछले कुछ वर्षों के कथित ‘अति-आक्रामक और अहंकारी’ रवैये के कारण क्षेत्र की जनता और जमीनी कार्यकर्ताओं में गहरी नाराजगी थी। इसी नाराजगी का नतीजा था कि वे साल 2023 के मुख्य विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के राजेंद्र भारती से चुनाव हार गए थे।पार्टी नेतृत्व का मानना था कि यदि उपचुनाव में दोबारा मिश्रा को ही उतारा गया, तो एंटी-इंकंबेंसी और स्थानीय असंतोष के चलते पार्टी को फिर से पराजय का मुंह देखना पड़ सकता है। इसी को ध्यान में रखते हुए “नो-रिपीट” फॉर्मूले और नए नेतृत्व को उभारने की नीति के तहत आशुतोष तिवारी को मैदान में उतारा गया। आशुतोष तिवारी इससे पहले भी दतिया जिले की सेवढ़ा सीट से टिकट के दावेदार रहे हैं।परंतु, नरोत्तम मिश्रा जैसे कद्दावर नेता को इस तरह दरकिनार किए जाने की परिणति जिस व्यापक विद्रोह के रूप में हुई, उसका सटीक आकलन शायद संगठन के रणनीतिकार नहीं कर पाए। नरोत्तम मिश्रा पिछले दो दशकों से दतिया और बुंदेलखंड-ग्वालियर चंबल संभाग में भाजपा का मुख्य चेहरा रहे हैं। उन्हें संगठन में ‘संकटमोचक’ माना जाता रहा है। ऐसे में उनका टिकट कटना उनके समर्थकों के लिए एक सीधा राजनीतिक आघात था, जिसने उनके भीतर छिपे गुस्से को सड़क पर ला दिया।टिकट कटने की आधिकारिक घोषणा के बाद दतिया में जो दृश्य देखने को मिले, वे अमूमन भाजपा जैसी अनुशासित पार्टी में कम ही दिखाई देते हैं। नरोत्तम मिश्रा के उग्र समर्थकों ने दतिया में झांसी-ग्वालियर नेशनल हाईवे-44  को पूरी तरह से जाम कर दिया। घंटों तक यातायात ठप रहा, जिससे आम जनता को भारी परेशानी का सामना करना पड़ा। उग्र कार्यकर्ताओं ने न केवल टायर जलाए और नारेबाजी की, बल्कि स्थिति को संभालने आई पुलिस टीम पर पथराव भी किया, जिसमें छह पुलिसकर्मियों के घायल होने की खबर आई।स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि स्थानीय प्रशासन और पुलिस को कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए सैकड़ों प्रदर्शनकारी कार्यकर्ताओं को भाजपा के जिला कार्यालय के भीतर ही नजरबंद या बंद करना पड़ा। इस अराजकता ने विपक्षी दलों को भाजपा पर हमला करने का एक बड़ा हथियार दे दिया है। जो पार्टी “कानून के राज” और “अनुशासन” की बात करती है, उसके अपने ही कार्यकर्ता जब पुलिस पर पथराव करने लगें, तो नैतिक धरातल कमजोर होना स्वाभाविक है।दतिया का यह संकट केवल सड़क तक सीमित नहीं है, बल्कि इसने पार्टी के प्रशासनिक और संगठनात्मक ढांचे को भी भीतर से हिला दिया है। टिकट वितरण को ‘एकतरफा और कार्यकर्ताओं का अपमान’ बताते हुए भाजपा के जिलाध्यक्ष रघुवीर सिंह कुशवाहा ने सामूहिक रूप से अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। उनके साथ ही जिला संगठन के कई प्रमुख पदाधिकारियों, दतिया नगर पालिका के पार्षदों, जिला पंचायत अध्यक्ष और जनपद पंचायत के जनप्रतिनिधियों ने भी सामूहिक त्यागपत्र सौंप दिया ।किसी एक सीट पर उम्मीदवार बदलने से पूरी जिला इकाई का इस तरह बागी हो जाना यह दर्शाता है कि दतिया में भाजपा संगठन और नरोत्तम मिश्रा एक-दूसरे के पूरक बन चुके थे। संगठन पर मिश्रा की पकड़ इतनी मजबूत थी कि उनके बिना जिला इकाई के अस्तित्व की कल्पना करना भी स्थानीय नेताओं के लिए कठिन हो रहा है। सामूहिक इस्तीफों के इस दौर ने आशुतोष तिवारी की चुनावी राह को बेहद पथरीला बना दिया है। यदि जिला संगठन ही चुनाव प्रचार से दूरी बना लेगा या भीतरघात करेगा, तो किसी भी नए प्रत्याशी के लिए चुनावी वैतरणी पार करना नामुमकिन हो जाता है।बगावत की यह लहर केवल दतिया जिले तक सीमित नहीं है। नरोत्तम मिश्रा का राजनीतिक प्रभाव पड़ोसी ग्वालियर जिले के डबरा निर्वाचन क्षेत्र और बुंदेलखंड के अन्य हिस्सों में भी रहा है। वे डबरा सीट से पूर्व में तीन बार (1990, 1998 और 2003) विधायक रह चुके हैं। यही कारण है कि दतिया में लगी चिंगारी की आंच डबरा और ग्वालियर तक महसूस की जा रही है, जहाँ मिश्रा के समर्थकों ने पार्टी नेतृत्व के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।read more:https://khabarentertainment.in/prof-dr-rajendra-rajput-receives-guru-shree-2026-award-at-national-level-brings-honour-to-ghazipur/इस आंतरिक कलह का तात्कालिक असर भाजपा के बड़े संगठनात्मक कार्यक्रमों पर भी पड़ा है। पार्टी को दतिया उपचुनाव में पैदा हुए तनाव और आगामी मानसून सत्र के मद्देनजर ओरछा में होने वाली अपनी महत्वपूर्ण प्रदेश कार्यसमिति की बैठक को आनन-फानन में रद्द करना पड़ा है। हालाँकि आधिकारिक तौर पर इसका कारण मानसून सत्र और उपचुनाव की तैयारियों को बताया गया है, लेकिन राजनीतिक विश्लेषक इसे बगावत को थामने और डैमेज कंट्रोल की कवायद के रूप में देख रहे हैं। भाजपा नेतृत्व इस समय किसी भी ऐसे बड़े मंच से बचना चाहता है जहाँ असंतोष खुलकर सतह पर आ जाए।दतिया विधानसभा सीट पर उपचुनाव की नौबत इसलिए आई क्योंकि यहाँ से कांग्रेस विधायक राजेंद्र भारती को एक कानूनी मामले में सजा होने के बाद उनकी सदस्यता रद्द कर दी गई थी। राजेंद्र भारती ने ही 2023 के चुनाव में नरोत्तम मिश्रा को पराजित किया था। कांग्रेस के लिए यह सीट प्रतिष्ठा का विषय है और वे इस उपचुनाव में भाजपा की आंतरिक कलह का पूरा लाभ उठाने की फिराक में हैं।चुनावी कार्यक्रम के अनुसार, 30 जुलाई को मतदान होना है और 3 अगस्त को मतगणना की जाएगी। 13 जुलाई को नामांकन की अंतिम तिथि है। समय बेहद कम है और भाजपा के पास अपने घर को व्यवस्थित करने के लिए महज कुछ ही दिन शेष हैं। यदि पार्टी का शीर्ष नेतृत्व नरोत्तम मिश्रा को मनाने और उनके समर्थकों को शांत करने में विफल रहता है, तो कांग्रेस के लिए राह बेहद आसान हो जाएगी। कांग्रेस पहले से ही भाजपा के भीतर चल रही इस सिरफुटौवल को “सत्ता की मलाई का झगड़ा” बताकर जनता के बीच भुनाने में जुट गई है।दिलचस्प बात यह है कि केवल मध्य प्रदेश ही नहीं, बल्कि इसी समय बिहार के बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में भी भाजपा को टिकट वितरण को लेकर भारी फजीहत का सामना करना पड़ा है। बांकीपुर में पार्टी को अपने घोषित उम्मीदवार अभिषेक बंटी का नाम वापस दिलाकर उनकी जगह नीरज कुमार सिन्हा को मैदान में उतारना पड़ा, क्योंकि पुराने उम्मीदवार पर कई गंभीर आरोप थे और स्थानीय स्तर पर भारी विरोध था।बिहार और मध्य प्रदेश के इन दोनों घटनाक्रमों को मिलाकर देखें, तो यह साफ होता है कि भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व इस समय टिकट चयन और स्थानीय समीकरणों को भांपने में कहीं न कहीं चूक कर रहा है। राज्यों के क्षत्रपों को दरकिनार कर दिल्ली से थोपे जाने वाले फैसलों के खिलाफ अब राज्यों में भी खुलकर आवाजें उठने लगी हैं। दतिया का घटनाक्रम इस बात का गवाह है कि अब कार्यकर्ता केवल ‘कमल के फूल’ के नाम पर किसी भी उम्मीदवार को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं, विशेषकर तब जब उनके अपने कद्दावर नेता के राजनीतिक भविष्य पर संकट मंडरा रहा हो।अब गेंद पूरी तरह से भाजपा के केंद्रीय और प्रांतीय नेतृत्व के पाले में है। मुख्यमंत्री मोहन यादव, प्रदेश अध्यक्ष वीडी शर्मा और दिल्ली में बैठे आलाकमान के लिए सबसे बड़ी चुनौती नरोत्तम मिश्रा को एक सम्मानजनक पुनर्वास (जैसे संगठन में कोई बड़ा पद या राज्यसभा) का आश्वासन देकर शांत करना है। मिश्रा एक चतुर राजनीतिज्ञ हैं; वे जानते हैं कि इस समय उनका एक मौन इशारा भी भाजपा के नए उम्मीदवार आशुतोष तिवारी की लुटिया डुबो सकता है।पार्टी को तुरंत निम्नलिखित मोर्चों पर काम करना होगा:इस्तीफों की वापसी: जिला इकाई के जिन पदाधिकारियों ने इस्तीफे दिए हैं, उन्हें बातचीत की मेज पर लाकर उनके इस्तीफे नामंजूर करने होंगे और उन्हें आशुतोष तिवारी के पक्ष में काम करने के लिए राजी करना होगा।कार्यकर्ताओं का तुष्टिकरण: पुलिस कार्रवाई से नाराज जमीनी कार्यकर्ताओं के घावों पर मरहम लगाना होगा ताकि वे चुनावी अभियान में उदासीन न बैठें।गुटबाजी पर लगाम: आशुतोष तिवारी को नरोत्तम मिश्रा के घर भेजकर उनका आशीर्वाद दिलवाना और मंच पर दोनों को एक साथ दिखाना परसेप्शन की लड़ाई जीतने के लिए अनिवार्य होगा।दतिया का यह राजनीतिक संकट भाजपा के लिए एक गंभीर चेतावनी है। यह इस बात का संकेत है कि ‘अजेय’ होने के भ्रम में यदि स्थानीय भावनाओं और मजबूत क्षत्रपों की उपेक्षा की जाएगी, तो काडर का अनुशासन भी ताश के पत्तों की तरह ढह सकता है। दतिया उपचुनाव का परिणाम जो भी हो, लेकिन जुलाई 2026 के इस घटनाक्रम ने यह साबित कर दिया है कि लोकतंत्र में और विशेषकर क्षेत्रीय राजनीति में, चेहरों की अपनी एक सल्तनत होती है जिसे केंद्रीय डिक्री के जरिए रातों रात ढहाया नहीं जा सकता। भाजपा यदि इस आंतरिक असंतोष को दबाने में नाकाम रही, तो दतिया की यह हार आगामी समय में मध्य प्रदेश की पूरी राजनीति के मिजाज को बदलने का सबब बन सकती है।

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