डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा
गाँव की उस बूढ़ी, पथरीली पगडंडी पर धूल का एक बवंडर उठा और पीपल के झुर्रीदार पत्तों से टकराकर शांत हो गया। जेठ की दुपहरी में जब आसमान आग उगलता है, तब सत्तर पार के दो जोड़े पैर बिना किसी चप्पल के उस तपती मिट्टी को नाप रहे थे। रामसरन की पीठ झुककर कमान हो चुकी थी, मानो वह धरती से अपना खोया हुआ कुछ ढूंढ रहे हों। उनकी लाठी खट-खट करती हुई उस सन्नाटे को चीर रही थी, जो गाँव के सूनेपन की बपौती बन चुका था। उनके ठीक पीछे जानकी अपने फटे आँचल से माथे का पसीना पोंछती हुई घिसट रही थी। उनके हाथों की नसें इस तरह उभरी हुई थीं, जैसे सूखी नदी के पाट पर दरारें पड़ गई हों। वे दोनों किसी गंतव्य की ओर नहीं, बल्कि अपनी ही परछाईं के पीछे भाग रहे थे, जिसे धूप लगातार छोटी करती जा रही थी।read more:https://pahaltoday.com/us-iran-ceasefire-a-positive-step/उस धूल-धूसरित रास्ते के ठीक मोड़ पर एक नीम का दरख्त खड़ा था। वही नीम, जिसे रामसरन ने अपने हाथों से सींचा था। आज उसकी छाल उखड़ चुकी थी, पर उसकी जड़ें पाताल को छूने की जिद्द में थीं। अजीब बात थी कि उस बूढ़े दरख्त पर एक भी फल नहीं बचा था, सारे के सारे निबौरी के दाने न जाने कब के गायब हो चुके थे। हवा चलती तो उसकी सूखी टहनियाँ आपस में टकराकर ऐसा रुदन करतीं, मानो कोई माँ एकांत में अपने बहते आंसुओं को दुनिया से छुपाने की नाकाम कोशिश कर रही हो। रामसरन ने नीम की छांव में सुस्ताने के लिए कदम रोके, तो जानकी ने धीमी आवाज में कहा, “सुनो, आज डाकिया आया था क्या?” रामसरन ने बिना कुछ बोले अपनी धुंधली आँखों को आसमान की तरफ उठा दिया। आँखों के कोरों में जमा हुआ पानी सूखकर नमक बन चुका था, जिसमें अब और बहने की ताकत नहीं बची थी।शहर के एक आलीशान, वातानुकूलित रेस्तरां में मोमबत्तियों की मद्धम रोशनी के बीच कांच के गिलास आपस में टकराए। ‘चीयर्स’ की आवाज के साथ एक खनकती हुई हंसी गूंजी। उस मेज पर बैठे नौजवान की कलाई पर बंधी महंगी घड़ी टिक-टिक कर रही थी, जो समय की कीमत तो बताती थी, लेकिन बीते हुए कल की यादों को दफन कर चुकी थी। उसकी चमचमाती कार बाहर फुटपाथ पर खड़ी थी, जिसकी चमक के आगे स्ट्रीट लाइट भी फीकी लग रही थी। वह अपनी संगिनी की आँखों में झांकते हुए भविष्य के आलीशान महलों के सपने बुन रहा था। उसके चेहरे पर सफलता का वह आभामंडल था, जो अक्सर जड़ों को काट देने के बाद ही हासिल होता है। उसने वेटर को बुलाकर एक झटके में उतना बख्शीश दे दिया, जितने में किसी बूढ़े बाप की महीने भर की दवाइयां आ सकती थीं। वह हंस रहा था, क्योंकि उसने जिंदगी के गणित को पूरी तरह सुलझा लिया था।गाँव के उस कच्चे मकान के भीतर, जहाँ एक कोने में मिट्टी का दीया तेल के अभाव में दम तोड़ रहा था, एक पुरानी पेटी खुली पड़ी थी। उस पेटी में कुछ सहेज कर रखा गया था—एक स्याही सूख चुकी कलम और फटे पन्नों वाली एक पुरानी कापी। उसी कापी के अक्षरों को छूकर रामसरन की उँगलियाँ कांप उठीं। उन्होंने कभी अपनी गाढ़ी कमाई का एक-एक पैसा पानी की तरह बहाकर किसी को अक्षरों की दुनिया की सैर कराई थी। वह कलम आज भी वहीं गवाही दे रही थी कि कैसे एक हाथ ने दूसरे हाथ को थामकर चलना और लिखना सिखाया था। मगर विडंबना देखिए, जिस कलम की नींव में बूढ़े बाप के खून का पसीना लगा था, उसने जब अपनी पहली इबारत लिखी, तो सबसे पहले उसी घर का पता अपनी यादों से मिटा दिया। वह एक ऐसी मूक गवाही थी, जो बिना कुछ कहे भी कलेजे को छलनी कर रही थी।शाम ढलते ही दोनों बूढ़े शरीर फिर से अपनी उसी झोपड़ी की तरफ लौट चले, जहाँ अंधेरा पहले ही आकर आसन जमा चुका था। रामसरन ने जानकी की तरफ देखा और एक ठंडी आह भरकर बोले, “नीम ने अपनी सारी निबौरियां शहर के बाजारों में बेच दीं, ताकि वहाँ के लोग अपनी कड़वाहट दूर कर सकें। अब इस बूढ़े तने के पास सिर्फ सूखी पत्तियाँ बची हैं, जो पतझड़ में खुद-ब-खुद गिर जाएंगी।” जानकी ने कुछ नहीं कहा, बस अपनी फटी साड़ी के पल्लू से आँखें मूंद लीं। हवा का एक तेज झोंका आया और उस नीम के पेड़ से आखिरी सूखा पत्ता भी टूटकर जमीन पर गिर गया। शहर की रोशनियों में नहाया वह नौजवान अपनी जीत का जश्न मना रहा था, जबकि यहाँ गाँव की उस अंधेरी कोठरी में दो जिंदगियां बिना किसी आहट के, धीरे-धीरे मलबे में तब्दील हो रही थीं।