मानसून बिगड़ा तो देश की आर्थिक स्थिति और महंगाई पर असर संभव

 अशोक भाटिया

भारतीय रिजर्व बैंक  के जून बुलेटिन में प्रकाशित ‘स्टेट ऑफ द इकोनॉमी’ लेख में कहा गया है कि यदि दक्षिण-पश्चिम मानसून उम्मीद के मुताबिक नहीं रहता, तो इसका असर देश की आर्थिक वृद्धि और महंगाई पर पड़ सकता है. भारत की अर्थव्यवस्था फिलहाल मजबूत स्थिति में है, लेकिन कृषि और ग्रामीण मांग काफी हद तक मानसून पर निर्भर करती है. ऐसे में कमजोर बारिश खाद्य उत्पादन को प्रभावित कर सकती है, जिससे महंगाई बढ़ने और उपभोक्ताओं की क्रय शक्ति पर असर पड़ने की आशंका पैदा हो सकती है.लेख में कहा गया है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आर्थिक माहौल अभी पूरी तरह स्थिर नहीं हुआ है. पश्चिम एशिया में हाल के अंतरिम शांति समझौते से कुछ राहत जरूर मिली है, लेकिन भू-राजनीतिक तनाव और व्यापार से जुड़ी अनिश्चितताएं अभी भी बनी हुई हैं. रिपोर्ट के अनुसार दुनिया भर में आर्थिक जोखिम ऊंचे स्तर पर बने हुए हैं और यदि मौजूदा समझौते कमजोर पड़ते हैं या तनाव फिर बढ़ता है, तो इसका असर वैश्विक बाजारों और निवेश गतिविधियों पर दिखाई दे सकता है.इस समय मानसून का इंतजार कर रहे किसानों के साथ-साथ मानसून की राह देख रहे उत्तर भारत के लोगों के लिए अच्छी खबर नहीं है क्योंकि मानसून अपने समय से लेट हो चुका है। मौसम विभाग के मुताबिक मानसून एक सप्ताह की देरी से आ सकता है। स्काईमेट का दावा है कि उत्तर भारत में मानसून आने में देर हो सकती है। मौसम विभाग के अनुसार इस बार वह कमजोर रहने वाला है, जबकि प्री-मानसून में भी बारिश बहुत कम हुई है। इसके साथ ही आधिकारिक तौर पर चार माह के लिए बारिश के मौसम की शुरुआत होती है। लेकिन इस बार आठ जून को मानसून के केरल तट पहुंचते की संभावना जताई गई थी।गौरतलब है कि पिछले कुछ सालों से भारतीय मानसून को अल-नीनो ने कमजोर करते आ रहा था। कृषि, भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ होने के कारण मानसून यहां की कृषि और अर्थव्यवस्था, दोनों को समान रूप से प्रभावित करता है। वास्तव में, मानसून के आसपास भारतीय अर्थव्यवस्था घूमती है। मानसून असफल रहता है तो देश के विकास और अर्थव्यवस्था पर विपरित प्रभाव पडे़गा। दरअसल, एक खराब मानसून न केवल तेजी से बढ़ती उपभोक्ता वस्तुओं की मांग को कमजोर करता है, बल्कि आवश्यक खाद्य वस्तुओं के आयात को भी बढ़ावा देता है, और सरकार को कृषि ऋण छूट जैसे उपाय करने को भी मजबूर करता है। जिससे सरकार पर वित्त का दबाव बढ़ जाता है।वातावरण में आ रहे बदलावों ने बीते कुछ दशकों के दौरान मानसून के मिजाज को बदल डाला है। विशेषज्ञों को लग रहा है कि हमें अपनी खेती में बड़े बदलाव लाने की जरूरत है। उनका मानना है कि अगर जल्द ही हमारी खेती ने मानसून के बदले मिजाज के साथ तालमेल नहीं बिठाया तो एक अरब से ज्यादा आबादी वाले हमारे देश में अभूतपूर्व खाद्यान्न संकट पैदा हो सकता है। जाहिर है, जिस तरह से सिंचाई भगवान भरोसे है और ग्लोबल वार्मिंग से बारिश का चक्र बदल रहा है। उसका सीधा असर कृषि पर पड़ रहा है।इससे राष्ट्रीय आय में गिरावट के चलते सरकार का राजस्व तेजी से गिरावट आ सकती है। इसलिए कह सकते हैं कि राज्य का राजस्व और आय हर साल माॅनसून पर निर्भर करती है। इन्हीं वजहों से कहा जाता है कि माॅनसून का भारतीय अर्थव्यवस्था से गहरा नाता है।read more:https://pahaltoday.com/after-hearing-the-arguments-of-advocate-girish-srivastava-and-examining-the-file-sufficient-grounds-for-bail-were-found/ यदि मानसून कमजोर रहा तो देश के सामने कई मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं। कृषि उत्पाद पर असर पड़ सकता है। पैदावार पूरी तरह प्रभावित होने से महंगाई का बढ़ना निश्चित है। इतना ही नहीं, अर्थव्यवस्था में प्राण फूंकने की कोशिशों को करारा झटका लग सकता है। वहीं ग्रामीण आमदनी और उपभोक्ता के खर्च के लिए मौसमी बारिश अहम कारक है। देश की दो-तिहाई भाग ग्रामीण क्षेत्रों में है, जहां कृषि ही आय का मुख्य स्रोत है। मानसून को लेकर जो खबरें आ रही हैं, उनसे लग रहा है कि परिस्थितियां डराने वाली होंगी।वास्तव में किसानों के लिए गर्मी के मौसम की बारिश बड़ी अहमियत रखते है क्योंकि देश के केवल 40 फीसद कृषि क्षेत्र के बारे में कहा जा सकता है कि वहां सिंचाई की सुविधाएं हैं और एकाध मानसून में वह गड़बड़ी बर्दाश्त कर सकता है। लेकिन शेष 60 फीसद इलाका मानसून पर ही निर्भर होता है। ऐसे में बारिश सामान्य से कम हुई तो मुश्किल होना स्वाभाविक है। यों कहें बारिश और खाद्यान्न उत्पादन का कीमतों से सीधा संबंध है। कम बारिश और उच्च मंहगाई का रिश्ता स्पष्ट दिखाई देता है। चूंकि देश के 14 करोड़ से अधिक परिवार खेती पर निर्भर है, इसलिए कम बारिश की स्थिति में खेती-किसानी से जुड़े अधिकांश छोटे किसानों का जीवन सर्वाधिक प्रभावित होता है। तो कहा जा सकता है कि अभी भी भारतीय कृषि बहुत हद तक मानसून पर निर्भर है।भारतीय खाद्यान्नों की शत-प्रतिशत पूर्ति यहां होने वाली कृषि से ही होती है, जो पूर्णतया खेती की सफलता पर निर्भर है। इसके अतिरिक्त, देश के 22 करोड़ पशुओं को चारा भी कृषि से ही प्राप्त होता है। कृषि के न होने या अत्याल्पावस्था में हो पाने की स्थिति में पशुओं से प्राप्त होने वाली आय तथा सुविधाओं में कमी आ जाती है। इस तरह मानसून के प्रतिकूल होने पर देश में खाद्यान्नों तथा कृषि से संबंद्ध विभिन्न उद्योगों के लिए कच्चा माल विदेशों से मांगना पड़ता है, जिसके लिए काफी मात्रा में विदेशी मुद्रा का व्यय होता है। मौसम अनुकूल रहता है तो इन्हीं उत्पादों का विदेशों को निर्यात कर बड़ी मात्रा में विदेशी पूंजी प्राप्त हो जाती है।वातावरण में आ रहे बदलावों ने बीते कुछ दशकों के दौरान मानसून के मिजाज को बदल डाला है। विशेषज्ञों को लग रहा है कि हमें अपनी खेती में बड़े बदलाव लाने की जरूरत है। उनका मानना है कि अगर जल्द ही हमारी खेती ने मानसून के बदले मिजाज के साथ तालमेल नहीं बिठाया तो एक अरब से ज्यादा आबादी वाले हमारे देश में अभूतपूर्व खाद्यान्न संकट पैदा हो सकता है। जाहिर है, जिस तरह से सिंचाई भगवान भरोसे है और ग्लोबल वार्मिंग से बारिश का चक्र बदल रहा है। उसका सीधा असर कृषि पर पड़ रहा है। बेशक, दिन प्रतिदिन हमारी जरूरतें बढ़ रही हैं। 2050 में 1.6 से 1.7 अरब भारतीयों का पेट भरने के लिए हमें 45 करोड़ टन खाद्यान्न की जरूरत होगी यानी मौजूद से दुगना। ऐसे में बिना सिंचित क्षेत्र में वृद्धि के सिर्फ मानसून भरोसे इसे हासिल करना असंभव है। यह विडंबना है कि आजादी के सात दशक बाद भी हम मानसून पर निर्भरता कम नहीं कर पाए।

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