अशोक भाटिया
भारतीय लोकतंत्र का ताना-बाना एक मजबूत सत्तापक्ष और एक सजग विपक्ष के बीच संतुलन पर टिका हुआ है। सत्ता की निरंकुशता पर लगाम कसने और जनसरोकारों को संसद की दहलीज तक पहुँचाने की जिम्मेदारी विपक्ष की होती है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में देश के राजनीतिक परिदृश्य ने एक ऐसा मोड़ ले लिया है, जिसने इस संतुलन को हिलाकर रख दिया है। एक के बाद एक राज्यों में विपक्षी दलों का टूटना, विधायकों का थोक के भाव पाला बदलना और स्थापित क्षेत्रीय दलों का ताश के पत्तों की तरह बिखर जाना अब एक आम परिपाटी बन चुका है। ऐसे में यह सवाल मौजूं हो जाता है कि आखिर यह सिलसिला कब तक चलेगा? और क्या हमारी लोकतांत्रिक संस्थाएँ और कानून इस राजनीतिक अवसरवाद को रोकने में पूरी तरह अक्षम साबित हो चुके हैं?
एक दौर था जब राजनीति वैचारिक प्रतिबद्धताओं से संचालित होती थी। मतभेद नीतियों पर होते थे, लेकिन दल के प्रति निष्ठा बनी रहती थी। आज की राजनीति पूरी तरह से ‘सत्ता-केंद्रित’ और ‘अस्तित्व रक्षा’ के इर्द-गिर्द सिमट गई है। विपक्ष में बैठकर लंबा संघर्ष करने, जनता के बीच जाने और लाठियां खाने का माद्दा अब कम ही नेताओं में बचा है। चुनाव हारते ही या सत्ता से बाहर होते ही नेताओं में छटपटाहट शुरू हो जाती है। विचारधारा की जगह अब शुद्ध राजनीतिक अवसरवाद ने ले ली है।इस अवसरवाद को हवा देने का काम संविधान की दसवीं अनुसूची यानी दलबदल विरोधी कानून की कमियाँ कर रही हैं। 1985 में जब यह कानून लाया गया था, तब इसका मकसद ‘आया राम, गया राम’ की संस्कृति पर लगाम लगाना था। लेकिन समय के साथ नेताओं ने इसकी काट ढूंढ निकाली। कानून कहता है कि यदि किसी दल के दो-तिहाई (2/3) विधायक या सांसद एक साथ अलग गुट बनाते हैं, तो उनकी सदस्यता रद्द नहीं होगी। नतीजा यह हुआ कि अब ‘खुदरा’ दलबदल बंद हो गया है और उसकी जगह ‘थोक’ में पूरी की पूरी पार्टी को तोड़ने का खेल शुरू हो गया है। कानून जो सुरक्षा कवच बगावत को रोकने के लिए दे रहा था, वही अब बगावत को कानूनी जामा पहनाने का सबसे बड़ा औजार बन चुका है।पिछले कुछ सालों में विभिन्न राज्यों में सत्ता परिवर्तन और पार्टियों के विभाजन के जो मॉडल सामने आए हैं, वे चिंताजनक हैं। महाराष्ट्र इसका सबसे बड़ा जीवंत उदाहरण बना, जहाँ जून 2022 में शिवसेना के भीतर ऐसा विभाजन हुआ कि दो-तिहाई से अधिक विधायक अलग हो गए और तत्कालीन महा विकास अघाड़ी सरकार गिर गई। इसके बाद देश ने देखा कि कैसे देश के सबसे पुराने क्षेत्रीय दलों में से एक की कमान और चुनाव चिह्न तक बदल गया। इसके ठीक एक साल बाद, जुलाई 2023 में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) में भी यही कहानी दोहराई गई। महाराष्ट्र की राजनीति में हाल ही में एक नया सियासी तूफान खड़ा हो गया। अभी कल ही उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना (UBT) के 6 लोकसभा सांसदों के एक अलग गुट बनाने और लोकसभा अध्यक्ष से मान्यता मांगने की अटकलों से राज्य में खलबली मच गई है।5 मई 2026 को पश्चिम बंगाल चुनाव के नतीजे आने से पहले किसी ने सपने में भी किसी ने कल्पना नहीं की होगी कि महीने-डेढ़ महीने में तृणमूल कांग्रेस का बुरी तरह से विभाजन हो जायेगा।read more:https://pahaltoday.com/man-dies-in-road-accident-in-barhalganj/पश्चिम बंगाल की तेज तर्रार नेत्री और तब की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की छवि उस समय तक एक ऐसी नेत्री की थी जिसे मोदी के विकल्प के रूप में देखा जा रहा था, लेकिन बंगाल की हार ने सब कुछ बदल दिया। अब वह नेता ही उनको आईना दिखा रहे हैं जो कल तक उनके नेतृत्व में लोकसभा चुनाव लड़ने की बात कर रहे थे।इसी तरह से आम आदमी पार्टी के सात सांसद भी बिना किसी शोरगुल और सुगबुगाहट के बागी हो गये ओर भाजपा में चले गये। कुछ वर्ष पूर्व महाराष्ट्र ने शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस में भी टूट देखी थी, जब उनके ही भतीजे अजीत पवार ने बगावत करके अलग न केवल अपनी पार्टी बना ली बल्कि महाराष्ट्र में बीजेपी गठबंधन सरकार का हिस्सा भी बन गये। यह और बात है कि अजीत पवार अब इस दुनिया में नहीं है और उनकी पत्नी पार्टी की कमान संभाले हुए हैं। तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद वहां की राजनीति में भी बड़ा देखने को मिल रहा है। डीएमके और कांग्रेस का गठबंधन टूट गया है। बीजेपी की कट्टर विरोधी डीएमके अब मोदी के करीब नजर आ रहे हैं। इसी तरह से आंध्र प्रदेश के सीएम चंद्रबाबू नायडू और नीतीश कुमार की जनता दल यूनाइटेड भी मोदी सरकार का हिस्सा बनी हुई हैं। खास बात यह है कि जो भी पार्टियां टूटी हैं उसका अलग हुआ धड़ा राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) का हिस्सा बन कर या अलग रहते हुए भी मोदी के करीब आ गया।अब ताजा चर्चा उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी में टूट को लेकर हो रही है। सपा टूटेगी इसकी उम्मीद न के बराबर है, लेकिन अन्य राजनैतिक दलों में जिस तरह से टूट देखने को मिली है उससे सपा में टूट की कुछ खबरों पर लोग विश्वास भी कर रहे हैं। इसकी सुगबुगाहट तब शुरू हुई जब सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के अध्यक्ष ओमप्रकाश राजभर ने दावा किया कि सपा में टूट होने वाली है। राजनीति के कुछ जानकारों का कहना है कि राजनीति में “धुंआ तभी उठता है जब चिंगारी लगी हो” । वहीं दूसरी ओर, मध्य प्रदेश (2020) और कर्नाटक (2019) में एक अलग रणनीति देखने को मिली थी । यहाँ दलबदल कानून की पेचीदगियों से बचने के लिए विपक्षी विधायकों से सीधे ‘इस्तीफे’ दिलवाए गए। इस्तीफे देकर सदन की संख्या को कम किया गया, सरकारें गिराई गईं और बाद में उन्हीं विधायकों ने उपचुनाव लड़कर सत्ताधारी दल के टिकट पर वापसी की। बिहार में तो दलबदल और पाला बदलने की अनिश्चितता ने गठबंधन की विश्वसनीयता को ही दांव पर लगा दिया है। इन तमाम उदाहरणों से स्पष्ट है कि अब सरकारें गिराने और पार्टियां तोड़ने के लिए बाकायदा एक कानूनी और रणनीतिक ‘ब्लूप्रिंट’ तैयार कर लिया गया है।विपक्ष का लगातार यह आरोप रहा है कि सत्ताधारी दल द्वारा प्रवर्तन निदेशालय (ED), केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) और आयकर विभाग जैसी केंद्रीय जांच एजेंसियों का इस्तेमाल एक राजनीतिक हथियार के रूप में किया जा रहा है। कड़े कानूनों (जैसे PMLA) के तहत जेल जाने और व्यापारिक साम्राज्य नष्ट होने के डर से कई नेता अपने राजनीतिक सिद्धांतों का सौदा करने को मजबूर हो जाते हैं। इसे राजनीति के गलियारों में ‘वाशिंग मशीन मॉडल’ कहा जाने लगा है, जहाँ सत्तापक्ष में शामिल होते ही नेताओं के पुराने मुकदमे ठंडे बस्ते में चले जाते हैं।हालांकि, सारा दोष सत्तापक्ष या एजेंसियों पर मढ़कर विपक्षी दल अपनी कमजोरियों से आंखें नहीं मूंद सकते। सच यह भी है कि भारत के अधिकांश क्षेत्रीय दल घोर परिवारवाद और केंद्रीकरण के शिकार हैं। इन दलों में आंतरिक लोकतंत्र नाम की कोई चीज नहीं बची है। जब तक कोई दल सत्ता में रहता है, तब तक असंतोष दबा रहता है। लेकिन सत्ता से बाहर होते ही और शीर्ष नेतृत्व के कमजोर पड़ते ही, जमीनी और महत्वाकांक्षी नेताओं का दम घुटने लगता है। जब पार्टी के भीतर संवाद के सारे रास्ते बंद हो जाते हैं, तो बगावत की जमीन स्वतः तैयार हो जाती है।इस पूरे खेल में सबसे बड़ा नुकसान देश के आम मतदाता और लोकतांत्रिक मूल्यों का हो रहा है। जनता चिलचिलाती धूप में कतारों में खड़ी होकर किसी एक दल या विचारधारा के पक्ष में मतदान करती है। लेकिन कुछ ही महीनों बाद उसके द्वारा चुना गया प्रतिनिधि विपक्षी बेंच से उठकर सत्तापक्ष की गोद में बैठ जाता है। यह जनादेश के साथ सबसे क्रूर भद्दा मजाक है। इससे मतदाताओं में राजनीतिक विरक्ति पैदा होती है और उनका लोकतांत्रिक प्रणाली से भरोसा उठने लगता है।इसके अलावा, भारत एक बहुसांस्कृतिक और बहुभाषी देश है, जहाँ क्षेत्रीय दल स्थानीय अस्मिता और क्षेत्रीय मुद्दों की आवाज होते हैं। जब राष्ट्रीय दलों की आक्रामक विस्तारवादी नीतियों के कारण क्षेत्रीय दल टूटते हैं या कमजोर होते हैं, तो इससे देश के संघीय ढांचे पर विपरीत असर पड़ता है। एक दलीय प्रभुत्व की ओर बढ़ता देश विविधता के सिद्धांत के खिलाफ है।गौरतलब है कि विपक्षी दलों के टूटने का यह अंतहीन सिलसिला तब तक नहीं थमेगा, जब तक कि व्यवस्था में कुछ कड़े और क्रांतिकारी सुधार नहीं किए जाते:दलबदल विरोधी कानून की नए सिरे से समीक्षा होनी चाहिए। सामूहिक दलबदल (2/3 नियम) की छूट को पूरी तरह खत्म किया जाना चाहिए। यदि कोई नेता अपनी मूल पार्टी छोड़ता है या इस्तीफा देता है, तो उस पर अगले पांच वर्षों तक किसी भी तरह का चुनाव लड़ने, मंत्री बनने या सरकारी लाभ का पद लेने पर पूर्ण प्रतिबंध होना चाहिए।दलबदल के मामलों में विधानसभा या लोकसभा के अध्यक्ष की भूमिका अक्सर संदेहास्पद और पक्षपातपूर्ण रही है। सुप्रीम कोर्ट को चाहिए कि वह ऐसे मामलों के फैसले की समय-सीमा तय करे या फिर यह शक्ति किसी स्वतंत्र न्यायाधिकरण या चुनाव आयोग को सौंप दी जाए। विपक्षी दलों को केवल “सत्ता विरोध” के नकारात्मक एजेंडे से बाहर निकलना होगा। उन्हें जनता के सामने एक मजबूत, सकारात्मक और वैचारिक विजन रखना होगा। साथ ही, पार्टियों को परिवारवाद के चंगुल से मुक्त होकर अपने कैडर और वफादार जमीनी कार्यकर्ताओं को संगठन में आगे बढ़ाना होगा।सबसे अचूक इलाज देश के मतदाताओं के पास है। जिस दिन जनता दलबदल करने वाले नेताओं को उपचुनावों में हराकर घर बैठाना शुरू कर देगी, उसी दिन से राजनीतिक दलों और नेताओं में अनैतिक पाला बदलने का डर पैदा होगा।एक जीवंत लोकतंत्र के लिए सत्तापक्ष जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी एक सशक्त और एकजुट विपक्ष भी है। यदि विपक्ष इसी तरह बिखरता रहा और टूटता रहा, तो संसद और विधानसभाएं बहस के बजाय केवल औपचारिकता का केंद्र बनकर रह जाएंगी। राजनीतिक दलों को यह समझना होगा कि सत्ता आती-जाती रहती है, लेकिन लोकतांत्रिक संस्थाओं की गरिमा और शुचिता अक्षुण्ण रहनी चाहिए। समय आ गया है कि कानून, न्यायपालिका और देश की जनता मिलकर इस राजनीतिक तमाशे पर पूर्ण विराम लगाएं, अन्यथा आने वाली पीढ़ियां एक कमजोर और बौने लोकतंत्र का हिस्सा बनने को मजबूर होंगी।