समाजवादी पार्टी  के मुखिया अखिलेश यादव पर  ‘राम मंदिर विरोधी’ होने का ठप्पा क्यों लगा है ?

 अशोक भाटिया

अखिलेश यादव पर ‘राम मंदिर विरोधी’ होने का ठप्पा उनकी और समाजवादी पार्टी की पिछली सरकारों के फैसलों, हिंदुत्व विरोधी माने जाने वाले बयानों और राम मंदिर आंदोलन के दौरान अयोध्या में हुई गोलीबारी (1990) से जुड़े ऐतिहासिक विवादों के कारण लगा है। इसे मुख्य रूप से निम्नलिखित राजनीतिक और ऐतिहासिक कारणों से बल मिलता है:1990 की अयोध्या गोलीबारी: अक्टूबर 1990 में जब अयोध्या में कारसेवकों की भारी भीड़ जुटी थी, तब मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व वाली तत्कालीन सपा सरकार ने पुलिस को गोली चलाने का आदेश दिया था। इस घटना में कई कारसेवकों की जान गई थी, जिसे लेकर हिंदूवादी संगठनों और भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने उन्हें ‘राम मंदिर विरोधी’ माना। चूंकि अखिलेश यादव इसी पार्टी की विरासत संभालते हैं, इसलिए यह आरोप उन पर भी चस्पा किया जाता है।सांस्कृतिक और धार्मिक मुद्दों पर रुख: सपा सरकार के दौरान कुछ ऐसे फैसले लिए गए (जैसे वीएचपी की विवादित यात्राओं पर प्रतिबंध और हिंदुत्व के एजेंडे का विरोध), जिन्हें भाजपा अखिलेश यादव पर ‘राम मंदिर विरोधी’ होने का ठप्पा उनकी और समाजवादी पार्टी  की पिछली सरकारों के फैसलों, हिंदुत्व विरोधी माने जाने वाले बयानों और राम मंदिर आंदोलन के दौरान अयोध्या में हुई गोलीबारी (1990) से जुड़े ऐतिहासिक विवादों के कारण लगा है। इसे मुख्य रूप से निम्नलिखित राजनीतिक और ऐतिहासिक कारणों से बल मिलता है:संसद में हालिया बयान: अखिलेश यादव अक्सर संसद या राजनीतिक मंचों से तंज कसते हुए यह कहते हैं कि “जिन्होंने गोली चलवाई, वे ही राम मंदिर बनवा रहे हैं।” इस तरह के बयान उनके और भाजपा के बीच वैचारिक टकराव को दिखाते हैं और उनकी मंदिर विरोधी छवि को मजबूत करते हैं। समारोहों से दूरी: अयोध्या में 22 जनवरी 2024 को हुए भव्य ‘राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा’ समारोह और 2024 में रामलला के दर्शन का निमंत्रण मिलने के बावजूद अखिलेश यादव का उसमें शामिल न होना, हिंदूवादी संगठनों के बीच उनकी छवि को मंदिर-विरोधी के रूप में स्थापित करने का एक बड़ा कारण बना। जब विधान सभा में राम मंदिर धन्‍यवाद प्रस्‍ताव रखा गया था तब  सपा के 108 में से केवल 14 विधायकों ने विधानसभा में राम मंदिर धन्‍यवाद प्रस्‍ताव का विरोध किया। भाजपा की ओर से कहा जा रहा था  कि इनके नाम सार्वजनिक किये जाएं। यूपी बजट सत्र के तीसरे दिन 5 फरवरी को  सदन में अपने अभिभाषण के दौरान डॉक्टर शलभमणि त्रिपाठी ने सपा को जमकर लताड़ लगाई। विधानसभा में उन्‍होंने कहा कि ‘राम मंदिर का आमंत्रण तो आप को भी मिला था पर आप अयोध्‍या नहीं गए। मैं बहुत हैरान हुआ कि जब आप लोग भगवान राम के आमंत्रण पर नहीं गए। आप लोगों ने भगवान राम के वजूद को नकार दिया था। आप लोगों के लिए पश्‍चाताप का आखिरी अवसर था। आज जब सदन में भगवान राम के नाम पर बधाई प्रस्‍ताव जा रहा था तब आप लोग चुप रह सकते थे लेकिन आपने विरोध शुरू कर दिया। मैं विधानसभा अध्‍यक्ष से मांग करता हूं कि उन 14 सपा नेताओं के नाम सार्वजनिक कीजिए जिन्‍होंने भगवान राम के नाम पर आए बधाई प्रस्‍ताव का विरोध किया है।’दरअसल राम मंदिर निर्माण को लेकर सरकार की ओर से विधानसभा में बधाई प्रस्‍ताव पेश किया गया। इस प्रस्ताव का समाजवादी पार्टी के सदस्‍यों की ओर से आवाज आई कि यह जबरदस्‍ती की बधाई है। हालांकि विधानसभा अध्‍यक्ष सतीश महाना ने कहा कि कोई जबरदस्‍ती नहीं है, जो सहमत हों वही बधाई दें। प्रस्‍ताव पेश होने के बाद समाजवादी पार्टी के 14 सदस्‍यों ने इसके विरोध में हाथ नहीं उठाया।दरअसल बीजेपी चाहती थी  कि ये नाम सामने आएं ताकि उनके मतदाताओं को भी पता चल सके उनके प्रतिनिधि राम मंदिर उद्घाटन में ही नहीं गए बल्कि धन्यवाद प्रस्ताव भी उन्हें मंजूर नहीं है।वैसे भी जनता को यह जानने का अधिकार है कि विधानसभा में पेश होने वाले प्रस्ताव का हमारे जनप्रतिनिधि का क्या रुख है। मतदाता अपने नेता के किए गए कार्यों के आधार पर ही उसे भविष्य में वोट देना है या नहीं देना है का फैसला लेता है।विधायक शलभ मणि ने मीडिया  से कहा कि जिन विधायकों ने सदन में भगवान राम के नाम का विरोध किया, अब वे नहीं चाहते कि उनका नाम सार्वजनिक हो, उन्हें पता है कि भगवान राम के खिलाफ वोट करके वे अपने क्षेत्र में जाएंगे तो लोग ही नहीं उनके परिवार वाले भी उनसे पूछेंगे कि आपने ऐसा क्यूँ किया। यही वजह है कि सपा विधायक ओमवेश जी ने तो प्रभु राम के खिलाफ दिया गया अपना वोट यह कहते हुए वापस ले लिया कि वे पक्के राम भक्त हैं।read more:https://pahaltoday.com/block-head-celebrated-his-birthday-by-cutting-a-cake-and-wished-him-well/ जो राम और राष्ट्र के साथ नहीं, देश उनके साथ नहीं खड़ा होगा।गौरतलब है की विधानसभा में प्रस्ताव आने के बाद सपा के 97 विधायकों ने योगी सरकार का समर्थन किया। महज 14 विधायकों ने विरोध करते हुए हाथ ऊपर नहीं किया। रालोद के विधायकों का भी समर्थन योगी सरकार को मिला। 14 विधायकों में से एक स्वामी ओमवेश ने अपना विरोध वापस ले लिया है, मतलब अब केवल 13 विधायक ही प्रस्ताव का विरोध करने वाले रह गए हैं। साफ है कि राम मंदिर के नाम पर पार्टी में कभी विधायक दल की बैठक नहीं हुई  या राममंदिर मुद्दे पर पार्टी को क्या स्टैंड लेना है इस पर भी पार्टी से सलाह नहीं ली गई। पार्टी पिछले 4 चुनावों से उत्तर प्रदेश में मुंह की इसी लिए खा रही है क्योंकि पार्टी को प्राइवेट लिमिटेड कंपनी की तरह चलाया जा रहा है। बताया तो यभी गया था कि 2022 में समाजवादी पार्टी के 108 विधायक चुनकर सदन में पहुंचे। जिसमें से करीब 32 विधायक मुस्लिम हैं। आरएलडी के 9 विधायकों में भी करीब 2 विधायक मुस्लिम हैं। समाजवादी पार्टी के कुल 13 लोगों ने राम मंदिर धन्यवाद प्रस्ताव का विरोध किया है। यह विरोध लालजी वर्मा के नेतृत्व में किया गया । दूसरा नाम अखिलेश यादव का भी होगा जाहिर है। अब बचे 11 लोग केवल अखिलेश के पक्ष में बचे  । विधानसभा में समाजवादी पार्टी के एक विधायक अब भी पुराने दौर के सपा से बाहर नहीं निकल पाए हैं। यह जानते हुए भी कि 90 प्रतिशत विधायक राम मंदिर के साथ हैं सपा विधायक तूफानी सरोज सदन में कहते हैं कि अगर वो भी होते कारसेवकों पर गोली चलवाते। दरअसल समाजवादी पार्टी पितृ पुरुष मुलायमसिंह यादव ने 1990 में कारसेवकों पर गोली चलवाकर अल्पसंख्यक वोटों के सरदार बन गए थे। समाजवादी पार्टी में अब भी कुछ नेताओं को ऐसा लगता है कि अखिलेश यादव को भी ऐसा करना चाहिए। यही कारण है कि अखिलेश यादव आम जनता का नब्ज नहीं समझ पा रहे हैं। बीजेपी चाहती है कि राम मंदिर पर धन्यवाद प्रस्ताव का विरोध करने वाले विधायकों का नाम उजागर करने के बहाने समाजवादी पार्टी की पोल खोली जा सके।अब तो  हद हो  गई जब अयोध्या स्थित भव्य राम मंदिर के चढ़ावे को लेकर उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक नया विवाद खड़ा हो गया । समाजवादी पार्टी (सपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने रविवार को दावा किया कि मंदिर के चढ़ावे में आए करोड़ों रुपये गायब हो गए हैं। इस मामले को लेकर उन्होंने सीधे तौर पर सरकार और मंदिर ट्रस्ट को घेरा है, वहीं श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने इन आरोपों पर अपनी प्रतिक्रिया दी है। यादव ने इस मामले में अदालत से स्वतः संज्ञान लेने का अनुरोध किया है।उन्होंने रविवार को ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में कहा  कि समस्त विश्व में भगवान राम के उपासकों के लिए ये एक बेहद संवेदनशील समाचार है कि ‘राम मंदिर’ के चढ़ावे की करोड़ों की रकम गायब पायी गई है। यादव ने पोस्ट में आगे कहा कि ये मंदिर ट्रस्ट के लिए अत्यंत शर्मनाक स्थिति है। कोई भी सफाई देने के लिए सामने नहीं आना चाहता है।पूर्व मुख्यमंत्री ने यहाँ तक कहा कि अदालत से स्वतः संज्ञान लेने की जरूरत है  क्योंकि इसका सीधा संबंध वैश्विक स्तर पर समस्त सनातनी समाज की प्रभु राम में गहरी आस्था से जुड़ा है। सरकार की चुप्पी संदिग्ध है जबकि  श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय ने रविवार को एक बयान में कहा कि श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र का समय-समय पर आंतरिक ऑडिट होता रहता है। इस प्रक्रिया में ट्रस्ट और स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के प्रतिनिधि शामिल होते हैं। ऑडिट की प्रक्रिया कई दिनों तक चलती है। इन दिनों भी यही काम हो रहा है। अभी तक कोई खास बात सामने नहीं आई है।श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के न्यासी और निर्मोही अखाड़े के महंत दिनेन्द्र दास ने अखिलेश यादव के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए मीडिया से कहा अगर इस मामले में किसी ने कुछ गलत किया है, तो भगवान राम स्वयं उन्हें दंडित करेंगे। उन्होंने कहा कि अधिकारियों और सरकार द्वारा लिया गया कोई भी निर्णय ट्रस्ट को स्वीकार्य है।लोगों का कहना है कि अखिलेश यादव पर कई बार हिन्दू विरोधी होने  व राम मंदिर विरोधी होने का ठप्पा लग चुका है और यदि उनका आरोप बेबुनियाद व राजनीतिक प्रेरित साबित होता है तो वे शायद अपने 108 सदस्य भी खो देंगे ।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *