वीरेंद्र बहादुर सिंह
कल्पना कीजिए कि आप एक विशाल उजाड़ जगह में खड़े हैं। चारों ओर केवल रेत, मिट्टी और वीरानी है। आसपास कहीं पानी का कोई स्रोत नहीं है, पानी की एक भी बूंद नहीं है। आप चलते जाते हैं, चलते जाते हैं, लेकिन उसका कोई अंत नहीं आता। कुछ समय बाद आपको पता चलता है कि दो दशक पहले यहां विशाल जलाशय था, जो सूख गया है। एक समय लाखों लोगों की प्यास इस पानी से बुझती थी, हजारों एकड़ भूमि में होने वाली खेती को इससे सिंचाई का पानी मिलता था, लेकिन अब कुछ भी नहीं बचा है।यह कोई साइंस फिक्शन फिल्म की स्क्रिप्ट नहीं है या वास्तव में कोई कल्पना का विषय नहीं है। यह ऐसी वास्तविकता है, जिसका हमें और हमारी भावी पीढ़ी को आगामी वर्षों में सामना करना पड़ेगा। कुछ समय पहले हुआ एक अध्ययन हमारी इस वास्तविकता की ओर उंगली उठा रहा है। हमारी पृथ्वी और हमारी भावी पीढ़ी का एक कड़वा सत्य उजागर कर रहा है। हाल ही में प्रस्तुत वैश्विक शोध ने दुनिया के अनेक देशों के नीति-निर्माताओं और थिंक टैंक की नींद उड़ा दी है। उसमें बताया गया है कि दुनिया भर के देशों में स्थित प्राकृतिक जलाशयों, कृत्रिम जलाशयों और बांधों में अकल्पनीय मात्रा में मिट्टी और गाद जमा हो रही है। उसके कारण इन जलाशयों की पानी संग्रह करने की क्षमता धीरे-धीरे घट रही है।अध्ययन में बताया गया है कि मिट्टी और गाद के कारण जो सेडिमेंटेशन की प्रक्रिया हो रही है, वह इन जलाशयों को बेकार कर रही है। अध्ययन में स्पष्ट बताया गया है कि मिट्टी और गाद के कारण प्रत्येक दशक में जलाशयों की पानी संग्रह करने की क्षमता में 7.3 प्रतिशत की भारी कमी हो रही है। उसका सबसे भयानक प्रभाव छोटे तालाबों और जलाशयों पर पड़ रहा है। जानकार मानते हैं कि यदि जलाशयों में सेडिमेंटेशन की यही स्थिति जारी रही तो आगामी तीन दशकों में दुनिया के आधे से अधिक जलाशय पानी संग्रह करने के लिए बेकार हो जाएंगे। उसके कारण दुनिया की 2 अरब से अधिक आबादी को पीने का पानी और भोजन नहीं मिलेगा। उन्हें खाने-पीने के लिए भटकना पड़ेगा और दुनिया भर में हाहाकार मच जाएगा।उल्लेखनीय है कि किसी भी नदी पर जब बांध बनाया जाता है, तब उसके पीछे विशाल जलाशय बनाया जाता है।read more:https://pahaltoday.com/resolution-to-make-visheshwarganj-child-labour-free-shekhapur-gram-panchayat-declared-child-labour-free/ अब स्थिति ऐसी होती है कि नदी जब अपने स्रोत से बहती हुई आती है, तब अपने साथ केवल पानी ही नहीं, बल्कि मिट्टी, कंकड़, पत्थर, रेत तथा झरनों में आने वाला कचरा भी खींच लाती है। इन सभी सामग्रियों और जैविक अवशेषों को गाद अथवा सेडिमेंट कहा जाता है। प्राकृतिक प्रक्रिया के अनुसार ये सभी वस्तुएं नदी में बहती रहती हैं और समुद्र में समा जाती हैं। इसके अतिरिक्त नदी के आसपास के प्रदेशों में स्थिर हो जाती हैं और वहां उपजाऊ भूमि का निर्माण करती हैं।अब जब नदी पर बांध बनाया जाता है तो जो दीवार खड़ी होती है, वह गाद को रोक लेती है। दूसरी ओर स्थिति ऐसी होती है कि धीरे-धीरे यह गाद बांध के दरवाजों में, पाइपों में और आसपास की धार पर जमा होने लगती है। उसके बाद धीरे-धीरे वह जलाशय के तल में एकत्र होने लगती है। जलाशय के तल में यह गाद और कचरा जमा होने लगता है, तब वह एक मोटी परत बना देता है और उसके कारण जलाशय की गहराई कम होने लगती है। इस पूरी प्रक्रिया को सेडिमेंटेशन कहा जाता है। जलाशयों के लिए यह एक धीमी मृत्यु है। यह कचरा और गाद धीरे-धीरे जलाशयों को भीतर से समाप्त कर देते हैं। जानकारों के मतानुसार यह प्रक्रिया बहुत धीमी है, लेकिन इसके दीर्घकालिक प्रभाव बहुत बड़े हैं। इस गाद के कारण ऐसे जलाशयों की क्षमता प्रत्येक दशक में 7.3 प्रतिशत घट रही है। उसका अर्थ यह है कि हर दस वर्ष में हम जलाशयों का आठवां भाग खो रहे हैं। उसके कारण नदियों के जो बांध 100 वर्ष की क्षमता मानकर बनाए गए थे, वे केवल 40-50 वर्षों में ही हांफने लगे हैं। इसके अतिरिक्त दुनिया भर में बढ़ती आबादी के कारण पानी की मांग बढ़ी है और इन जलाशयों की भंडारण क्षमता घटने से पानी का अभाव उत्पन्न हो रहा है।शोधकर्ताओं का कहना है कि इस गाद के कारण सबसे अधिक प्रभाव छोटे जलाशयों पर पड़ा है। बड़े बांधों में तो जलाशयों में बैकअप के लिए डेड स्टोरेज की व्यवस्था की जाती है, लेकिन छोटे तालाबों और जलाशयों में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं होती। उसके कारण धीरे-धीरे उनका आकार घटता जाता है। उल्लेखनीय है कि छोटे जलाशयों की गहराई अधिक नहीं होती तथा उनका क्षेत्रफल भी सीमित होता है। इसलिए ऐसे जलाशयों में गाद भरने लगे तो वे तेजी से सूखने लगते हैं।कैचमेंट क्षेत्र में मानवीय गतिविधियां बढ़ गई हैं। यहां खेती, सिंचाई और आवासीय क्षेत्रों के बढ़ने के कारण जंगल कट गए, भूमि कम हो गई और इसलिए नदी किनारों पर मिट्टी का कटाव बढ़ने लगा। यह कटी हुई मिट्टी और कचरा जलाशयों में जाने लगा और वे भरने लगे। इसके अतिरिक्त बांधों की देखभाल और रखरखाव में भी सरकारी तंत्र द्वारा बड़े पैमाने पर लापरवाहियां सामने आती रहती हैं। छोटे जलाशयों की सफाई पर ध्यान नहीं दिया जाता और उसके कारण तालाबों के बाहर और भीतर बड़े पैमाने पर कचरा जमा होने लगता है।गांवों और छोटे शहरों को अधिक प्रभाव पड़ने वाला है। ऐसे स्थानों पर एक-दो ही जलाशय होते हैं। छोटे नगरों और गांवों में ऐसे जलाशय ही उनकी जीवन व्यवस्था, अर्थव्यवस्था और सामाजिक व्यवस्था का हिस्सा होते हैं। स्थानीय सिंचाई, खेती, पशुपालन, घरेलू आवश्यकताएं तथा ग्रामीण अथवा छोटे नगर की आबादी की अन्य जरूरतें इन्हीं पर निर्भर होती हैं। ऐसे छोटे जलाशय यदि कचरे से भरने लगें और उनमें सेडिमेंटेशन बढ़ जाए तो व्यापक स्तर पर नुकसान होने की संभावना है।सऐसा होने पर उसका सीधा प्रभाव ग्रामीण भारत और देश की अर्थव्यवस्था की आत्मा पर प्रहार जैसा लगेगा। उससे व्यापक नुकसान होने की संभावना है। यह अध्ययन करने वाले वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि केवल भारत ही नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर यदि छोटे जलाशयों और कृत्रिम जलाशयों का संरक्षण नहीं किया गया तो पानी की बड़ी कमी उत्पन्न होगी।read more:https://pahaltoday.com/peepal-pakad-and-banyan-trees-are-a-boon-for-life-mohammad-shakib/वर्ष 2060 तक 2 अरब से अधिक लोगों के सामने भोजन और पानी की समस्याएं खड़ी हो जाएंगी। उस समय उसका समाधान लाना और अधिक कठिन सिद्ध होगा।जानकारों के अनुसार दुनिया में 16 ऐसे हॉटस्पॉट हैं, जहां सेडिमेंटेशन की स्थिति खराब है। इनमें दक्षिण एशिया में भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश में बहने वाली हिमालयी नदियों की स्थिति गंभीर है। अमेरिका के दक्षिण-पश्चिमी भाग में अभी से पानी की कमी और सूखे जैसी स्थिति दिखाई दे रही है। दूसरी ओर मिडिल ईस्ट के देशों और आस्ट्रेलिया में भी पानी की समस्या उत्पन्न होगी।दुनिया भर की 60 प्रतिशत से अधिक खेती सिंचाई के लिए बनाए गए बांधों और जलाशयों पर निर्भर है। आने वाले चार-पांच दशकों में इन जलाशयों और उनकी नहरों में पानी ही नहीं बचेगा। गेहूं, अन्य अनाज तथा गन्ने जैसी अधिक पानी मांगने वाली फसलों में कमी आएगी अथवा वे असफल होने लगेंगी।एशिया और अफ्रीका जैसे कृषि-प्रधान देशों में अनाज की भारी कमी उत्पन्न होगी। खाद्यान्नों के भाव आसमान छूने लगेंगे और भुखमरी की स्थिति पैदा होगी। बड़े-बड़े शहर, जो पीने के पानी के लिए जलाशयों पर ही निर्भर हैं, उन्हें व्यापक नुकसान होगा।यदि ये जलाशय भर जाएंगे तो शहरों में पानी नहीं पहुंचेगा। नलों में पानी नहीं आएगा तो उसे प्राप्त करने के लिए हिंसा होगी और गृहयुद्ध जैसी स्थिति उत्पन्न हो सकती है। इसके अतिरिक्त जिस प्रकार भूजल का उपयोग किया जा रहा है, आने वाले तीन-चार दशकों में उसका स्तर भी नीचे जाता रहेगा, इसलिए यह संकट और अधिक गंभीर बन जाएगा।यदि बांध और जलाशय काम करना बंद कर देंगे तो बिजली उत्पादन को भी बड़ा नुकसान होगा। अधिकांश जलविद्युत परियोजनाएँ प्रभावित हो जाएँगी। बिजली आपूर्ति बाधित होगी तो अन्य कार्य भी रुक जाएँगे और पूरा अर्थतंत्र प्रभावित हो जाएगा।शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि सेडिमेंटेशन के कारण जलाशयों की स्थिति लगातार खराब हो रही है। इस अध्ययन के लिए दुनिया भर के लगभग 5.50 लाख छोटे-बड़े जलाशयों को शामिल किया गया था।अध्ययन के दौरान यह सामने आया कि दुनिया के 95 प्रतिशत छोटे जलाशय, जिनका क्षेत्रफल 1 वर्ग किलोमीटर या उससे कम है, भरने लगे हैं। अगले तीन दशकों में ऐसे जलाशय अपनी भंडारण क्षमता खो देंगे। उनके अस्तित्व पर बड़ा संकट आ जाएगा।शोधकर्ताओं का मानना है कि वर्ष 2060 तक 2,75,000 से अधिक जलाशय अपनी आधे से अधिक क्षमता खो देंगे। उनके मृतप्राय स्थिति में पहुंच जाने की भी संभावना है।इसके अतिरिक्त इस स्थिति का सीधा प्रभाव 2 अरब से अधिक आबादी पर पड़ेगा। वैश्विक आबादी का लगभग चौथा भाग पानी की कमी के कारण पानी और भोजन के बिना भटकने को मजबूर होगा।दुनिया की 25 प्रतिशत सिंचाई-आधारित खेती को व्यापक नुकसान पहुंचेगा। उसके कारण वैश्विक स्तर पर खाद्यान्नों की कमी उत्पन्न होगी। परिणामस्वरूप दुनिया भर में भुखमरी बढ़ने लगेगी।