अशोक भाटिया
‘कश्मीर भारत का अटूट हिस्सा’ जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न और अविभाज्य हिस्सा था और हमेशा रहेगा। इसके विपरीत कोई भी दावा बेबुनियाद और ऐतिहासिक तथ्यों के खिलाफ है। पाकिस्तान की खोखली बयानबाजी और झूठे दावों से यह बुनियादी सच्चाई नहीं बदलेगी। दरअसल संयुक्त राष्ट्र में भारत ने एक बार फिर पाकिस्तान को यह कड़ा जवाब दिया है। भारत के स्थायी प्रतिनिधि पी। हरीश ने सुरक्षा परिषद में पाकिस्तान के बयानों पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि इस्लामाबाद लगातार संयुक्त राष्ट्र के मंच का दुरुपयोग कर रहा है और भ्रामक जानकारी फैलाने की कोशिश कर रहा है।संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि पी। हरिश ने सुरक्षा परिषद की वार्षिक रिपोर्ट पर चर्चा के दौरान पाकिस्तान की ओर से जम्मू-कश्मीर का मुद्दा उठाए जाने पर तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान लगातार सुरक्षा परिषद के मंच का इस्तेमाल अपने राजनीतिक हितों को साधने और गलत जानकारी फैलाने के लिए कर रहा है। पी। हरीश ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की सदस्यता कोई विशेषाधिकार नहीं, बल्कि एक बड़ी जिम्मेदारी है। ऐसे में सदस्य देशों से अपेक्षा की जाती है कि वे परिषद के मंच का इस्तेमाल रचनात्मक और जिम्मेदार तरीके से करें, न कि झूठे और पक्षपातपूर्ण एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए।उन्होंने पाकिस्तान पर निशाना साधते हुए कहा कि सुरक्षा परिषद ऐसा मंच नहीं है जहां राजनीतिक मकसद से गलत और भ्रामक नैरेटिव पेश किए जाएं। पाकिस्तान को एक जिम्मेदार सदस्य की तरह व्यवहार करना चाहिए और अंतरराष्ट्रीय मंचों का दुरुपयोग बंद करना चाहिए।यह जवाब पाकिस्तान को तब मिला जब उसने जम्मू कश्मीर का पुराना राग जरी रखा इसी दौरान भारत ने जम्मू-कश्मीर के मुद्दे पर अपना पुराना और स्पष्ट रुख भी दोहराया। पी। हरीश ने कहा कि जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न और अविभाज्य हिस्सा था, है और हमेशा रहेगा। इस मुद्दे पर पाकिस्तान की ओर से किए जाने वाले दावे और बयान पूरी तरह निराधार हैं और वे जमीनी सच्चाई को नहीं बदल सकते। भारत के खिलाफ जहरीला प्रोपेगैंडा फैलाते हुए पाकिस्तानी प्रधानमंत्री ने कहा कि 1947 में शुरू हुई कश्मीरियों के अनंत बलिदानों की कहानी आज भी जारी है। उन्होंने जम्मू-कश्मीर भारतीय सैनिकों की तैनाती को क्रूरता बताया और कहा कि दमन भी कश्मीरियों के संकल्प को तोड़ने में नाकाम रहा है। शहबाज ने कहा कि कश्मीरियों की तीसरी पीढ़ी भी आत्मनिर्णय के अपने अधिकार को हासिल करने के लिए मजबूत है। मूली सुधार ने सुरक्षा परिषद के कामकाज के बुनियादी तरीके में कोई खास बदलाव नहीं किया है। उस वक्त भी केवल गैर-स्थायी श्रेणी का विस्तार किया गया था।read more:https://pahaltoday.com/sojats-henna-industry-stalled-due-to-the-impact-of-the-war-with-exports-worth-%e2%82%b9250-crore-stalled-forcing-thousands-of-workers-to-return-home/ऐसे में वास्तविक और सार्थक सुधार लागू करने के लिए स्थायी और गैर-स्थायी दोनों श्रेणियों का विस्तार जरूरी है। आश्चर्य इस बात का है कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय सेना के हमलों में हुई बेइज्जती के बाद भी पाकिस्तान अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहा है। इसके पहले भी पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ एक बार फिर कश्मीर को लेकर जहर उगला था । उन्होंने संयुक्त राष्ट्र का रोना रोते हुए कहा था कि कश्मीर मुद्दे का समाधान ही क्षेत्र में शांति की एकमात्र गारंटी है। कथित कश्मीर विलय दिवस के मौके पर संदेश में शहबाज ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों के अनुसार कश्मीर मुद्दे के समाधान की मांग की और कहा कि पाकिस्तान की थी व कहा था कि सरकार और जनता कश्मीरियों को राजनयिक, नैतिक और राजनीतिक समर्थन देना जारी रखेगी।पाकिस्तान हर साल 19 जुलाई को कश्मीर विलय दिवस मनाता है। साल 1947 में इसी तारीख को अखिल जम्मू और कश्मीर मुस्लिम सम्मेलन का श्रीनगर अधिवेशन हुआ था। शहबाज ने कहा, ‘उस दिन कश्मीर के लोगों ने जम्मू और कश्मीर राज्य के लिए पाकिस्तान में विलय का प्रस्ताव पारित किया था।’ भारत के खिलाफ जहरीला प्रोपेगैंडा फैलाते हुए पाकिस्तानी प्रधानमंत्री ने कहा कि 1947 में शुरू हुई कश्मीरियों के अनंत बलिदानों की कहानी आज भी जारी है। उन्होंने जम्मू-कश्मीर भारतीय सैनिकों की तैनाती को क्रूरता बताया और कहा कि दमन भी कश्मीरियों के संकल्प को तोड़ने में नाकाम रहा है। शहबाज ने कहा कि कश्मीरियों की तीसरी पीढ़ी भी आत्मनिर्णय के अपने अधिकार को हासिल करने के लिए मजबूत है। जानकार सूत्रों के अनुसार अमेरिका-ईरान तनाव की आंच पाकिस्तान तक पहुंच रही हैं। भारत के इस पड़ोसी मुल्क की आम जनता इस समय खुद को महंगाई की मार के बीच खून के आंसू रोने को मजबूर बता रही है। क्योंकि, रहने-खाने से लेकर आने-जाने तक के खर्चों में बेतहाशा बढ़ोतरी हुई है। ऐसे में लोअर क्लास, लोअर मिडिल क्लास और मिडिल क्लास का भट्टा बैठा जा रहा है। पाकिस्तान के कुछ लोगों का कहना है कि पेट्रोल 250 रुपये लीटर बिक रहा था, जो महंगाई के बाद 450 रुपये प्रति लीटर तक पहुंच गया था। मिडिल ईस्ट में चल रहे संघर्ष के चलते पाकिस्तान में संकट के बादल छाए हुए हैं। जानिए लाइव हिन्दुस्तान के साथ पूरी बात।इस्लामाबाद के कई निवासियों का कहना है कि अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव का असर अब उनकी रोजमर्रा की जिंदगी पर दिखाई देने लगा है। लोगों का आरोप है कि ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी ने रोजमर्रा की जिंदगी को और महंगा बना दिया है। सैलरी में कोई बढ़ोतरी नहीं हुई, लेकिन खाने-पीने, आने-जाने से लेकर अन्य जरूरी सामानों की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं। निवासियों के मुताबिक, हाल के दिनों में पेट्रोल की कीमतें करीब 250 पाकिस्तानी रुपये प्रति लीटर से बढ़कर 450 रुपये प्रति लीटर तक पहुंच गई थीं। हालांकि बाद में इनमें कुछ नरमी आई, लेकिन कीमतें अभी भी 400 रुपये प्रति लीटर से ऊपर बताई जा रही हैं। डीजल की कीमतों में भी इसी तरह की बढ़ोतरी की शिकायतें सामने आई हैं। लोगों का कहना है कि ईंधन महंगा होने का सीधा असर ट्रांसपोर्ट लागत पर पड़ता है, जिससे बाजार में खाद्य पदार्थों और अन्य जरूरी सामानों की कीमतें भी बढ़ जाती हैं। आम जनता ने बढ़ती महंगाई के लिए अमेरिका-ईरान तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के आसपास बने तनाव को जिम्मेदार ठहराया है। आपको बताते चलें कि यह दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्गों में से एक माना जाता है। यदि इस इलाके में तनाव बढ़ता है, तो पूरी दुनिया में तेल सप्लाई प्रभावित हो सकती है, जिसका असर तेल आयात करने वाले देशों पर पड़ता है। कुछ लोगों का दावा है कि महंगाई में 300 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी देखने को मिली है। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन स्थानीय नागरिकों का कहना है कि बढ़ती कीमतों ने गरीब और मध्यम वर्ग के लिए जीवन मुश्किल बना दिया है। एक निवासी ने बताया कि वह पिछले एक महीने से अपनी कार घर पर खड़ी रखने को मजबूर है, क्योंकि पेट्रोल का खर्च उठाना मुश्किल हो गया है। उसने कहा कि अब मोटरसाइकिल चलाना भी महंगा पड़ने लगा है। इस्लामाबाद के कई निवासियों ने क्षेत्र में जारी तनाव और सैन्य कार्रवाई पर चिंता जताई है। उनका मानना है कि तनाव जितना लंबा खिंचेगा, आर्थिक अनिश्चितता उतनी ही बढ़ेगी। लोगों ने सभी पक्षों से बातचीत और कूटनीतिक समाधान को प्राथमिकता देने की अपील की है। उनका कहना है कि शांति ही ईंधन की कीमतों को स्थिर रखने, महंगाई पर नियंत्रण पाने और आम लोगों को राहत देने का सबसे प्रभावी रास्ता है। यह एक कटु भू-राजनीतिक यथार्थ है। विश्लेषकों का मानना है कि पाकिस्तान की सरकारें अपनी चरमराती अर्थव्यवस्था, कमरतोड़ महंगाई और घरेलू राजनीतिक अस्थिरता से जनता का ध्यान भटकाने के लिए अक्सर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कश्मीर का मुद्दा उठाती हैं। खुद PoK ( पाकिस्तान द्वारा जबरदस्ती दबाया हुआ कश्मीर ) और गिलगित-बाल्टिस्तान में भारी अशांति है और जनता मूल सुविधाओं व अधिकारों के लिए सड़कों पर उतरती रही है।