हवामहल 

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा:रामपुरिया गांव के स्वघोषित चाणक्य ‘झपटल सिंह’ का मानना था कि जनता उस मासूम बच्चे की तरह है जिसे प्लास्टिक का झुनझुना थमाकर उसकी असली वसीयत पर अंगूठा लगवाया जा सकता है। इस बार उन्होंने प्रधानी के चुनाव में किसी सड़क या नाली का वादा नहीं किया, बल्कि ‘शुद्ध हवा’ का टेंडर पेश कर दिया। झपटल सिंह ने गांव के प्राइमरी स्कूल की छत पर तीन पुराने लोहे के पंखे लगवाए और उन्हें ‘स्वच्छ वायु संयंत्र’ घोषित कर दिया। उनका तर्क था कि आने वाले समय में सांस लेना भी एक विलासिता होगी, और जो उन्हें वोट देगा, उसे ‘प्रीमियम ऑक्सीजन’ का कोटा मुफ्त मिलेगा। गांव के लोग, जो अब तक नीम और बरगद की मुफ्त हवा फांक रहे थे, अचानक इस ‘विदेशी तकनीक’ के मोहपाश में फंस गए। झपटल सिंह की बातों में इतना आकर्षण था कि गांव के गदहे भी अपनी रेकन छोड़कर उनके चुनावी भाषण सुनने के लिए कतारबद्ध खड़े हो जाते थे।प्रचार के अंतिम दिन झपटल सिंह ने गांव के मैदान में एक विशाल गुब्बारा फुलाया और उसे ‘विकास का पावरहाउस’ नाम दिया। उन्होंने गांव वालों से कहा कि इस गुब्बारे के भीतर दिल्ली और मुंबई की ‘पॉश’ कॉलोनियों की हवा भरी है, जिसे सूंघते ही आदमी की बुद्धि आइंस्टीन जैसी हो जाएगी और उसे गरीबी का अहसास होना बंद हो जाएगा। विपक्षी उम्मीदवार ‘गपोड़ी लाल’ ने शोर मचाया कि यह तो केवल खाली हवा है, लेकिन झपटल सिंह ने पलटवार किया कि गपोड़ी लाल को हवा की ‘क्वालिटी’ की समझ नहीं है क्योंकि उनकी नाक में तो हमेशा गोबर की गंध बसी रहती है। देखते ही देखते, पूरा रामपुरिया गांव उस गुब्बारे के चारों ओर परिक्रमा करने लगा। लोगों को लगने लगा कि अब बिना पंखे के भी उनकी किस्मत की खिड़कियां खुल जाएंगी और वे बिना कुछ किए ही ‘स्मार्ट नागरिक’ की श्रेणी में आ जाएंगे।मतदान के अगले दिन जब झपटल सिंह की जीत का डंका बजा, तो जनता गुब्बारे के पास ‘स्मार्ट हवा’ लेने के लिए उमड़ पड़ी। झपटल सिंह ने एक बड़ी सी सुई निकाली और बड़े गर्व के साथ गुब्बारे में चुभो दी। एक ज़ोरदार ‘फटाक’ की आवाज़ हुई और गुब्बारा पिचक कर ज़मीन पर गिर गया। जनता के चेहरे पर हवा का एक झोंका तक नहीं लगा। लोग हक्के-बक्के रह गए और झपटल सिंह की ओर देखने लगे। झपटल सिंह अपनी मूंछों पर ताव देते हुए बोले— “भाइयों, वह हवा इतनी बारीक और हाई-टेक थी कि उसे सिर्फ वही महसूस कर सकता है जिसके पास ‘प्रधान’ जैसा विजन हो! बाकी आप लोग तो साधारण फेफड़े वाले हैं, आपको तो बस मुफ्त की धूल फांकने की आदत है।” जनता एक-दूसरे का मुंह ताकती रह गई और झपटल सिंह अपनी चमचमाती गाड़ी में बैठकर ‘वायु प्रदूषण नियंत्रण’ का सरकारी फंड डकारने के लिए शहर की ओर उड़नछू हो गए।

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