ओंकार नाथ सिंह
जबसे अयोध्या में प्रभु श्री राम के मंदिर में चढ़ावे की चोरी की बात सबके सामने आई तबसे भाजपा, आर एस एस और मंदिर बनाने वाले हिंदू संगठनों ने कांग्रेस पार्टी पर जोरदार तरीके से आरोप लगाना शुरू कर दिया कि जो कांग्रेस पार्टी प्रभु राम को काल्पनिक कहती है आज मंदिर के चढ़ावे चोरी पर उसे कहने का कोई अधिकार नहीं है। इसी प्रकार वह समाजवादी पार्टी पर आरोप लगाती है कि जिन्होंने राम भक्तों पर गोलियां चलवाई उन्हें मंदिर के चढ़ावा चोरी पर बोलने का कोई अधिकार नहीं है। इसी बीच राज्यसभा में उप नेता विरोधी दल कांग्रेस सांसद प्रमोद तिवारी जी ने पत्रकारों के सवाल के जवाब में कहा कि राम को काल्पनिक कहने की शुरुआत करने वाले तो पूर्व प्रधानमंत्री अटल विहारी बाजपेयी जी हैं जिन्होंने सेतु समुद्रम शिल्प कैनाल परियोजना की मंज़ूरी दी। प्रमोद तिवारी जी ने कहा कि यदि कांग्रेस प्रभु राम को काल्पनिक मानती तो 1989 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी जी अयोध्या में राम मंदिर का शिलान्यास क्यों करते?फिर मैंने इस तथ्य की जांच की और प्रमोद तिवारी जी के कथन को सत्य पाया। इसकी शुरुआत इस प्रकार हुई। 15 सितंबर 1998 को तमिलनाडु के चेन्नई में एम डी एम के द्वारा एक सभा आयोजित की गई जिसमे तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल विहारी बाजपेयी ने घोषणा की कि वह सेतु समुद्रम शिप कैनाल प्राजेक्ट को पूरा करेंगे। यह समाचार द हिंदू समूह के फ़्रंट लाइन मैगज़ीन में खूब ज़ोर शोर से छपा । इस परियोजना का मुख्य उद्देश्य भारत के पूर्वी और पश्चिम तटों को जोड़ने के लिए एक नौवहन मार्ग बनाना था जो मन्नार की खाड़ी को पाक जलडमरूमध्य से जोड़ता। अभी तक जो जहाज़ पूर्वी तट से पश्चिम तट को जाते थे उन्हें श्री लंका से होकर जाना पड़ता था।इस परियोजना से समुद्री यात्रा की 83 किलोमीटर (44.9 नॉटिकल मील ) की दूरी कम हो जाती जिससे 36 घंटे के समय की बचत होती और तेल की खपत भी कम होती और हम श्री लंका जाने से बच जाते। यह परियोजना कोई नई नहीं थी । सबसे पहले इसकी परिकल्पना 1860 में ब्रिटिश इंजीनियर अल्फ्रेड डूंडास टेलर ने की थी। उन्होंने इसका मार्ग भी तय किया लेकिन किन्हीं कारणों वश इसको अमली जामा नहीं पहनाया जा सका।1999 में एन डी ए घटक में डी एम के भी शामिल थी। उन्होंने अटल जी पर दबाव बनाया और अटल जी ने इसको अमली जामा पहनाने का काम शुरू किया । उनकी सरकार ने ही यह मार्ग भी तय किया जिसके मध्य में राम सेतु आता है और इसके लिए धनराशि भी स्वीकृति की।फ़्रंट लाइन मैगज़ीन ने लिखा कि इस परियोजना का स्वागत करने वालों में दक्षिण भारत राज्य हैं। उनका कहना था कि इस चैनल के शुरू होने से दक्षिण भारत से समुद्री तट पर व्यापार के अवसर बढ़ेंगे और आर्थिक विकास तेज होगा। इससे तूती कोरीन बंदरगाह , चेन्नई, विशाखापत्तनम, तमिलनाडु के तटीय शहर, 138 गाँव और कस्बे , विशेष रूप से रामेश्वरम और आस पास के 13 छोटे बंदरगाह सीधे समुद्री व्यापार और आर्थिक गतिविधियों से जुड़ सकेंगे। रक्षा विशेषज्ञों का कहना था कि इसके प्रारंभ से भारत को एक अच्छा नौसैनिक अड्डा भी मिलेगा और नौ सेना दुनिया के सबसे मौज़ूद सेनाओं में से एक हो जाएगी। मगर इसी बीच इस परियोजना का विरोध पूर्व मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री सुश्री उमा भारती ने करना शुरू किया। उनका कहना था कि इस मार्ग के बीच में राम सेतु आता है और इसको तोड़ने से हिंदुओं की आस्था को ठेस पहुंचेगी । सरकार ने यह गलत फैसला लिया है। उन्होंने 2003 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल जी एवं तत्कालीन उप प्रधानमंत्री आडवाणी जी को खत लिखा और उन दोनों से इस परियोजना को रद्द करने की मांग की और साथ ही जनता से माफ़ी मांगने को भी कहा। लेकिन उनकी किसी बात पर तत्कालीन सरकार ने ध्यान नहीं दिया।read more:https://khabarentertainment.in/call-to-embrace-dr-syama-prasad-mookerjees-ideas-bjp-organizes-an-ideological-seminar/ऐसा नहीं था कि इस परियोजना का विरोध दक्षिण में नहीं हुआ। अन्ना डी एम के प्रमुख जयललिता ने इसका खुला विरोध किया । उनके अनुसार वहाँ का पर्यावरण नष्ट होता । वहाँ के मछुआरों ने भी इसका विरोध किया। मगर तत्कालीन सरकार ने किसी की भी नहीं सुनी। इसी बीच एन डी ए सरकार चली गई और यू पी ए की सरकार डाक्टर मनमोहन सिंह के नेतृत्व में आ गई। चूँकि पूर्व वर्ती सरकार ने सारी स्वीकृति दे रखी थी । धनराशि भी स्वीकृति थी । पत्रावली में मार्ग भी सुनिश्चित था इसलिए मनमोहन सिंह की सरकार ने इसकी शुरुआत 2 जुलाई 2005 को की। फ्रंट लाइन ने लिखा कि 145 वर्षों बाद यहशुरुआत हुई। इसी बीच इसका पुनः विरोध भाजपा ने शुरू किया जिसने इसको बनाये जाने की स्वीकृति दी थी। रामसेतु जिसे कुछ लोग आदम ब्रिज भी कहते हैं , तोड़ने का विरोध शुरू कर दिया। यह मामला सर्वोच्च न्यायालय में गया जिसमे मनमोहन सिंह की सरकार ने कहा कि पश्चिम के लोग इसे आदम ब्रिज कहते हैं और हिंदू आस्था इसे रामसेतु मानती है। मगर इसका कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है जिससे यह गारंटी के साथ कहा जा सके कि यह राम सेतु ही है आदम ब्रिज नहीं। इसी के साथ 2007 में सरकार ने यह हलफनामा भी पेश किया कि वह दूसरा वैकल्पिक मार्ग बिना राम सेतु को नुकसान पहुंचाएं प्रस्तुत करेगी। तब से यह मामला सर्वोच्च न्यायालय में लम्बित है और इस परियोजना पर काम रुका है। इसी को लेकर भाजपा के लोगों ने कांग्रेस पर हमला करना शुरू किया कि कांग्रेस ने राम को काल्पनिक कहा जबकि काल्पनिक शब्द कहीं प्रयोग ही नहीं हुआ। मज़े की बात यह है कि जिस भाजपा ने इस परियोजना को शुरू किया और बाद में विरोध भी किया जिस कारण यह परियोजना न्यायालय में रुकी है और इसी पार्टी की सरकार केंद्र में पिछले बारह वर्षों से सत्ता में है मगर न तो सरकार ने इस परियोजना को निरस्त किया और न ही कोई वैकल्पिक मार्ग का प्लान प्रस्तुत किया। हाँ कांग्रेस पर आरोप लगाती है कि वह राम को काल्पनिक मानते हैं।इन सब बातों से ऐसा प्रतीत होता है कि प्रभु राम को काल्पनिक मानने की शुरुआत भी भाजपा के मुख द्वारा ही की गई।