जल ही जीवन है”: एक गहराता संकट और समाधान की राह

Kroshn kumar tiwari

नीति आयोग की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत अपने इतिहास के सबसे बड़े जल संकट से जूझ रहा है।यदि वर्तमान परिस्थितियां और जल प्रबंधन का यही ढर्रा जारी रहा, तो भारत तेजी से ‘जल दिवालियापन’ (Water Bankruptcy) की ओर बढ़ जाएगा। जल दिवालियापन वह भयावह स्थिति है जहां देश की मांग के मुकाबले पानी की उपलब्धता न के बराबर रह जाएगी और पानी की एक-एक बूंद के लिए गृह युद्ध जैसी स्थितियां पैदा हो सकती हैं।भारत इस समय एक ऐसे दोराहे पर खड़ा है जहां लिया गया एक गलत कदम हमें जल दिवालियापन के अंधकार में धकेल सकता है। सरकार द्वारा ‘जल शक्ति मंत्रालय’ का गठन और ‘हर घर जल’ जैसी योजनाएं सही दिशा में उठाए गए कदम हैं, लेकिन ये तब तक सफल नहीं हो सकतीं जब तक देश का हर नागरिक अपनी जिम्मेदारी न समझे।पानी का दिवालियापन किसी भी आर्थिक मंदी से अधिक खतरनाक है क्योंकि पैसे छापे जा सकते हैं, लेकिन पानी फैक्ट्रियों में नहीं बनाया जा सकता। यदि हम अपनी आने वाली पीढ़ियों को एक सुरक्षित भविष्य देना चाहते हैं, तो हमें आज ही “पानी की हर बूंद” का हिसाब रखना होगा। समय कम है, और संकट हमारे दरवाजे पर दस्तक दे रहा है। जल संचयन अब एक विकल्प नहीं, बल्कि हमारे अस्तित्व की अनिवार्य शर्त है।र्थिक दुनिया में दिवालियापन (Bankruptcy) तब होता है जब किसी व्यक्ति या देश की देनदारियां उसकी संपत्ति से अधिक हो जाती हैं।read more:https://pahaltoday.com/the-essence-of-prasad-is-to-receive-the-blessings-of-the-deity-to-whom-it-is-offered/ ठीक इसी तरह, जब किसी देश में पानी की कुल मांग उसकी वार्षिक पुनर्चक्रण योग्य (Renewable) जल उपलब्धता से कहीं अधिक हो जाती है, और भूजल (Groundwater) के भंडार पूरी तरह खाली हो जाते हैं, तो उसे जल दिवालियापन कहा जाता है।भारत में विश्व की कुल आबादी का लगभग 18% हिस्सा रहता है, लेकिन दुनिया के नवीकरणीय जल संसाधनों का केवल 4% ही हमारे पास है। यह असंतुलन ही हमारे जल संकट की जड़ है।

संकट के प्रमुख संकेतक और वर्तमान स्थिति

नीति आयोग और विभिन्न अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की रिपोर्ट भारत की भयावह तस्वीर पेश करती हैं:

  • भूजल का अत्यधिक दोहन: भारत दुनिया में भूजल का सबसे बड़ा उपभोक्ता है। हम अमेरिका और चीन के संयुक्त उपयोग से भी अधिक भूजल जमीन से निकालते हैं।
  • शहरी जल संकट: भारत के 21 बड़े शहरों (जिनमें दिल्ली, बेंगलुरु, चेन्नई और हैदराबाद शामिल हैं) में भूजल स्तर शून्य के करीब पहुंच रहा है। चेन्नई में 2019 में आया ‘डे ज़ीरो’ (Day Zero) इसका जीवंत और डरावना उदाहरण था।
  • प्रदूषित जल: उपलब्ध पानी का लगभग 70% हिस्सा प्रदूषित है। भारत की पवित्र नदियां जैसे गंगा, यमुना और साबरमती आज गंदे नालों में तब्दील हो चुकी हैं।
  • प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता में गिरावट: आजादी के समय (1947) भारत में प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता लगभग 5,000 घन मीटर थी, जो आज घटकर 1,400 घन मीटर से भी कम रह गई है। यदि यह 1,000 घन मीटर से नीचे गिरती है, तो भारत को आधिकारिक रूप से ‘जल-अभावग्रस्त’ (Water Scarcity) देश घोषित कर दिया जाएगा।

जल दिवालियापन के दूरगामी परिणाम

यदि भारत इस संकट को रोकने में विफल रहता है, तो इसके परिणाम विनाशकारी होंगे:खाद्य असुरक्षा: पानी की कमी से कृषि उत्पादन ठप हो जाएगा। अनाज का कटोरा कहे जाने वाले पंजाब-हरियाणा जैसे राज्य मरुस्थल में बदल सकते हैं, जिससे देश में अकाल की स्थिति पैदा हो जाएगी।आर्थिक मंदी: नीति आयोग के अनुसार, जल संकट के कारण भारत के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में 6% तक की गिरावट आ सकती है। उद्योग बिना पानी के काम नहीं कर पाएंगे।स्वास्थ्य संकट और पलायन: दूषित पानी के कारण महामारियां फैलेंगी। पानी की तलाश में गांवों से शहरों की ओर सामूहिक पलायन होगा, जिससे सामाजिक ताना-बाना बिखर जाएगा और “जल युद्ध” (Water Wars) की स्थिति बन सकती है।इस आसन्न संकट से बचने के लिए हमें युद्ध स्तर पर ‘जल क्रांति’ की आवश्यकता है। इसके लिए निम्नलिखित कदम उठाए जाने अनिवार्य हैं:कृषि में सुधार और ‘प्रति बूंद अधिक फसल’ : हमें पारंपरिक सिंचाई विधियों (जैसे बाढ़ सिंचाई) को छोड़कर ड्रिप (टपक) और स्प्रिंकलर (फव्वारा) सिंचाई को अपनाना होगा।साथ ही, किसानों को बाजरा, रागी और दलहन जैसी कम पानी वाली फसलों (Millets) की खेती के लिए प्रोत्साहित करना होगा।वर्षा जल संचयन को अनिवार्य बनाना: भारत में हर साल पर्याप्त बारिश होती है, लेकिन हम इसका केवल 8% ही संचित कर पाते हैं। हर घर, सरकारी इमारत और कारखाने में वर्षा जल संचयन प्रणाली को कानूनी रूप से अनिवार्य किया जाना चाहिए।ष्ट जल का पुनर्चक्रण : इजराइल जैसे देशों से हमें सीखना चाहिए, जो अपने 90% अपशिष्ट जल को रीसायकल करके कृषि और उद्योगों में उपयोग करता है। भारत को भी ‘धूसर जल’ (Grey water) के पुनर्चक्रण के लिए कड़े नियम बनाने होंगे।पारंपरिक जल निकायों का पुनरुद्धार: हमारे पूर्वजों द्वारा बनाए गए कुएं, बावड़ियां, तालाब और जोहड़ जल प्रबंधन के बेहतरीन उदाहरण थे।’अमृत सरोवर मिशन’ जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से इन पारंपरिक जल स्रोतों को पुनर्जीवित करना होगा।’जल मूल्य निर्धारण’ और जन जागरूकता: पानी को एक ‘मुफ्त संसाधन’ मानने की मानसिकता को बदलना होगा।उद्योगों और समृद्ध वर्गों के लिए पानी का उचित मूल्य तय होना चाहिए ताकि इसकी बर्बादी रुके। “जल संरक्षण” को स्कूली पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाकर इसे एक जन आंदोलन बनाना होगा।

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