ऊर्जा आत्मनिर्भरता का ‘इथेनॉल पथ’: उम्मीदों की उड़ान और व्यावहारिक अवरोध

 अशोक भाटिया

इजरायल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू के जुझारूपन ने फरवरी से दुनिया को ऊर्जा संकट में डाल दिया है, और मोदी सरकार की कारों में पेट्रोल में इथेनॉल के मिश्रण को बढ़ाने की आवश्यकता का कुछ लोगों द्वारा उपहास किया गया है क्योंकि ‘दूध में पानी की मात्रा बढ़ाने से दूध की मांग कम हो जाएगी’। लेकिन सरकार की इस सोच में कुछ भी गलत नहीं है कि इथेनॉल ब्लेंडिंग से पेट्रोल के इस्तेमाल को कम करने के प्रयोग पूरी दुनिया में चल रहे हैं, इसलिए यह सही है कि भारत में इस तरह के प्रयोग हो रहे हैं, जो तेल आयात पर निर्भर है ।भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं और आर्थिक प्राथमिकताओं के एक अभूतपूर्व चौराहे पर खड़ा है  ऐसे समय  देश ने हाल ही में पेट्रोल में 20 प्रतिशत इथेनॉल मिश्रण (E20) का महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित समय से पांच वर्ष पहले ही हासिल कर दुनिया के सामने नीतिगत इच्छाशक्ति का एक बड़ा उदाहरण पेश किया है। वर्ष 2013-14 में जहां इथेनॉल मिश्रण की दर महज 1.5 प्रतिशत के आसपास सिमटी हुई थी, वहीं 2025-26 के कालखंड में इसका देशव्यापी स्तर पर 20 प्रतिशत तक पहुंच जाना भारतीय ऊर्जा क्षेत्र की एक युगांतकारी घटना है。 इस नीतिगत उछाल का प्राथमिक श्रेय केंद्र की मोदी सरकार के ‘इथेनॉल ब्लेंडेड पेट्रोल (EBP) प्रोग्राम’ को जाता है, जिसने भारत को जीवाश्म ईंधनों की विदेशी निर्भरता से मुक्त कराने और ‘पंचामृत’ के तहत वैश्विक जलवायु प्रतिबद्धताओं को पूरा करने का संकल्प लिया है।परंतु, इस बड़ी नीतिगत सफलता के साथ ही धरातल पर कुछ ऐसे बुनियादी सवाल और व्यावहारिक चुनौतियां भी सिर उठाने लगी हैं, जिन्हें नजरअंदाज करना इस दीर्घकालिक अभियान को कमजोर कर सकता है। हाल ही में राष्ट्रव्यापी स्तर पर E20 ईंधन के अनिवार्य प्रसार के बाद से आम उपभोक्ताओं, मोटर वाहन उद्योग और कृषि-अर्थशास्त्रियों के बीच एक त्रिपक्षीय बहस छिड़ गई है। एक तरफ जहां सरकार इसे राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेशी मुद्रा की बचत का अचूक हथियार मानती है, वहीं दूसरी तरफ आम नागरिक माइलेज में गिरावट और पुराने वाहनों के इंजनों की सुरक्षा को लेकर आशंकित हैं। ऐसे में यह नीतिगत समीक्षा का सही समय है कि क्या भारत अपनी हरित ऊर्जा की रफ्तार को बनाए रखते हुए आम जनता की चिंताओं को वैज्ञानिक और आर्थिक धरातल पर संतुष्ट कर पा रहा है?इस नीति की आवश्यकता को समझने के लिए सबसे पहले भारत की कच्चे तेल पर निर्भरता के आंकड़ों को देखना होगा। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए लगभग 88.5 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है। वैश्विक राजनीति में होने वाले उतार-चढ़ाव, खाड़ी देशों के तनाव और डॉलर के मुकाबले रुपये की स्थिति भारत के घरेलू बाजार और बजटीय संतुलन को सीधे प्रभावित करती है। सरकार की इस इथेनॉल नीति ने देश की मैक्रो-इकोनॉमी को एक बड़ा सुरक्षा कवच दिया है। 2014-15 से लेकर मई 2026 तक के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, इस कार्यक्रम के माध्यम से देश ने 1.90 लाख करोड़ रुपये से अधिक की मूल्यवान विदेशी मुद्रा की बचत की है और करोड़ों मीट्रिक टन कच्चे तेल के आयात को घरेलू जैव-ईंधन से प्रतिस्थापित किया है।इस आर्थिक चक्र का दूसरा सबसे खूबसूरत पहलू इसका ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जुड़ाव है। जैव-ईंधन का उत्पादन केवल फैक्टरियों की चहारदीवारी में नहीं, बल्कि देश के अन्नदाताओं के खेतों से शुरू होता है। गन्ने के उप-उत्पाद (शीरा), मक्का, और टूटे हुए चावल (सरप्लस अनाज) से इथेनॉल बनाने की अनुमति देकर सरकार ने किसानों को केवल ‘अन्नदाता’ से ‘ऊर्जादाता’ के रूप में परिवर्तित करने का सफल प्रयास किया है। इस खरीद प्रक्रिया के माध्यम से किसानों और घरेलू डिस्टिलरीज को लगभग 3 लाख करोड़ रुपये से अधिक का सीधा भुगतान हुआ है, जिससे ग्रामीण अंचलों में रोजगार के नए अवसर पैदा हुए हैं और चीनी मिलों के गन्ना बकाया संकट पर काफी हद तक लगाम लगी है। पर्यावरण के दृष्टिकोण से देखें तो E20 मिश्रण ने देश के वायुमंडल को लगभग 930 लाख मीट्रिक टन कार्बन डाइऑक्साइड  के उत्सर्जन से बचाया है, जो महानगरों में बढ़ते प्रदूषण के खिलाफ एक बड़ी राहत है। नीतिगत स्तर पर जितनी यह योजना आकर्षक और देशहित में दिखाई देती है, उपभोक्ता स्तर पर इसके अनुभव उतने ही मिश्रित रहे हैं। देश के करोड़ों दोपहिया और चार पहिया वाहन चालकों द्वारा लगातार यह शिकायत की जा रही है कि E20 पेट्रोल के उपयोग के बाद से वाहनों के माइलेज में 6 से 7 प्रतिशत तक की कमी दर्ज की गई है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से यह बात सही भी है; इथेनॉल का ऊर्जा घनत्व शुद्ध पेट्रोल की तुलना में लगभग एक तिहाई कम होता है। इसका सीधा अर्थ यह है कि समान दूरी तय करने के लिए इंजन को अधिक ईंधन की खपत करनी पड़ती है। आज के इस महंगाई के दौर में, जब पेट्रोल की कीमतें पहले से ही आसमान छू रही हैं, आम नागरिक को कम माइलेज के रूप में अपनी जेब पर अतिरिक्त बोझ महसूस हो रहा है।read more:https://khabarentertainment.in/509-vidyut-sakhis-in-bijnor-receive-thermal-printers-instant-electricity-bill-receipts-will-now-be-available-at-doorsteps/इसके अतिरिक्त, तकनीकी मोर्चे पर सबसे बड़ी चिंता ‘मटेरियल डिग्रेडेशन’ यानी वाहनों के पुर्जों के खराब होने की है। इथेनॉल स्वभाव से ‘हाइग्रोस्कोपिक’ होता है, जिसका मतलब है कि यह हवा से नमी और पानी को बहुत तेजी से सोखता है। यह रासायनिक गुण पुराने वाहनों (जो विशेष रूप से E20 के अनुकूल नहीं बने हैं) के ईंधन टैंक, पाइपलाइन और कार्बोरेटर या इंजेक्टर प्रणालियों में जंग  और प्लास्टिक या रबर के पुर्जों के गलने का कारण बन सकता है। यद्यपि सोसाइटी ऑफ इंडियन ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरर्स और प्रमुख वाहन निर्माताओं जैसे मारुति सुजुकी और हीरो मोटोकॉर्प ने सेवा डेटा का हवाला देते हुए दावा किया है कि E20 से पुराने इंजनों को कोई बड़ा या गंभीर नुकसान नहीं देखा गया है, फिर भी आम जनता के भीतर बैठा अविश्वास और डर अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है।जनता के इसी जमीनी विरोध और तकनीकी पारिस्थितिकी तंत्र की अपूर्ण तैयारी को देखते हुए मोदी सरकार ने हाल ही में बेहद परिपक्वता और वैज्ञानिक संयम का परिचय दिया है। पहले बाजार में ऐसी अटकलें जोरों पर थीं कि सरकार E20 की तत्काल सफलता के बाद तेजी से 25 प्रतिशत सम्मिश्रण (E25) की ओर बढ़ेगी। परंतु, उपभोक्ताओं के फीडबैक और वाहनों की तकनीकी सीमाओं को स्वीकार करते हुए पेट्रोलियम और परिवहन मंत्रालयों ने स्पष्ट कर दिया है कि E25 को लागू करने में कोई भी जल्दबाजी नहीं की जाएगी। सरकार ने इन अफवाहों का खंडन करते हुए कहा है कि वर्तमान में E20 ईंधन पूरी तरह से सुरक्षित है और उच्च मिश्रणों की तरफ कदम केवल व्यापक वैज्ञानिक परीक्षणों, ऑटोमोबाइल उद्योग की तैयारियों और उपभोक्ताओं की सहमति के बाद ही बढ़ाया जाएगा।सरकार की इस ‘ग्रेडेड अप्रोच’ की सराहना की जानी चाहिए। किसी भी देशव्यापी नीति की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि वह देश के अंतिम नागरिक के हितों के साथ कितनी सहजता से मेल खाती है। यदि सरकार बिना पर्याप्त बुनियादी ढांचे के जबरन उच्च मिश्रण थोपती, तो इससे न केवल वाहन बाजार में व्यवधान उत्पन्न होता, बल्कि हरित ऊर्जा कार्यक्रमों के प्रति जनता में एक स्थायी आक्रोश और अविश्वास पैदा हो सकता था।इस लेख  में एक और गहरे आर्थिक और सामाजिक संकट की ओर ध्यान दिलाना आवश्यक है, जो नीति निर्माताओं के लिए चिंता का विषय होना चाहिए। वह है—’अन्न बनाम ईंधन’ का द्वंद्व। भारत जैसे विशाल आबादी वाले देश में खाद्य सुरक्षा हमेशा से सर्वोच्च प्राथमिकता रही है। जब हम इथेनॉल बनाने के लिए गन्ने के जूस, मक्का और विशेष रूप से भारतीय खाद्य निगम  के गोदामों से मिलने वाले चावल का अत्यधिक उपयोग करने लगते हैं, तो इसका सीधा असर देश के खाद्य बाजार पर पड़ता है।विगत वर्षों में चीनी के घरेलू दामों को नियंत्रित रखने के लिए सरकार को कई बार इथेनॉल उत्पादन पर अस्थायी प्रतिबंध या सीमाएं लगानी पड़ी थीं, हालांकि बाद में आपूर्ति सामान्य होने पर इन प्रतिबंधों को हटा लिया गया। यदि किसान अनाज उत्पादन का एक बड़ा हिस्सा केवल ऊर्जा क्षेत्र की व्यावसायिक डिस्टिलरीज को बेचने लगेंगे, तो देश में पशुओं के चारे (जैसे मक्के से बनने वाले फीड) और आम जनता के उपभोग वाले खाद्यान्न की कीमतों में उछाल आ सकता है, जिससे खाद्य मुद्रास्फीति अनियंत्रित हो सकती है। इसलिए, नीति की निरंतरता के लिए कृषि भूमि के उपयोग और फसलों के चक्र का सटीक वैज्ञानिक मानचित्रण  अनिवार्य है।इथेनॉल सम्मिश्रण कार्यक्रम भारत के उज्ज्वल और स्वच्छ भविष्य के लिए एक गैर-परक्राम्य आवश्यकता है, लेकिन इसकी सफलता का रास्ता आम जनता की जेब और भरोसे से होकर ही गुजरता है। इस नीति को बिना किसी व्यवधान के आगे बढ़ाने के लिए निम्नलिखित तीन रणनीतिक कदमों पर विचार किया जाना चाहिए:उपभोक्ताओं को कम माइलेज के दर्द से राहत देने का सबसे तार्किक तरीका ‘मूल्य प्रोत्साहन’ है। सरकार को E20 या भविष्य के उच्च इथेनॉल मिश्रित ईंधनों की कीमत शुद्ध पेट्रोल या legacy फ्यूल की तुलना में 5 से 7 प्रतिशत कम रखनी चाहिए। जब उपभोक्ता को ईंधन की कीमत में सीधी छूट मिलेगी, तो माइलेज की मामूली कमी की भरपाई आर्थिक रूप से हो जाएगी, और वे स्वेच्छा से पर्यावरण के अनुकूल ईंधन का चयन करेंगे।जरुरत है सरकार और तेल विपणन कंपनियों  को केवल दावों के बजाय प्रयोगशालाओं के प्रामाणिक डेटा को जनता के सामने रखना चाहिए। पुराने वाहनों की देखभाल कैसे करें, इथेनॉल ईंधन के उपयोग के दौरान किन सावधानियों को बरतें, इसके बारे में पेट्रोल पंपों पर ही बड़े पैमाने पर जागरूकता अभियान चलाए जाने की आवश्यकता है।तथा खाद्यान्न और गन्ने पर निर्भरता कम करने के लिए पराली, बांस, और कबाड़  से बनने वाले ‘सेकंड जनरेशन’ (2G) इथेनॉल के बुनियादी ढांचे को तेजी से विकसित करना होगा। , भारत का इथेनॉल कार्यक्रम ऊर्जा स्वतंत्रता और सतत विकास की दिशा में एक क्रांतिकारी और साहसिक कदम है। समय से पहले E20 के लक्ष्य को पाना सरकार के नीतिगत प्रबंधन की जीत है। लेकिन एक जीवंत लोकतंत्र और उपभोक्ता-प्रधान बाजार में किसी भी हरित क्रांति को टिकाऊ बनाने के लिए तकनीकी संवेदनशीलता और जन-आकांक्षाओं का आदर करना अनिवार्य होता है। सरकार ने E25 पर कदम रोककर और चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ने का जो निर्णय लिया है, वह स्वागत योग्य है। अब आवश्यकता इस बात की है कि उद्योग जगत, नीति निर्माता और उपभोक्ता मिलकर एक ऐसा पारदर्शी तंत्र बनाएं, जहां देश की ऊर्जा सुरक्षा और नागरिक की आर्थिक सुरक्षा दोनों एक साथ सह-अस्तित्व में समृद्ध हो सकें।

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