पेंशन की धूल भरी पासबुक

बैंक की शाखा में हर महीने की पहली तारीख को सत्तर साल के भवानी शंकर अपने फटे कुर्ते की जेब से हरे रंग की पुरानी पेंशन पासबुक निकालकर कतार में सबसे आगे खड़े हो जाते थे। भारत में सरकारी कतारें मोक्ष के द्वार जैसी होती हैं, जहाँ पहुँचने के लिए आदमी को अपनी आधी उम्र और पूरी गरिमा विसर्जित करनी पड़ती है। उस पासबुक पर जमी धूल को वे अपनी धोती के पल्ले से बार बार पोंछते, जैसे किसी भ्रष्ट विभाग की फाइल से नैतिकता झाड़ रहे हों। बैंक का युवा मैनेजर, जो उपभोक्ता सेवा को एक बोझ समझता था, उन्हें देखते ही ऐसे बिदकता जैसे किसी नेता को अपना पुराना घोषणापत्र याद आ जाए। वह चिढ़कर कहता, “बाबा, आपकी पेंशन सीधे खाते में जमा हो जाती है, तो आप रोज़ यहाँ आकर पासबुक की छपाई का हठ क्यों पकड़ लेते हैं?” मैनेजर की आधुनिकता दरअसल डिजिटल इंडिया का वह पर्दा थी जिसके पीछे मानवीय संवेदनाएँ दम तोड़ चुकी थीं।भवानी शंकर अपनी झुकी हुई कमर को सीधा करने का प्रयास करते यह झुकना उम्र का नहीं, व्यवस्था के बोझ का था और शांत स्वर में कहते, “बेटा, इस कागज़ पर जब तक काली स्याही से लिखावट नहीं छपेगी तब तक मेरे मन को तसल्ली नहीं मिलेगी।” हमारे देश में सत्य वही है जो छपा हुआ है, चाहे वह अख़बार का झूठ ही क्यों न हो। पास खड़े गाँव के लोग उनका उपहास उड़ाते हुए कहते, “मासाब को लगता है कि बैंक वाले उनकी पेंशन की एंट्री छिपाकर डकार जाएँगे।” दफ़्तर का चपरासी भी हँसते हुए तंज कसता, “बाबा, जब खाते में कुछ होगा ही नहीं तो मशीन बेचारी क्या आपके चरित्र का प्रमाण पत्र छापेगी?” चपरासी की हँसी में वह क्रूरता थी जो अक्सर निचली कुर्सियों पर बैठने वालों में ऊपर वालों की चापलूसी करते करते पैदा हो जाती है।भवानी शंकर बिना किसी की बात का बुरा माने उस धूल भरी पासबुक को अपनी छाती से चिपकाए चुपचाप अपनी बारी का इंतज़ार करते रहते थे। उनके लिए वह पासबुक महज़ कागज़ नहीं, बल्कि उस ईमानदारी का वसीयतनामा थी जिसे समाज ‘पागलपन’ का नाम दे चुका था। यह सिलसिला पिछले दो वर्षों से जारी था, चाहे तपती धूप हो या हाड़ कंपाने वाली ठंड। बैंक के कर्मचारी उन्हें एक सनकी और हठी बुज़ुर्ग मान चुके थे आजकल के दौर में जो आदमी सीधा खड़ा हो, वह तंत्र को टेढ़ा ही नज़र आता है। एक दिन जब बैंक में बहुत भीड़ थी और सर्वर डाउन होने के कारण लोग हंगामा कर रहे थे सर्वर डाउन होना हमारे प्रशासन की वह राष्ट्रीय बीमारी है जो काम से बचने का सबसे बड़ा बहाना बन चुकी है तब भी भवानी शंकर शांत भाव से एक कोने में बैठे अपनी पासबुक को निहार रहे थे।read more:https://pahaltoday.com/district-magistrate-holds-meeting-of-the-district-drinking-water-and-sanitation-mission-issues-directives/मैनेजर ने तंग आकर उन्हें अपने केबिन में बुलाया और मेज़ पर हाथ पटकते हुए कहा, “बाबा, आप रोज़ यहाँ आकर मेरा समय खराब करते हैं। अगर आपको पासबुक छपवाने का इतना ही शौक है, तो किसी प्राइवेट बैंक में खाता खुलवा लीजिए जहाँ लूट के बदले थोड़ी मुस्कुराहट भी मिल जाती है।” भवानी शंकर ने अपनी कांपती उंगलियों से चश्मा ठीक किया और बोले, “साहब जी, मैं यहाँ अपनी पेंशन के पैसे निकालने नहीं आता हूँ, बल्कि अपने स्वाभिमान की हाज़िरी लगाने आता हूँ।” मैनेजर ने अचरज से उन्हें देखा, जैसे किसी आयकर विभाग के अफ़सर ने पहली बार सच्चाई सुन ली हो। उसने पूछा, “अगर पैसे नहीं निकालने तो इस पासबुक में ऐसा क्या राज़ दबा है?”भवानी शंकर ने अपनी पासबुक मैनेजर की मेज़ पर रख दी। मैनेजर ने अनिच्छा से पन्ने पलटना शुरू किया और उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं। उस पासबुक में पिछले दो सालों से हर महीने पाँच सौ रुपये जमा होने की एंट्री दर्ज थी, लेकिन वह पैसा सरकार की तरफ से नहीं आ रहा था बल्कि भवानी शंकर अपनी आधी पेंशन में से काटकर जमा करा रहे थे। मैनेजर ने भौंचक्का होकर पूछा, “बाबा, आप अपनी ही पेंशन का आधा पैसा वापस सरकार के खाते में क्यों जमा कर रहे हैं? यहाँ तो लोग देश खा जाते हैं और डकार तक नहीं लेते।”भवानी शंकर ने एक गहरी साँस ली और कहा, “दो साल पहले सरकार ने कागजी गड़बड़ी के कारण मेरे पड़ोसी रामसरन की पेंशन बंद कर दी थी क्योंकि उसके पास पहचान पत्र नहीं था। बिना कागज़ के इस देश में आदमी का अस्तित्व ही नहीं है, वह सिर्फ एक चलता फिरता भूत है। वह बूढ़ा भूख से तड़पता था, इसलिए मैंने अफ़सरों से झूठ बोला कि मेरी पेंशन में ग़लती से ज़्यादा पैसा आ रहा है, ताकि वह आधा हिस्सा उसके काम आ सके।”भवानी शंकर ने बहते आंसुओं को पोंछते हुए आगे कहा, “आज सुबह ही उस गरीब रामसरन का निधन हो गया। वह बिना किसी सरकारी मुहर के मर गया। मैं तो बस आज यह देखने आया था कि क्या मेरे इस फटे बहीखाते में दर्ज ईमानदारी उस बेबस इंसान की भूख को मिटा सकी या सरकारी व्यवस्था ने उसे भी एक बेजान कागजी एंट्री बनाकर छोड़ दिया।” यह सुनते ही बैंक के केबिन में वह भयानक सन्नाटा पसर गया जो अक्सर किसी बड़े घोटाले के खुलने पर संसद में होता है। मैनेजर की आँखों से आंसुओं के कतरे उस पुरानी पासबुक पर गिर पड़े। व्यवस्था की संवेदनहीनता के सामने एक बुजुर्ग का निःस्वार्थ प्रेम जीत चुका था। बाहर खड़े कर्मचारी शर्म से पानी पानी हो गए, क्योंकि वे अब तक एक ‘पागल’ को देख रहे थे, जबकि असल में वे एक ‘इंसान’ को देख रहे थे, जो कि आजकल के बाज़ार में सबसे दुर्लभ वस्तु है।

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