गले की हड्डी बना अकॉर्ड। वैश्विक राजनीति में अब्राहम कार्ड यानी अब्राहम समझौता अभी सबसे ज्यादा चर्चित हॉट टॉपिक है। और यही अब्राहम रिकॉर्ड पाकिस्तान के लिए बड़ी मुसीबत बना हुआ है ।अब्राहम अकॉर्ड अमेरिका की पहल पर हुए इस समझौते ने अरब देशों और इजरायल के बीच दशकों पुरानी शत्रुता को संवाद और कूटनीतिक संबंधों में बदलने का प्रयास किया और पाकिस्तान सहित मुस्लिम देशों द्वारा इसराइल को देश के रूप में मान्यता प्रदान किया जाना होगा। संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन, मोरक्को और सूडान जैसे देशों ने इजराइल के साथ संबंध सामान्य कर दुनिया को चौंका दिया। अब चर्चा इस बात की है कि अमेरिका चाहता है कि शेष मुस्लिम देश भी इसी राह पर चलें। इसी संदर्भ में पाकिस्तान की स्थिति अत्यंत जटिल और विरोधाभासी दिखाई देती है। अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल में आरंभ हुई इस नीति का मूल उद्देश्य मध्य पूर्व में नई सामरिक धुरी बनाना था। अमेरिका मानता है कि ईरान के बढ़ते प्रभाव, आतंकवाद और आर्थिक अस्थिरता से निपटने के लिए अरब देशों और इजराइल के बीच सहयोग आवश्यक है। अमेरिका की दृष्टि में यह समझौता केवल कूटनीतिक संबंधों तक सीमित नहीं बल्कि व्यापार, तकनीक, रक्षा और ऊर्जा सहयोग का नया मॉडल है। किंतु पाकिस्तान के लिए यह प्रश्न केवल विदेश नीति का नहीं बल्कि वैचारिक, धार्मिक और आंतरिक राजनीतिक संकट का विषय बन गया है।पाकिस्तान स्वयं को लंबे समय से इस्लामी दुनिया का प्रमुख समर्थक और फिलिस्तीन का पारंपरिक पक्षधर बताता रहा है। पाकिस्तान के पासपोर्ट पर आज भी यह उल्लेख मिलता है कि यह दस्तावेज इजराइल को छोड़कर सभी देशों के लिए मान्य है। यह केवल एक औपचारिक पंक्ति नहीं बल्कि पाकिस्तान की वैचारिक स्थिति का प्रतीक है। पाकिस्तान के निर्माण के बाद से ही वहां की राजनीति में फिलिस्तीन मुद्दा भावनात्मक और धार्मिक रूप से जुड़ा रहा है। ऐसे में यदि पाकिस्तान इजराइल को मान्यता देता है तो उसे अपने ही देश के भीतर तीव्र विरोध का सामना करना पड़ सकता है। पाकिस्तान की सबसे बड़ी समस्या यह है कि उसकी अर्थव्यवस्था लंबे समय से विदेशी कर्ज और अंतरराष्ट्रीय सहायता पर निर्भर रही है। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष से बार-बार राहत पैकेज लेना उसकी मजबूरी बन चुका है। विदेशी मुद्रा भंडार में गिरावट, बढ़ती महंगाई, बेरोजगारी और राजनीतिक अस्थिरता ने पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति को कमजोर कर दिया है। ऐसे समय में अमेरिका की नाराजगी पाकिस्तान के लिए महंगी साबित हो सकती है।read more:https://pahaltoday.com/the-sixth-day-of-the-summer-camp-at-the-school-concluded-with-great-enthusiasm/ अमेरिका का अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं पर प्रभाव किसी से छिपा नहीं है। यदि पाकिस्तान अमेरिकी रणनीति के विरुद्ध जाता है तो भविष्य में आर्थिक सहायता और ऋण प्राप्त करना कठिन हो सकता है। दूसरी ओर पाकिस्तान की घरेलू राजनीति भी इस प्रश्न को सरल नहीं बनने देती। वहां के धार्मिक संगठन और कट्टरपंथी समूह इजराइल विरोध को अपने अस्तित्व का प्रमुख मुद्दा मानते हैं। यदि सरकार इजराइल के साथ संबंध सामान्य करने की दिशा में बढ़ती है तो बड़े पैमाने पर आंदोलन और राजनीतिक अस्थिरता पैदा हो सकती है। पाकिस्तान पहले ही आंतरिक आतंकवाद, प्रांतीय असंतोष और राजनीतिक संघर्षों से जूझ रहा है। ऐसे में यह मुद्दा सरकार के लिए “गले की हड्डी” बन सकता है न उगलते बने और न निगलते। वास्तव में पाकिस्तान की दुविधा केवल धार्मिक नहीं बल्कि सामरिक भी है। वह लंबे समय से चीन के साथ घनिष्ठ संबंध बनाए हुए है, जबकि अमेरिका की प्राथमिकताएं बदल रही हैं। चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा पाकिस्तान के लिए आर्थिक आशा का केंद्र है, लेकिन पश्चिमी देशों और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं के सहयोग के बिना उसकी अर्थव्यवस्था स्थिर नहीं हो सकती। अमेरिका यह भी चाहता है कि पाकिस्तान अपनी विदेश नीति में कट्टरपंथी प्रभाव कम करे और व्यावहारिक कूटनीति अपनाए। किंतु पाकिस्तान की सत्ता संरचना में सेना, धार्मिक समूह और राजनीतिक दलों के अलग-अलग हित हैं, जिसके कारण कोई भी बड़ा निर्णय अत्यंत कठिन हो जाता है। मध्य पूर्व के कई देशों ने अब यह मानना शुरू कर दिया है कि केवल इजराइल विरोध की राजनीति से आर्थिक और सामरिक लाभ नहीं मिलने वाले। संयुक्त अरब अमीरात और बहरीन जैसे देशों ने इजराइल के साथ तकनीकी, रक्षा और व्यापारिक सहयोग से नए अवसर प्राप्त किए हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, साइबर सुरक्षा, कृषि तकनीक और निवेश के क्षेत्र में इजराइल की क्षमता विश्व स्तर पर मानी जाती है। यही कारण है कि कई मुस्लिम देश अब व्यावहारिक कूटनीति को प्राथमिकता देने लगे हैं। पाकिस्तान पर भी इसी प्रकार का दबाव बढ़ रहा है कि वह भावनात्मक राजनीति से आगे बढ़कर आर्थिक हितों को देखे। हालांकि पाकिस्तान की जनता का बड़ा वर्ग फिलिस्तीन के समर्थन को धार्मिक कर्तव्य मानता है। गाजा और पश्चिमी तट में होने वाली घटनाओं ने मुस्लिम समाज में गहरी संवेदनाएं पैदा की हैं। ऐसे माहौल में इजराइल को मान्यता देना किसी भी पाकिस्तानी सरकार के लिए राजनीतिक आत्मघात जैसा कदम माना जा सकता है। यही कारण है कि पाकिस्तान की सरकारें समय-समय पर संकेत तो देती हैं, किंतु खुलकर कोई निर्णय लेने से बचती रही हैं। आने वाले समय में यह मुद्दा और अधिक गंभीर हो सकता है। यदि अमेरिका और उसके सहयोगी देश आर्थिक सहायता को विदेश नीति से जोड़ते हैं तो पाकिस्तान पर दबाव बढ़ेगा। वहीं यदि पाकिस्तान घरेलू धार्मिक भावनाओं के कारण पीछे हटता है तो वह वैश्विक मंच पर अलग-थलग पड़ सकता है। इस पूरे घटनाक्रम ने यह स्पष्ट कर दिया है कि आधुनिक विश्व राजनीति में केवल वैचारिक आग्रहों से काम नहीं चलता; आर्थिक शक्ति और कूटनीतिक संतुलन भी उतने ही आवश्यक हैं। पाकिस्तान आज दो राहों पर खड़ा दिखाई देता है। एक राह उसे पश्चिमी समर्थन, आर्थिक राहत और वैश्विक मुख्यधारा की ओर ले जाती है, जबकि दूसरी राह घरेलू धार्मिक भावनाओं और पारंपरिक नीति को बनाए रखने की है। समस्या यह है कि दोनों दिशाओं में जोखिम ही जोखिम हैं। यही कारण है कि अब्राहम अकॉर्ड पाकिस्तान के लिए वास्तव में “गले की हड्डी” बन चुका है।