किसी भी समाज के पतन की शुरुआत उस समय नहीं होती, जब वहां अपराध बढ़ने लगते हैं। अपराध तो दुनिया के हर समाज में होते हैं और समय के साथ उनके स्वरूप भी बदलते रहते हैं। समाज का वास्तविक पतन तब शुरू होता है, जब वह अपराधों के प्रति उदासीन हो जाता है। जब हत्या और आत्महत्या की खबरें लोगों को विचलित न करें, अन्याय पर शर्म महसूस न हो और किसी पीड़ित की पुकार मन में हलचल पैदा न करे, तब समस्या केवल अपराध की नहीं रह जाती। समस्या समाज की सामूहिक मानसिकता बन जाती है।कल्पना कीजिए कि किसी शहर में हर दिन एक पुल टूटता हो और लोग उसमें दबकर मरते हों। शुरुआत में क्या होगा? टेलीविजन चैनलों पर बहस होगी, अखबारों में संपादकीय और टिप्पणियां प्रकाशित होंगी, सोशल मीडिया पर आक्रोश दिखाई देगा और सड़कों पर विरोध-प्रदर्शन होंगे। लेकिन यदि यह सिलसिला वर्षों तक चलता रहे और व्यवस्था में कोई बदलाव न आए तो धीरे-धीरे लोगों की प्रतिक्रिया बदल जाएगी। एक दिन पुल टूटने और लोगों के मरने की खबर भी मौसम के पूर्वानुमान की तरह सामान्य लगने लगेगी। मौतें होती रहेंगी, लेकिन उनका असर लोगों के मन पर होना बंद हो जाएगा।भारत में दहेज से जुड़ी हिंसा और मौतों को लेकर आज कुछ ऐसी ही स्थिति दिखाई देती है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के अनुसार, देश में हर वर्ष लगभग छह हजार महिलाएं दहेज के कारण अपनी जान गंवाती हैं। यानी औसतन रोजाना करीब 16 महिलाएं। इनमें कुछ की हत्या कर दी जाती है और कुछ को इस हद तक प्रताड़ित किया जाता है कि वे आत्महत्या करने के लिए मजबूर हो जाती हैं। यह आंकड़ा किसी युद्ध, महामारी या प्राकृतिक आपदा की भयावहता से कम नहीं है।लेकिन क्या इस त्रासदी पर हमें वैसा ही दुख और आक्रोश होता है, जैसा किसी चर्चित हत्या के मामले में होता है? क्या दहेज के कारण होने वाली इन हजारों मौतों पर देशव्यापी आक्रोश दिखाई देता है? क्या संसद में इस समस्या पर लगातार गंभीर चर्चा होती है? किसी गांव या शहर में दहेज के कारण महिला की मौत होती है तो कुछ समय तक खबर चलती है, सीमित लोग प्रतिक्रिया देते हैं और फिर कोई दूसरी सनसनीखेज घटना हमारी सामूहिक स्मृति पर कब्जा कर लेती है।यहां एक कठिन सवाल खड़ा होता है कि क्या हम सामाजिक बुराइयों के इतने अभ्यस्त हो चुके हैं कि अब वे हमें विचलित ही नहीं करतीं?लंदन के किंग्स कॉलेज स्थित इंडिया इंस्टीट्यूट की लेक्चरर डॉ. कृति कपिला ने हाल में प्रकाशित एक अध्ययन में इस ओर ध्यान दिलाया है कि भारत में दहेज संबंधी हत्याएं कोई नई घटना नहीं हैं। नई बात यह है कि समाज अब इनके प्रति आश्चर्य और प्रतिक्रिया व्यक्त करना कम कर चुका है।read more:https://pahaltoday.com/demand-to-remove-government-country-liquor-shop-villagers-stage-protest-at-the-collectorate/#google_vignetteघटनाएं होती हैं, मुकदमे दर्ज होते हैं, अखबारों में खबरें छपती हैं, लेकिन उनकी गंभीरता समाज की सामूहिक चेतना तक नहीं पहुंच पाती।इसलिए यह केवल दहेज का संकट नहीं है। यह हमारी संवेदनाओं के सुन्न पड़ते जाने का भी दस्तावेज है। मनोविज्ञान में इसे हेबिचुएशन यानी किसी चीज के लगातार सामने आने के कारण उसके प्रति अभ्यस्त हो जाने की प्रक्रिया कहा जाता है। जब किसी उत्तेजना या घटना का बारबार सामना होता है तो मस्तिष्क धीरे-धीरे उस पर प्रतिक्रिया कम कर देता है। रेलवे लाइन के आसपास रहने वाले लोग इसका सामान्य उदाहरण हैं। कुछ समय बाद वे लगातार गुजरती ट्रेनों के शोर के इतने अभ्यस्त हो जाते हैं कि वह शोर उन्हें लगभग सुनाई ही नहीं देता। इसी तरह दुर्गंध वाले वातावरण में रहने वाला व्यक्ति कुछ समय बाद उस बदबू को महसूस करना बंद कर देता है।दुर्भाग्य से यही प्रक्रिया सामाजिक जीवन में भी काम करती है। जब अन्याय रोज दिखाई दे और उसे रोकने की सामूहिक क्षमता दिखाई न दे, तो मन लगातार दुखी रहने के बजाय अपनी संवेदनाओं की तीव्रता कम कर लेता है। जब हम लगातार आघात का सामना करते हैं और उसके खिलाफ कुछ कर पाने में खुद को असमर्थ पाते हैं, तो हमारा मन अपने बचाव के लिए एक मानसिक कवच बना लेता है। धीरे-धीरे यही कवच नैतिक शून्यता में बदल सकता है।पुलिस और कानून-व्यवस्था की विफलता, पुरुष प्रधान सामाजिक सोच, आर्थिक असमानता, पीढ़ियों से चली आ रही परंपराएं और परिवार तथा समाज के जटिल संबंधों के कारण अनेक महिला आंदोलनों और कानूनों के बावजूद दहेज की कुप्रथा समाप्त नहीं हो सकी है।डॉ. कृति कपिला के अनुसार, 1970 और 1980 के दशक में जब बहुओं को केरोसिन डालकर जलाने की घटनाएं सामने आती थीं, तब समाज में यह सवाल उठता था कि मामला दुर्घटना का है या हत्या का। इसी दौर में दहेज विरोधी आंदोलन ने जोर पकड़ा। लेकिन समय के साथ हिंसा का स्वरूप बदल गया। आज कई मामलों में प्रताड़ना इतनी लंबी और गंभीर होती है कि महिला अंततः स्वयं ही अपनी जान लेने को मजबूर हो जाती है।यहीं समाज एक खतरनाक भ्रम का शिकार हो जाता है। जब कोई महिला आत्महत्या करती है तो उसे अक्सर एक व्यक्तिगत त्रासदी मान लिया जाता है। लोग यह सोचकर पीछे हट जाते हैं कि यह परिवार का निजी मामला है। लेकिन वास्तविकता यह है कि कई बार आत्महत्या किसी एक क्षण का फैसला नहीं होती, बल्कि लंबे समय तक चले मानसिक और शारीरिक अत्याचार का अंतिम परिणाम होती है। वह किसी अदृश्य सामूहिक हिंसा का आखिरी चरण भी हो सकती है।हमारी सामूहिक प्रतिक्रिया का एक स्वभाव भी है। हम उन घटनाओं पर अधिक और तीव्र प्रतिक्रिया देते हैं, जिनमें अपराधी या खलनायक साफ दिखाई देता है और जिनमें भावनात्मक नाटकीयता होती है। यही कारण है कि विचित्र अपराध, प्रेम प्रसंग और सनसनीखेज हत्याएं कई दिनों तक चर्चा में रहती हैं।इसके विपरीत घर की चारदीवारी के भीतर वर्षों तक चलने वाली हिंसा हमारी सामूहिक चेतना को उसी तरह झकझोर नहीं पाती। मीडिया भी प्रायः उन्हीं खबरों को अधिक महत्व देता है, जिन्हें लोग लंबे समय तक देखना चाहते हैं और जो उन्हें चौंकाती हैं। परिणाम यह होता है कि परिवारों के भीतर लगातार चलने वाली हिंसा और प्रताड़ना हमारी चेतना के हाशिए पर चली जाती है।धीरे-धीरे समाज केवल हिंसा का ही नहीं, बल्कि हिंसा की अनुपस्थिति के भ्रम का भी शिकार हो जाता है। जो दिखाई नहीं देता, उसके अस्तित्व को हम नकारने लगते हैं। हमें लगता है कि समस्या कम हो गई होगी, क्योंकि उसके बारे में चर्चा कम हो रही है। जबकि वास्तविकता इसके ठीक विपरीत हो सकती है। समस्या वहीं रहती है, केवल हमने उसे देखना और उसके खिलाफ आवाज उठाना बंद कर दिया होता है।इतिहास गवाह है कि अन्याय की सबसे बड़ी ताकत उसके समर्थक नहीं, बल्कि वे लोग होते हैं, जिन्होंने अन्याय को सामान्य मान लिया है। गुलामी, जातिगत भेदभाव, बाल मजदूरी, बाल विवाह, अस्पृश्यता और घरेलू हिंसा लंबे समय तक इसलिए चलती रही, क्योंकि समाज के बड़े हिस्से ने उन्हें जीवन का स्वाभाविक हिस्सा मान लिया था।नैतिक शून्यता का सबसे खतरनाक संकेत यही है। यह हमें जरूरी नहीं कि क्रूर बनाए, लेकिन यह हमें उदासीन जरूर बना देती है। और कई बार उदासीनता क्रूरता से भी अधिक विनाशकारी होती है। क्रूर लोग संख्या में बहुत कम होते हैं, लेकिन क्रूरता के प्रति उदासीन रहने वाले लोग बहुत अधिक होते हैं।इसलिए सवाल केवल यह नहीं है कि दहेज विरोधी कानून पूरी तरह सफल क्यों नहीं हो सके। इससे बड़ा सवाल यह है कि हमारे भीतर की आवाज आखिर कहां चली गई? वह कौन-सी प्रक्रिया है जिसने रोज मरती महिलाओं को हमारी सामूहिक चेतना से लगभग गायब कर दिया है? हम कब इतने व्यस्त, इतने अभ्यस्त और इतने असंवेदनशील हो गए कि एक विशाल सामाजिक त्रासदी हमारे लिए महज एक आंकड़ा बनकर रह गई?समाज के सामने सबसे बड़ा खतरा केवल अपराध नहीं है, बल्कि अपराध के आघात का समाप्त हो जाना है। क्योंकि जब अपराध हमें विचलित करना बंद कर देता है, तब केवल हमारी संवेदनाएं ही नहीं मरतीं, न्याय की संभावना भी धीरे-धीरे मरने लगती है।