डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा -सेठ लक्ष्मीचंद ने अपनी वसीयत में साफ लिखा था कि उनके कफन में कम से कम दस जेबें होनी चाहिए। उनके बेटों ने अपनी बुद्धि लगाई और कफन को ‘डिजिटल वॉलेट’ और ‘स्मार्ट चिप्स’ से लैस कर दिया। जब सेठ जी की आत्मा ऊपर पहुंची, तो उन्होंने देखा कि स्वर्ग के द्वार पर ‘एंट्री फीस’ का बोर्ड लगा है। सेठ जी ने अपनी कफन की जेब से ‘पुण्य-कार्ड’ निकाला और मशीन पर स्वाइप किया। मशीन ने आवाज दी— “एरर! आपका पुण्य बैलेंस ‘नकारात्मक’ है।” तभी एक यमदूत आया और बोला, “सेठ जी, यहाँ पुराने नोट नहीं चलते। आपने पृथ्वी पर जो अस्पताल बनवाए थे, उनका उद्घाटन ‘टैक्स बचाने’ के लिए किया गया था, इसलिए वह ‘डिस्काउंट’ में चला गया। जो भंडारे करवाए थे, उनमें आपने सड़ा हुआ अनाज बांटा था, उसका ‘पेनल्टी’ लगा है।” सेठ जी घबरा गए, “पर मैंने स्विस बैंक में जो जमा किया है, क्या वह यहाँ ट्रांसफर नहीं हो सकता?” यमदूत ने ठहाका लगाया, “स्विस बैंक का डेटा तो चित्रगुप्त ने ‘हैक’ कर लिया है। वहां का सारा पैसा अब ‘नर्क के सौंदर्यीकरण’ में लग रहा है।” सेठ जी ने देखा कि उनके साथ आए एक गरीब मजदूर को बिना किसी पूछताछ के ‘वीआईपी प्रवेश’ मिल रहा है। सेठ जी ने विरोध किया, “इसने तो कभी दान नहीं दिया!” यमदूत ने शांति से कहा, “सेठ जी, इसने अपनी जेब नहीं, बल्कि अपना खून और पसीना दूसरों के लिए खर्च किया था। इसके पास ‘पासवर्ड’ नहीं, बल्कि ‘दुआएं’ हैं।” सेठ जी अपने कफन की खाली जेबों को टटोलने लगे, जो अब केवल उनके पापों के बोझ से फटने लगी थीं। उन्हें समझ आया कि कफन में जेब तो हो सकती है, पर उनमें भरा हुआ सामान ऊपर जाकर ‘रद्दी’ बन जाता है।