लाल फीता

सदर तहसील के उस अंधेरे गलियारे में तीन टांगों के सहारे टिकी वह पुरानी लकड़ी की कुर्सी सालों से धूल फांक रही थी। वह कुर्सी दरअसल हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था का सजीव प्रतीक थी जिसमें स्थायित्व के लिए चौथे पाए की जगह ईंटों का एक चटखट्टा लगा हुआ था। ईंट और प्रशासन का पुराना रिश्ता है क्योंकि यहाँ फाइलें भी ईंट की रफ्तार से चलती हैं और अफ़सरों के दिल भी ईंट के ही बने होते हैं। पचहत्तर साल के जगन्नाथ बाबा हर सोमवार सुबह ठीक दस बजे अपने कांपते हाथों में एक लाल रंग की पुरानी फाइल दबाकर उस टूटी कुर्सी पर आकर बैठ जाते थे। दफ़्तर का नया चपरासी जब भी उन्हें वहाँ बैठते देखता तो झुंझलाकर कहता कि बाबा इस टूटी कुर्सी पर क्यों बैठते हो किसी दिन गिरकर अपनी बूढ़ी हड्डियां तुड़वा बैठोगे। चपरासी की यह चिंता मानवाधिकार से ज्यादा दफ़्तर की फर्श गंदी होने के डर से उपजी थी क्योंकि सरकारी फर्श पर बुजुर्ग का गिरना प्रोटोकॉल का उल्लंघन माना जाता है। बाबा अपनी सूजी हुई आँखों से उसकी तरफ देखते और उदास मुस्कान बिखेरते हुए कहते कि बेटा इस कुर्सी से मेरी आत्मा का नाता जुड़ चुका है। असल में आत्मा और परमात्मा के मिलन के लिए भारत में सरकारी दफ़्तर से उपयुक्त कोई जगह नहीं है क्योंकि यहाँ पहुँचकर आदमी को दुनिया की नश्वरता का तुरंत आभास हो जाता है।
दफ़्तर के बड़े बाबू अक्सर उन्हें देखकर ताना मारते कि ज़मीन का मुआवज़ा पाना इतना आसान नहीं होता बूढ़े तुम तीन साल से यहाँ चक्कर काट रहे हो पर फाइल आगे सरकती ही नहीं। बड़े बाबू का यह कहना वैसा ही था जैसे यमराज किसी को अमर होने का वरदान दे रहे हों। सरकारी फाइल में पहिये नहीं होते पर उसके पैर इतने लंबे होते हैं कि वह दराज़ से निकलकर अलमारी तक पहुँचने में एक पूरी पीढ़ी निगल जाती है। तहसील में आने वाले तमाम फरियादी और मुंशी उस टूटी कुर्सी पर बैठे जगन्नाथ बाबा को बड़े अचरज से देखते थे जैसे वे किसी ऐतिहासिक स्मारक के अवशेष हों। बाबा कभी किसी अफ़सर से बदतमीज़ी नहीं करते थे क्योंकि वे जानते थे कि अफ़सर को गुस्सा दिलाना साक्षात् ईश्वर को त्यागपत्र देने जैसा है। दोपहर ढलते ही वे अपनी फाइल को झोले में रखते और कुर्सी के ईंट वाले पाए को थोड़ा सीधा करके अपने घर चले जाते थे। गाँव के लोग कहते थे कि बाबा की उपजाऊ ज़मीन पर जब से नया हाईवे बना है तब से वे एक एक पैसे के लिए मोहताज हो गए हैं। हाईवे दरअसल विकास की वह सड़क है जिस पर अमीर अपनी गाड़ियाँ दौड़ाते हैं और गरीब अपनी फाइलें।
जब भी कोई मुंशी या वकील बाबा से उनका दुखड़ा पूछने आता तो वे सिर्फ फाइल की तरफ इशारा करते। पूरा तहसील प्रशासन इस बात से हैरान था कि कोई इंसान बिना किसी उग्र प्रदर्शन के केवल एक टूटी कुर्सी पर बैठकर इतना गहरा सन्नाटा कैसे रच सकता है। असल में भारतीय प्रशासन को शोर की आदत है पर खामोशी उसे डराती है क्योंकि खामोश आदमी कभी भी रिश्वत की पेशकश नहीं करता। एक दिन अचानक ज़िले के नए कलेक्टर ने तहसील का औचक निरीक्षण किया। कलेक्टर साहब के आने का मतलब था कि धूल झाड़ी जाएगी और भ्रष्टाचार को थोड़ी देर के लिए अलमारी में बंद कर दिया जाएगा। कलेक्टर साहब ने जब बाबा को उस खस्ताहाल कुर्सी पर बैठे देखा तो गुस्से में चपरासी को डांटते हुए कहा कि तुम लोग एक बुजुर्ग इंसान को इस टूटी कुर्सी पर बैठाकर उनकी जान से खिलवाड़ कर रहे हो। यह सरकारी संवेदनशीलता का वह क्षण था जब अफ़सर को कुर्सी की हालत देखकर दुख हुआ पर फाइल की हालत देखकर कोई फर्क नहीं पड़ा।read more:https://pahaltoday.com/demand-to-remove-government-country-liquor-shop-villagers-stage-protest-at-the-collectorate/#google_vignetteजगन्नाथ बाबा तुरंत अपनी जगह से खड़े हो गए और गिड़गिड़ाते हुए बोले कि साहब जी मेरी आपसे हाथ जोड़कर प्रार्थना है इस टूटी कुर्सी को मत हटवाइए यही तो मेरी आखिरी उम्मीद बची है। कलेक्टर साहब ने चकित होकर पूछा कि बाबा एक टूटी हुई सरकारी कुर्सी से आपकी ऐसी कौन सी उम्मीद बंधी हो सकती है। जगन्नाथ बाबा की आँखों से आंसुओं की धार बह निकली और वे कांपती आवाज़ में बोले कि साहब चार साल पहले मेरा बीस साल का बेटा इसी दफ़्तर में मुआवज़े के कागज़ जमा करने आया था और इसी टूटी कुर्सी पर बैठकर इंतज़ार करते करते भूखा प्यासा गिर पड़ा था जिससे उसकी रीढ़ की हड्डी हमेशा के लिए टूट गई थी। यह सुनकर प्रशासन के कानों पर जूँ तो नहीं रेंगी पर कलेक्टर साहब की कुर्सी ज़रूर थोड़ी हिली। बाबा ने कहा कि उस दिन अफ़सरों ने कहा था कि जब तक यह कुर्सी यहाँ रहेगी तब तक तुम्हारे बेटे का मुआवज़ा अटका रहेगा। अफ़सरों की ज़ुबान और पत्थर की लकीर में बस इतना अंतर है कि पत्थर की लकीर मिट सकती है पर अफ़सर की अकर्मण्यता कभी नहीं बदलती।मैं रोज़ यहाँ आकर इसी कुर्सी पर इसलिए बैठता हूँ ताकि इस दफ़्तर के बड़े अफ़सरों को याद रहे कि इस कुर्सी की एक टांग टूटने से मेरे घर का इकलौता सहारा अपाहिज हो गया। जिस व्यवस्था की अपनी टांग ईंट पर टिकी हो वह किसी बेसहारे का सहारा क्या बनेगी। यह सुनते ही पूरे तहसील परिसर में स्तब्धता छा गई जैसे किसी ने भ्रष्टाचार के मंदिर में सत्य का शंखनाद कर दिया हो। कलेक्टर साहब का सर शर्म से झुक गया जो कि एक दुर्लभ घटना थी क्योंकि आमतौर पर कलेक्टर का सर सिर्फ मंत्री के सामने झुकता है। उन्होंने तुरंत बाबा के झोले से फाइल निकाली और अपनी कलम से दस्तखत करते हुए रो पड़े। यह रोना शायद पश्चाताप का था या शायद इस बात का कि आज एक फाइल बिना किसी लेन देन के पूरी हो गई। जगन्नाथ बाबा ने उस स्वीकृत फाइल को सीने से लगाया और उस टूटी कुर्सी के पाए में लगी ईंट को सहलाते हुए बाहर की तरफ बढ़ गए। उन्होंने ईंट को ऐसे सहलाया जैसे वह कोई सरकारी पदक हो जो उन्हें सालों के इंतज़ार के बाद मिला था। बाहर उनका अपाहिज बेटा दवाइयों की राह देख रहा था और अंदर वह टूटी कुर्सी एक नई फाइल और एक नए बूढ़े का इंतज़ार करने लगी थी क्योंकि व्यवस्था बदलती नहीं बस अपना शिकार बदल लेती है।

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