अशोक भाटिया
इतिहास गवाह है कि जो राष्ट्र अपनी समुद्री सीमाओं की अनदेखी करता है, उसकी संप्रभुता और आर्थिक समृद्धि हमेशा खतरे में रहती है। भारत, चोल साम्राज्य और छत्रपति शिवाजी महाराज की महान नौसैनिक विरासत का उत्तराधिकारी होने के बावजूद, आजादी के बाद के कई दशकों तक एक ‘महाद्वीपीय मानसिकता’ का शिकार रहा। हमारी रक्षा नीतियों का झुकाव मुख्य रूप से स्थलीय सीमाओं की सुरक्षा तक सीमित रहा और नौसेना को वह रणनीतिक प्राथमिकता नहीं मिली जिसकी वह हकदार थी।वर्ष 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार बनने के बाद इस दृष्टिकोण में एक युगांतरकारी और मौलिक बदलाव आया। पिछले एक दशक (2014-2024 और उसके बाद) में भारतीय नौसेना ने न केवल अपनी परिचालन क्षमता का विस्तार किया है, बल्कि अपनी सांस्कृतिक और रणनीतिक पहचान का भी पुनरुद्धार किया है। ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ के संकल्पों पर सवार होकर आज भारतीय नौसेना हिंद महासागर से लेकर इंडो-पैसिफिक के सुदूर छोर तक वैश्विक व्यवस्था की एक अपरिहार्य और निर्णायक शक्ति बन चुकी है। समुद्र की लहरों पर दौड़ती इसी अदम्य भारतीय शक्ति को आज पूरी दुनिया सम्मान के साथ सलाम कर रही है।गौरतलब है कि एक दशक पहले तक भारत की गिनती दुनिया के सबसे बड़े रक्षा आयातकों में होती थी। जटिल सैन्य उपकरणों, युद्धपोतों और पनडुब्बियों के लिए विदेशी आपूर्तिकर्ताओं पर हमारी निर्भरता रणनीतिक स्वायत्तता के लिए एक बड़ा खतरा थी। संकट के समय विदेशी ताकतों द्वारा कलपुर्जों की आपूर्ति रोकने का जोखिम हमेशा बना रहता था। प्रधानमंत्री मोदी ने इस बुनियादी कमजोरी पर प्रहार करते हुए नौसेना को “बिल्डर नेवी” (में बदलने का स्पष्ट रोडमैप दिया।प्रोजेक्ट 17A और अन्य अत्याधुनिक रक्षा परियोजनाओं के तहत आइएनएस महेंद्रगिरी , आइएनएसदुनागिरी , आइएनएससंशोधक , और आइएनएस अग्रे जैसे गाइडेड-मिसाइल और स्टील्थ युद्धपोतों का घरेलू शिपयार्ड्स में निर्माण भारत की बदलती औद्योगिक और तकनीकी क्षमता का सबसे बड़ा प्रमाण है। ये केवल स्टील के तैरते हुए ढांचे नहीं हैं; ये भारत में ही विकसित उन्नत रडार, सोनार, अत्याधुनिक सेंसर और ब्रह्मोस जैसी अचूक मिसाइल प्रणालियों से लैस आधुनिक तैरते हुए अभेद्य किले हैं।माझगांव डॉक , गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स , और कोचीन शिपयार्ड जैसी सार्वजनिक और निजी क्षेत्र की कंपनियों को बड़े पैमाने पर वित्तीय सहायता और अत्याधुनिक बुनियादी ढांचा प्रदान किया गया। आज इन शिपयार्ड्स के पास एक साथ दर्जनों युद्धपोतों और पनडुब्बियों के निर्माण की क्षमता है। परिणाम यह है कि वर्तमान में नौसेना के भावी बेड़े में शामिल होने वाले युद्धपोतों में स्वदेशीकरण का स्तर 80 से 90 प्रतिशत तक पहुंच चुका है। रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया (DAP) में किए गए नीतिगत सुधारों ने देश के भीतर एक मजबूत रक्षा इकोसिस्टम तैयार किया है। हजारों लघु और मध्यम उद्योग (MSMEs) और टेक स्टार्ट-अप्स आज नौसेना के लिए विश्व स्तरीय कलपुर्जे और सॉफ्टवेयर विकसित कर रहे हैं, जिससे देश का पैसा देश के भीतर ही रह रहा है और रोजगार के नए अवसर पैदा हो रहे हैं।read more:https://khabarentertainment.in/excise-department-raids-dhabas/भारतीय नौसेना के आधुनिक इतिहास में 2 सितंबर 2022 का दिन स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज हो चुका है। इस दिन देश के पहले स्वदेशी विमानवाहक पोत आईएनएस विक्रांत को नौसेना के बेड़े में शामिल किया गया था। आईएनएस विक्रांत केवल एक सैन्य जहाज़ नहीं है, बल्कि यह इक्कीसवीं सदी के भारत के सामर्थ्य, कौशल और राष्ट्रीय संकल्प का चमकता हुआ प्रतीक है।इस विशाल फ्लोटिंग एयरफील्ड के निर्माण के साथ ही भारत दुनिया के उन चुनिंदा 5-6 देशों के विशिष्ट और संभ्रांत क्लब में शामिल हो गया, जो 40,000 टन से अधिक वजनी और अत्याधुनिक विमानवाहक पोतों को पूरी तरह से खुद डिजाइन और निर्मित करने की क्षमता रखते हैं।इस ऐतिहासिक अवसर पर प्रधानमंत्री मोदी ने एक और बड़ा रणनीतिक और सांस्कृतिक कदम उठाया। नौसेना के ध्वज से औपनिवेशिक गुलामी के प्रतीक ‘सेंट जॉर्ज क्रॉस’ को हमेशा के लिए हटा दिया गया और उसकी जगह छत्रपति शिवाजी महाराज की राजमुद्र से प्रेरित नए नौसैनिक ध्वज (निशान) का अनावरण किया गया। यह कदम इस बात का उद्घोष था कि नया भारत अब अपनी सुरक्षा रणनीतियां और अपनी पहचान विदेशी चश्मे से नहीं, बल्कि अपनी गौरवशाली विरासत के आधार पर तय करेगा।हिंद महासागर क्षेत्र दुनिया का सबसे व्यस्त और महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्ग है। दुनिया की कुल ऊर्जा आपूर्ति और वाणिज्यिक जहाजों का एक बहुत बड़ा हिस्सा इसी क्षेत्र से गुजरता है। पिछले एक दशक में इस क्षेत्र में चीन की बढ़ती आक्रामकता, पनडुब्बियों की अनधिकृत आवाजाही और उसकी ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ रणनीति ने एक बड़ा असंतुलन पैदा करने की कोशिश की थी। लेकिन भारत ने अपनी मजबूत नौसैनिक उपस्थिति से चीन की इस घेराबंदी को पूरी तरह से निष्प्रभावी कर दिया है।प्रधानमंत्री मोदी की विदेश और रक्षा नीति का मूल मंत्र सागर और हालिया महासागर दृष्टिकोण है। यह विजन स्पष्ट करता है कि भारत हिंद महासागर क्षेत्र में एक आक्रामक शक्ति नहीं, बल्कि एक समावेशी और सहयोगी शक्ति है, जो सभी पड़ोसी मित्र देशों की सुरक्षा और आर्थिक प्रगति को अपनी प्रगति से जोड़कर देखता है।पिछले कुछ वर्षों में अदन की खाड़ी, लाल सागर और अरब सागर में वाणिज्यिक जहाजों पर सोमाली डाकुओं के आतंक और ड्रोन हमलों में अचानक भारी वृद्धि देखी गई। जब दुनिया की कई बड़ी नौसेनाएं इस संकट के सामने असहाय या रक्षात्मक मुद्रा में थीं, तब भारतीय नौसेना ने ‘फर्स्ट रिस्पॉन्डर’ की भूमिका निभाते हुए कड़ा रुख अपनाया। नौसेना के विशेष कमांडो ने रात के अंधेरे में बीच समुद्र में कई साहसिक ऑपरेशन चलाए। उन्होंने न केवल भारतीय जहाजों को बचाया, बल्कि बुल्गारिया, पाकिस्तान, ईरान और अन्य देशों के अपहृत जहाजों और उनके चालक दल के सदस्यों को मौत के मुंह से सुरक्षित बाहर निकाला। बुल्गारिया के राष्ट्रपति द्वारा इसके लिए भारत सरकार और नौसेना का सार्वजनिक आभार व्यक्त करना इस बात का प्रमाण है कि आज पूरी दुनिया भारत की इस वैश्विक भूमिका को सलाम कर रही है।किसी भी देश को वैश्विक महाशक्ति का दर्जा तब तक प्राप्त नहीं हो सकता, जब तक कि उसके पास जमीन, हवा और समुद्र तीनों मोर्चों से परमाणु हमले का मुकाबला करने की अचूक क्षमता न हो। इसे रक्षा की भाषा में ‘न्यूक्लियर ट्रायाड’ कहा जाता है। पिछले दस वर्षों में भारत ने समुद्र के नीचे अपनी ‘सेकंड स्ट्राइक कैपेबिलिटी’ को अत्यंत अभेद्य और विश्वसनीय बनाया है।भारत की पहली स्वदेशी परमाणु बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बी आइएनएस अरिहंत और उसके बाद उन्नत संस्करण आइएनएस अरिघोत की सफल तैनाती ने देश की रणनीतिक कूटनीति को एक नई ऊंचाई दी है। ये परमाणु पनडुब्बियां समुद्र की अगाध गहराइयों में महीनों तक बिना भनक लगे छिपी रह सकती हैं और दुश्मन के किसी भी दुस्साहस या पहले परमाणु हमले की स्थिति में जवाबी परमाणु हमला करने की अचूक क्षमता रखती हैं।स्कॉर्पीन श्रेणी की अत्याधुनिक पारंपरिक पनडुब्बियों (जैसे आईएनएस कलवरी, खंदेरी, करंज, वेला, वागीर और वागशीर) के बेड़े ने भारतीय नौसेना की खुफिया और स्टील्थ मारक क्षमता को दुश्मन के तटीय क्षेत्रों के बेहद करीब तक पहुंचा दिया है। ये पनडुब्बियां समुद्र के नीचे भारत की आंख और कान बनकर देश की सीमाओं की रक्षा कर रही हैं।इक्कीसवीं सदी के आधुनिक युद्ध केवल पारंपरिक तोपों, गोलों और मिसाइलों से नहीं, बल्कि डेटा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता , साइबर स्पेस और इलेक्ट्रो-मैग्नेटिक स्पेक्ट्रम में लड़े जाते हैं। प्रधानमंत्री मोदी के कार्यकाल में भारतीय नौसेना को ‘नेट-सेंट्रिक वॉरफेयर’ यानी सूचना-केंद्रित युद्ध प्रणाली के अनुकूल बनाने के लिए बड़े पैमाने पर तकनीकी सुधार किए गए हैं।नौसेना के समर्पित सैन्य उपग्रहों जीएसएटी श्रृंखला की मदद से आज भारत वास्तविक समय में पूरे हिंद महासागर और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र पर चौबीसों घंटे पैनी नजर रख रहा है। समुद्री क्षेत्र जागरूकता के तहत गुरुग्राम में स्थापित ‘इन्फॉर्मेशन फ्यूजन सेंटर’ आज दुनिया के दर्जनों देशों के साथ रीयल-टाइम डेटा साझा करता है, जिससे समुद्र में होने वाली हर संदिग्ध गतिविधि पर नजर रखी जा सके।इसके अतिरिक्त, अमेरिकी प्रीडेटर एम क्यू 9B सी गार्जियन ड्रोन्स की रणनीतिक खरीद और घरेलू स्तर पर ‘स्वावलंबन’ जैसी पहलों के माध्यम से मानवरहित प्रणालियों स्वायत्त जहाजों और एंटी-ड्रोन जैमर्स को शामिल कर नौसेना ने खुद को भविष्य के युद्धों के लिए पूरी तरह तैयार कर लिया है।स्पष्ट है कि आज भारतीय नौसेना केवल युद्ध की तैयारी करने वाला बल नहीं है, बल्कि यह भारत की विदेश नीति का सबसे मजबूत और चमकीला माध्यम बन चुकी है।अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया जैसी वैश्विक महाशक्तियों के साथ मिलकर किया जाने वाला ‘मालाबार युद्धाभ्यास’ और भारत द्वारा आयोजित बहुराष्ट्रीय ‘मिलन’ युद्धाभ्यास, जिसमें दुनिया के 50 से अधिक देश शामिल होते हैं, इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था बनाए रखने की भारत की केंद्रीय भूमिका को प्रदर्शित करता है।चाहे तुर्की या नेपाल में आया विनाशकारी भूकंप हो, यमन और सूडान के गृहयुद्ध के बीच से विदेशी नागरिकों को सुरक्षित बाहर निकालना हो, या कोविड-19 महामारी के दौरान मित्र देशों तक ‘मिशन सागर’ के तहत दवाएं और ऑक्सीजन पहुंचाना हो—भारतीय नौसेना हमेशा संकटमोचक बनकर सबसे आगे खड़ी रही है। भारत की इसी मानवीय और पराक्रमी कूटनीति का परिणाम है कि आज दुनिया का हर मंच भारत की नौसैनिक शक्ति को वैश्विक शांति का आधार मानता है।प्रसिद्ध नौसैनिक रणनीतिकार अल्फ्रेड थायर महान ने कहा था, “जिस राष्ट्र का समुद्र पर नियंत्रण होगा, वही दुनिया की नियति और अर्थव्यवस्था को तय करेगा।” प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस शाश्वत सत्य को समय रहते पहचाना और भारतीय नौसेना को नीतिगत प्राथमिकताओं के केंद्र में लाकर खड़ा कर दिया।आज जब भारत दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने और वर्ष 2047 तक ‘विकसित भारत’ के लक्ष्य को प्राप्त करने की ओर अग्रसर है, तब देश का 95 प्रतिशत व्यापार (मात्रा के अनुसार) और 65 प्रतिशत व्यापार (मूल्य के अनुसार) समुद्र के रास्ते ही संपन्न होता है। ऐसे में एक शक्तिशाली, आधुनिक और आत्मनिर्भर नौसेना देश की आर्थिक समृद्धि और विकास का सबसे बड़ा सुरक्षा कवच है।पिछले दस-बारह वर्षों का यह स्वर्णिम सफर इस बात का जीवंत साक्ष्य है कि भारतीय नौसेना अब केवल अपनी मुख्य भूमि की रक्षा करने वाला बल नहीं है; बल्कि यह वैश्विक शांति, नौवहन की स्वतंत्रता और अंतरराष्ट्रीय समुद्री कूटनीति की मार्गदर्शक बन चुकी है। समुद्र की नीली लहरों की छाती को चीरकर दौड़ती भारत की यह नौसैनिक शक्ति आज दुनिया के सामने यह उद्घोष कर रही है कि इक्कीसवीं सदी का भारत अपनी रक्षा करने में पूरी तरह सक्षम है और वैश्विक शांति का सबसे मजबूत स्तंभ है। यही कारण है कि आज पूरी दुनिया भारतीय नौसेना के इस पराक्रम और देश के दृढ़ नेतृत्व को झुककर सलाम कर रही है।