डॉ. भीमराव अंबेडकर महाविद्यालय में लघु फिल्मों के जरिए साइबर सुरक्षा और महिला सुरक्षा का संदेश

साइबर अपराध और महिलाओं की सुरक्षा जैसे गंभीर सामाजिक मुद्दों को रचनात्मक माध्यम से समाज के सामने लाने के उद्देश्य से आयोजित विशेष फिल्म प्रदर्शन में दो महत्वपूर्ण लघु फिल्मों ‘क्यों’ और ‘डर’ का प्रदर्शन किया गया। दोनों फिल्मों ने अलग-अलग सामाजिक परिस्थितियों को केंद्र में रखते हुए दर्शकों को अपने आस-पास मौजूद चुनौतियों के प्रति सजग होने और सुरक्षित समाज के निर्माण में अपनी भूमिका समझने का संदेश दिया।कार्यक्रम में प्रदर्शित पहली फिल्म ‘क्यों’ का निर्देशन उदय ने किया। फिल्म साइबर क्राइम से जुड़ी घटना के माध्यम से डिजिटल दुनिया में बढ़ते खतरों, ऑनलाइन असुरक्षा और उससे उत्पन्न होने वाली परेशानियों को प्रभावशाली ढंग से सामने रखती है,फिल्म यह महत्वपूर्ण सवाल उठाती है कि तकनीक के बढ़ते इस्तेमाल के बीच व्यक्ति अपनी निजी जानकारी, डिजिटल पहचान और ऑनलाइन गतिविधियों को लेकर कितना जागरूक और सतर्क है। फिल्म के माध्यम से साइबर सुरक्षा, डिजिटल सावधानी तथा किसी संदिग्ध ऑनलाइन गतिविधि की तत्काल सूचना देने की आवश्यकता को रेखांकित किया गया।वहीं दूसरी फिल्म ‘डर’ का निर्देशन नंदिनी ने किया। फिल्म ने महिलाओं के प्रति समाज में मौजूद भय और असुरक्षा की भावना को संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत किया। फिल्म का केंद्रीय भाव यह रहा कि किसी महिला का सुरक्षित महसूस करना केवल उसकी व्यक्तिगत जिम्मेदारी नहीं, बल्कि परिवार, समाज और संस्थाओं की सामूहिक जिम्मेदारी है।‘डर’ ने दर्शकों को महिलाओं के प्रति संवेदनशील दृष्टिकोण विकसित करने तथा भय के वातावरण को समाप्त करने के लिए सामाजिक स्तर पर सकारात्मक पहल करने का संदेश दिया।कार्यक्रम में डॉ. भीमराव अंबेडकर महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी पत्रकारिता विभाग के एचओडी एवं प्रो. बिजेंद्र कुमार की उपस्थिति ने आयोजन को अकादमिक और वैचारिक दृष्टि से महत्वपूर्ण बनाया। उन्होंने फिल्मों को केवल मनोरंजन का माध्यम न मानते हुए सामाजिक संवाद और जन-जागरूकता का प्रभावी माध्यम बताया। उनके अनुसार, जब गंभीर सामाजिक समस्याओं को रचनात्मक अभिव्यक्ति के माध्यम से सामने रखा जाता है, तो दर्शक उससे भावनात्मक रूप से जुड़ते है और समस्या पर गंभीरता से विचार करने के लिए प्रेरित होते है।कार्यक्रम के दौरान छात्र-छात्राओं शिल्पा कुमारी, हरिकेश, आदर्श, तनु और ब्यूटी यादव ने भी फिल्मों के विषय और उनके सामाजिक प्रभाव को लेकर अपने विचार साझा किए। छात्रों ने कहा कि साइबर अपराध को केवल तकनीकी समस्या समझना उचित नहीं है, क्योंकि इसके प्रभाव सीधे व्यक्ति, परिवार और समाज तक पहुंचते है उनके विचारों में डिजिटल माध्यमों के इस्तेमाल में सावधानी, निजी जानकारी की सुरक्षा और साइबर घटनाओं के प्रति तत्काल प्रतिक्रिया की आवश्यकता प्रमुखता से सामने आई।read more:https://pahaltoday.com/woman-posing-as-a-bride-flees-after-administering-a-sedative-remains-at-large-even-after-a-month-and-a-half/शिल्पा कुमारी ने महिला सुरक्षा के संदर्भ में जागरूकता को आवश्यक बताते हुए इस बात पर जोर दिया कि महिलाओं को भय के वातावरण में नहीं, बल्कि आत्मविश्वास और सम्मान के साथ जीवन जीने का अधिकार मिलना चाहिए। हरिकेश ने साइबर सुरक्षा को वर्तमान पीढ़ी की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी बताते हुए कहा कि इंटरनेट का इस्तेमाल करते समय छोटी-सी लापरवाही भी गंभीर समस्या का कारण बन सकती है।आदर्श ने दोनों फिल्मों के विषयों को वर्तमान समय से जोड़ते हुए कहा कि साइबर दुनिया और वास्तविक सामाजिक जीवन, दोनों में सुरक्षा के लिए जागरूकता आवश्यक है, तनु ने महिला सुरक्षा को केवल कानून का विषय न मानकर सामाजिक सोच में बदलाव से जोड़ने की आवश्यकता पर बल दिया। वहीं ब्यूटी यादव ने रचनात्मक फिल्मों को युवाओं तक सामाजिक संदेश पहुंचाने का प्रभावी माध्यम बताते हुए कहा कि ऐसे विषयों पर लगातार संवाद होना चाहिए, ताकि युवा केवल समस्याओं को समझें ही नहीं, बल्कि उनके समाधान में भी अपनी भूमिका निभा सकें।छात्रों के विचारों से यह बात स्पष्ट हुई कि युवा पीढ़ी साइबर सुरक्षा और महिला सुरक्षा को केवल अलग-अलग मुद्दों के रूप में नहीं देखती, बल्कि इन्हें व्यापक सामाजिक सुरक्षा से जोड़कर समझती है डिजिटल माध्यम में किसी व्यक्ति की निजता और वास्तविक जीवन में महिला की गरिमा—दोनों की रक्षा समान रूप से आवश्यक है।दोनों फिल्मों की विषय-वस्तु भले ही अलग रही, लेकिन उनका मूल उद्देश्य समाज को जागरूक, संवेदनशील और जिम्मेदार बनाना रहा। ‘क्यों’ ने डिजिटल दुनिया में सावधानी और साइबर सुरक्षा का संदेश दिया, जबकि ‘डर’ ने महिलाओं के लिए सुरक्षित और भयमुक्त सामाजिक वातावरण की आवश्यकता को रेखांकित किया।कार्यक्रम में यह संदेश भी उभरकर सामने आया कि साइबर अपराध और महिला सुरक्षा जैसी चुनौतियों का समाधान केवल कानून और प्रशासन के स्तर पर संभव नहीं है। इसके लिए परिवार, शैक्षणिक संस्थानों, शिक्षकों, विद्यार्थियों, युवाओं और नागरिक समाज की सामूहिक भागीदारी आवश्यक है जागरूकता, संवाद और संवेदनशीलता को सामाजिक व्यवहार का हिस्सा बनाकर ही सुरक्षित वातावरण तैयार किया जा सकता है।फिल्मों के माध्यम से उठाए गए इन सवालों ने दर्शकों को यह सोचने के लिए प्रेरित किया कि आधुनिक समाज में सुरक्षा केवल भौतिक स्थानों तक सीमित नहीं है।डिजिटल दुनिया में सुरक्षित रहना, महिलाओं के लिए भयमुक्त वातावरण तैयार करना और युवाओं को जिम्मेदार नागरिक बनाना—सुरक्षित एवं संवेदनशील समाज की साझा जिम्मेदारी है।

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