बहराइच ( महसी )। घाघरा नदी की गोद में बसे महसी तहसील के कछार क्षेत्र में समय जैसे थम गया है। दुनिया जहां मंगल ग्रह पर बस्तियां बसाने का ख्वाब देख रही है, वहीं बहराइच के महसी तहसील अंतर्गत बेलहा मेहरौली तटबंध पर सैकड़ों परिवार पिछले 20 वर्षों से फूस की झोपड़ियों में आदिम युग जैसा जीवन जीने को मजबूर हैं।घाघरा की विनाशकारी कटान में सबकुछ गंवा चुके इन पीड़ितों की आंखें पुनर्वास की आस में पथरा सी गई हैं, लेकिन सूबे की सरकारें बदल गईं, अफसर आए-गए, मगर इनके जख्मों पर मरहम नहीं लग सका।
कागजों पर पुनर्वास, जमीन पर अंधेरा
शासन और जिला प्रशासन समय-समय पर कटान पीड़ितों के पुनर्वास को लेकर बड़े-बड़े दावे करता है। करोड़ों की योजनाओं का खाका भी बनता है। लेकिन धरातल की सच्चाई कुछ और ही है। बेलहा मेहरौली तटबंध की पटरी पर बसी सैकड़ों झोपड़ियों में रहने वाले परिवारों के पास न जमीन है, न पक्का मकान, न शौचालय।ग्राम पंचायत मुरौवा निवासी अनिल सिंह और कैलाश बताते हैं कि 20 साल पहले घाघरा की कटान में उनका पैतृक घर, खेत और पूरा आशियाना नदी में समा गया था। तब से परिवार तटबंध पर टिन और फूस डालकर रह रहा है। हर बरसात आफत बनकर आती है। जिला प्रशासन आज तक इन्हें एक अदद आवासीय भूमि का पट्टा भी नहीं दे सका।read more:”https://khabarentertainment.in/cattle-found-below-standards-and-shortage-of-fodder-observed-during-sdms-surprise-inspection/
सरकारी योजनाएं बनीं दूर का सपना
पीड़ितों का आरोप है कि वे तहसील से लेकर जिला मुख्यालय तक कई बार चक्कर लगा चुके हैं। प्रधानमंत्री आवास योजना, शौचालय और आवासीय भूमि के लिए प्रार्थना पत्र दिए, लेकिन फाइलें आज भी बाबुओं की मेज पर धूल फांक रही हैं।ड़कड़ाती ठंड, झुलसाने वाली गर्मी और मूसलाधार बारिश में छह-छह लोगों का परिवार एक झोपड़ी में जीवन काट रहा है। बिना शौचालय और साफ पानी के बीमारियां भी पीछा नहीं छोड़तीं। सरकारी संवेदनहीनता के कारण ये परिवार दुश्वारियों के दलदल में फंस चुके हैं।
जनप्रतिनिधियों की चुप्पी पर सवाल
इस पूरे प्रकरण में क्षेत्रीय जनप्रतिनिधियों की चुप्पी सबसे अधिक खल रही है। चुनाव के समय तटबंधों की खाक छानकर वोट मांगने वाले नेता जीत के बाद इन पीड़ितों को भूल जाते हैं। महसी तहसील प्रशासन और बहराइच जिला प्रशासन की लापरवाही के चलते पुनर्वास की फाइलें सिर्फ कागजों तक सीमित रह गई हैं।पीड़ितों का कहना है कि सरकारें बदलती हैं, नारे बदलते हैं, लेकिन उनकी किस्मत नहीं बदलती। तटबंध पर रहने वाले बच्चे बिना शिक्षा के बड़े हो रहे हैं और युवा रोजगार के अभाव में पलायन को मजबूर हैं।
शासन से न्याय की गुहार
अब अनिल, कैलाश सहित सैकड़ों पीड़ित परिवारों ने सीधे शासन से हस्तक्षेप की मांग की है। उनकी मांग है कि मामले की उच्च स्तरीय जांच कराई जाए और अविलंब आवासीय भूमि आवंटित कर प्रधानमंत्री आवास व शौचालय जैसी मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं, ताकि वे सम्मानजनक जीवन जी सकें।स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि समय रहते पुनर्वास नहीं हुआ तो अगली बाढ़ में ये परिवार फिर बेघर हो जाएंगे। अब देखना है कि ‘सबका साथ, सबका विकास’ का दावा करने वाली सरकार इन बेबस चीखों को कब सुनती है, या बहराइच प्रशासन फाइलें बंद कर सोता रहता है।