पुरानी टीस के साथ भोजपुरी भाषियों के लिए आशा की किरण है कचौड़ी गली

करुणा नयन

भोजपुरी हमेशा से माधुर्य की भाषा रही है। इसके लोकगीतों में विरह-वेदना, प्रेम-प्रसंग और ग्रामीण जीवन का सजीव चित्रण देखने को मिलता है। लोकगीतों की यही ख़ासियत होती है कि वह समाज से निकलकर उस संस्कृति का प्रतिनिधित्व करते हैं। इनका अपना अलग अंदाज होता है। इनमें भावनाओं का तीव्र प्रवाह और तत्कालीन समाज की स्थितियों का चित्र प्रतिबिंबित होता है। उसकी सहायता से ही हम उस दौर की तमाम स्मृतियों को जानने और समझने में सहूलियत हासिल करते हैं। इन दिनों भोजपुरी की दुनिया फिर से चर्चाओं में है। इस बार वह अपने अश्लील और फूहड़ गीतों के कारण नहीं बल्कि कोक स्टूडियो से रिलीज़ ‘कचौड़ी गली’ गीत से सभी का ध्यान आकर्षित कर रहा है।read more:https://pahaltoday.com/mayawati-is-trying-to-unite-all-castes-for-the-upcoming-uttar-pradesh-assembly-elections/विगत कुछ ढाई दशक में भोजपुरी और उसके गानों में अश्लीलता और विद्रूपता का प्रभाव तेजी से बढ़ा है। ऐसे गानों के प्रभाव को कम करने के लिए और भोजपुरी की पुन: समृद्धि के लिए आज के दौर में कचौड़ी गली गीत वरदान बनकर सामने आई है। यह गीत आज से करीब 200 साल पहले अस्तित्व में आई थी। इसके अभिलेखीय और लिखित साक्ष्य उपलब्ध नहीं है। किसने लिखा, किसके माध्यम से गीत चर्चित हुआ, इसकी अनुपलब्धता के कारण यह कहना सही नहीं है कि यह किसकी रचना है। लेकिन इस गीत की कड़ी तत्कालीन समाज के पूरब की तरफ माइग्रेशन यानी आजीविका के लिए पलायन से जरूर जुड़ता है। गौहर जान, सुंदर वेश्या या सुंदरीबाई और काशी के पहलवान दाताराम से इस गीत के प्रसंग जुडते हैं या नहीं इसकी प्रामाणिक पुष्टी का दावा मैं नहीं कर सकता, क्योंकि इस प्रसंग के कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं। यह ऐतिहासिक प्रसंग किवदंती भी हो सकती हैं और सच्चाई भी। लेकिन गीत के बोल ‘पिया चली गइले रंगून हो, कचौड़ी गली सून कइला बलमू’ रेखांकित करता है कि उस समय रंगून पूरबी लोगों के पलायन का प्रमुख केंद्र था। इसकी झलक हिंदी के प्रमुख मशहूर गीत ‘मेरे पिया गए रंगून’ में भी आता है। यह दिखाता है कि रंगून अंग्रेजों के लिए भारतीय लोगों की प्रयोगशाला थी जहां लोगों को जबरदस्ती, बहला-फुसलाकर काम के लिए ले जाया जाता था। यह गीत उसी बिरह के आग की उपज का नतीजा है। भोजपुरी लोकगीतों में बिरह-वेदना के भाव शुरू से रहे हैं। भिखारी ठाकुर का बिदेसिया इसका जीवंत साक्ष्य है। महेंदर मिसिर, भरत शर्मा ‘व्यास’, मदन राय और शारदा सिन्हा को इसी भाव ने लोकप्रियता के शीर्ष पर पहुँचाया। कचौड़ी गली बनारसियों की अंतरात्मा में बसी हुई है, जो बनारस या उसके आसपास के क्षेत्र के लोग होंगे; वह यह जानते हैं और महसूस भी कर सकते हैं कि बनारसियों की सुबह गंगा स्नान और बाबा विश्वनाथ के दर्शन के पश्चात उड़द की दाल में हींग और चटक मसालों के मिश्रण से बनी करारी कचौड़ी और कोहंड़ा की सब्जी के साथ ही शुरू होती है। यह बनारस की फ़िज़ाओं में है। यही कचौड़ी गली की खूबसूरती है। बनारस के आसपास के लोग इससे भलीभांति परिचित हैं। ऐसे में यह गीत उन स्मृतियों को पुन: जीवंत कर देती है। मैंने पहली बार इस गीत को मालिनी अवस्थी की आवाज में सुना था। फिर जब गीत-संगीत की थोड़ी समझ विकसित हुई तो सोमा घोष की आवाज और भारत रत्न बिस्मिल्लाह खान के कंपोजिशन में सुना और अब इसे पुनः प्रसिद्ध पार्श्व गायिका रेखा भारद्वाज की आवाज में नए वर्जन में सुन रहा हूँ। सच कहूं तो कुछ गाने पीढ़ी दर पीढ़ी प्रसिद्धि प्राप्त करते जाते हैं। यह गीत उसी श्रेणी में शामिल है। हर पीढ़ी में गानें का वर्जन बदला, बोल भी बदले हैं। किंतु उसकी प्रासंगिकता कभी समाप्त नहीं हुई ,कचौड़ी गली गीत उसी कड़ी में अपने आपको स्थापित करती है। इसके बोल जीवंत हैं और गीत अमर।

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