अविवेकपूर्ण विकास और जलवायु परिवर्तन से हिमालय में बढ़ रही हैं बादल फटने की घटनाएं

वीरेंद्र बहादुर सिंह 
शोधकर्ताओं के अनुसार, जब बंगाल की खाड़ी और अरब सागर से आने वाली नम हवाएं हिमालय की ऊंची ढलानों से टकराती हैं, तो वे बहुत तेजी से ऊपर उठती हैं। ऊपर पहुंचते ही हवा ठंडी हो जाती है और क्यूम्युलोनिम्बस बादलों का निर्माण करती है। ये घने, काले और गरज-चमक वाले बादल अपने सीमित क्षेत्र में अत्यधिक वर्षा करते हैं। भारतीय मौसम विभाग के शोध के अनुसार, ऐसी घटनाएं मुख्यतः 1,000 से 2,500 मीटर की ऊंचाई वाले क्षेत्रों में होती हैं। इन स्थानों पर घाटियों का आकार कटोरे जैसा होता है, जिससे बादल वहीं फंस जाते हैं और वायु का प्रवाह रुक जाता है। परिणामस्वरूप बादल एक ही स्थान पर अत्यधिक पानी बरसा देते हैं।एक नए अध्ययन में यह भी सामने आया है कि हिमालय बहुत तेजी से गर्म हो रहा है। जम्मू-कश्मीर के कुछ हिस्सों में केवल दो दशकों के भीतर तापमान लगभग एक डिग्री सेल्सियस बढ़ गया है। सबसे तेज तापमान वृद्धि ऊंचाई वाले क्षेत्रों में दर्ज की गई है।हाल ही में कश्मीर के अनंतनाग जिले में दो स्थानों पर बादल फटने से फ्लैश फ्लड जैसी स्थिति पैदा हो गई। पहला बादल शांगस के चटरगुल के ऊपरी क्षेत्र में फटा। जानकारों के अनुसार, आरिपथ नाले का जलस्तर अचानक बढ़ जाने से यह स्थिति बनी। इस घटना के केवल एक घंटे बाद ओवेरा वन्यजीव अभयारण्य में भी बादल फट गया। इससे पहले 13 और 14 जून को भी शांगस क्षेत्र में बादल फटने की घटनाएं हुई थीं, जिनसे खेतों, बागों और मकानों को व्यापक नुकसान पहुंचा था। चिंता की बात यह है कि इन दिनों पहलगाम, सिरहामा और लारनू क्षेत्रों से भी लगातार ऐसी घटनाओं की खबरें आ रही हैं। कुछ दिन पहले हिमाचल प्रदेश के लाहौल स्पीति में भी इसी प्रकार की स्थिति बनी थी।उल्लेखनीय है कि हिमालयी क्षेत्र में बादल फटने की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। भारतीय मौसम विभाग के वैज्ञानिकों के अनुसार, ऐसी अधिकांश घटनाएं 1,000 से 2,500 मीटर की ऊंचाई वाले क्षेत्रों में दर्ज की गई हैं। उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर सबसे अधिक संवेदनशील क्षेत्र माने जाते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि हिमालय में बादल फटने की घटनाएं वास्तविक संख्या में बहुत अधिक होती हैं, लेकिन उनमें से केवल कुछ ही घटनाएं समाचारों में आती हैं, विशेषकर तब जब फ्लैश फ्लड से जानमाल का नुकसान होता है।भारतीय मौसम विभाग के अनुसार, बादल फटना वास्तव में बादल के टुकड़े-टुकड़े हो जाने की घटना नहीं है। जब 20 से 30 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में एक घंटे के भीतर 100 मिलीमीटर या उससे अधिक वर्षा होती है, तो उसे क्लाउडबर्स्ट कहा जाता है। यह घटना बहुत छोटे क्षेत्र में और बहुत कम समय में होती है। सामान्यतः इसकी भविष्यवाणी करना अत्यंत कठिन होता है। अधिकतर घटनाएं हिमालय के दुर्गम इलाकों में होती हैं। शोध के अनुसार, ऐसा तब होता है जब पर्वत मानसूनी नमी से भरी हवाओं को रोक देते हैं। पर्वतों के बीच फंसे बादल एक ही स्थान पर अत्यधिक वर्षा करते हैं, जिससे फ्लैश फ्लड की स्थिति बन जाती है।शोधकर्ताओं के अनुसार, बंगाल की खाड़ी और अरब सागर से आने वाली हवाएं जब हिमालय की ऊंची ढलानों से टकराती हैं तो वे तेजी से ऊपर उठती हैं। ऊपर पहुंचकर हवा ठंडी होती है और क्यूम्युलोनिम्बस बादल बनाती है। इन्हें काले, घने और गरज-चमक वाले बादल कहा जाता है, जो छोटे से क्षेत्र में अत्यधिक वर्षा करते हैं। इस प्रक्रिया को ‘ओरोग्राफिक लिफ्ट’ कहा जाता है। आईएमडी के अध्ययन के अनुसार, यह प्रक्रिया मुख्यतः 1,000 से 2,500 मीटर की ऊंचाई वाले क्षेत्रों में होती है। यहां घाटियों का आकार कटोरे जैसा होता है, जिससे बादल फंस जाते हैं और हवा का प्रवाह रुक जाता है। परिणामस्वरूप बादल एक ही स्थान पर अत्यधिक पानी बरसा देते हैं। जहां यह पानी गिरता है वहाँ फ्लैश फ्लड आती है, जबकि कुछ किलोमीटर दूर सामान्य वर्षा हो सकती है।हाल के कई अध्ययनों में यह भी सामने आया है कि ग्लोबल वार्मिंग ऐसी घटनाओं को व्यापक रूप से बढ़ावा दे रही है। पृथ्वी के लगातार गर्म होने और समुद्र के तापमान में वृद्धि के कारण वातावरण में अधिक नमी बन रही है। यही नमी हिमालय तक पहुंचकर भारी वर्षा की संभावना बढ़ा देती है। विशेष बात यह है कि बादल फटने जैसी घटनाओं का लगभग कोई पूर्वानुमान नहीं लगाया जा सकता। मौसम विभाग के सामान्य रडार और वर्षामापी भी इन्हें पकड़ नहीं पाते, जिससे आबादी वाले क्षेत्रों में ये घटनाएँ जानलेवा बन जाती हैं।इसके अतिरिक्त, कई बड़े मामलों में यह भी देखा गया है कि मानसूनी नमी और पश्चिमी विक्षोभ जब एक साथ सक्रिय होते हैं, तो बहुत छोटे क्षेत्र में भी अत्यधिक तीव्र वर्षा और तूफानी परिस्थितियां उत्पन्न हो जाती हैं।read more:https://khabarentertainment.in/prof-dr-rajendra-rajput-receives-guru-shree-2026-award-at-national-level-brings-honour-to-ghazipur/बादल फटने की सबसे अधिक घटनाएं संकरी घाटियों में होती हैं, जहां हवा पर्वतों से टकराकर चक्रवाती रूप ले लेती है और चारों ओर से पर्वतों के बीच फंस जाती है। कई बार एक घंटे में 200 से 500 मिलीमीटर या उससे भी अधिक वर्षा हो जाती है। केदारनाथ आपदा के समय भी अत्यधिक वर्षा हुई थी और अनेक स्थानों पर बादल फटे थे। पिछले डेढ़ दशक में ऐसी घटनाओं की संख्या लगातार बढ़ी है। यह ग्लोबल वार्मिंग का एक गंभीर प्रभाव है। इसके अलावा हिमालय की पारिस्थितिकी (इकोसिस्टम) को भी अन्य कारणों से भारी क्षति पहुंची है।विशेषज्ञों के अनुसार, जंगलों की अंधाधुंध कटाई, पर्वतों की खुदाई, बिना योजना के निर्माण कार्य तथा नदी किनारों पर बढ़ती बसावट भी बादल फटने की घटनाओं को अधिक विनाशकारी बना रही है। उनका कहना है कि यही कारण है कि ऐसी घटनाओं से होने वाला नुकसान लगातार बढ़ता जा रहा है।विशेष रूप से कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड जैसे राज्यों में ऊंचे पर्वत और गहरी घाटियां होने के कारण अधिक सतर्कता की आवश्यकता है, लेकिन पर्याप्त सावधानी नहीं बरती जा रही है। मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार, बादल फटने से प्रत्यक्ष नुकसान नहीं होता, बल्कि उससे होने वाली अत्यधिक वर्षा फ्लैश फ्लड का कारण बनती है। संकरी नदियों और नालों में वर्षा का पानी तथा मलबा बहुत तेज़ी से नीचे की ओर बहता है। भूस्खलन स्थिति को और गंभीर बना देता है। परिणामस्वरूप पानी का प्रवाह इतना तेज हो जाता है कि वह सड़कें और पुल तक बहा ले जाता है।दूसरी ओर, एक अन्य महत्वपूर्ण निष्कर्ष भी सामने आया है। विशेषज्ञों के अनुसार, हिमालय इस समय तीव्र परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है। वैश्विक तापवृद्धि (ग्लोबल वार्मिंग) का प्रभाव यहां भी गंभीर रूप से दिखाई दे रहा है। एक नए अध्ययन के अनुसार, हिमालय बहुत तेजी से गर्म हो रहा है। जम्मू-कश्मीर के कुछ हिस्सों में दो दशकों के भीतर तापमान लगभग एक डिग्री सेल्सियस बढ़ चुका है और सबसे अधिक तापमान वृद्धि ऊंचाई वाले क्षेत्रों में दर्ज की गई है।वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि जलवायु परिवर्तन के कारण हिमनद (ग्लेशियर) तेजी से पिघल रहे हैं। इससे नदियों का प्रवाह प्रभावित हो सकता है और हिमालय की नदियों पर निर्भर करोड़ों लोगों के सामने जल सुरक्षा का संकट उत्पन्न हो सकता है। इस अध्ययन में 1980 से 2024 के बीच मौसम केंद्रों के प्रेक्षणों और वायुमंडलीय आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। आईआईटी खड़गपुर के सेंटर फॉर ओशन, रिवर, एटमॉस्फियर एंड लैंड साइंस (CORAL) के शोधकर्ताओं ने पाया कि भद्रवाह, पहलगाम और गुलमर्ग जैसे पर्वतीय शहर जम्मू जैसे निचले क्षेत्रों की तुलना में कहीं अधिक तेजी से गर्म हो रहे हैं।शोधकर्ताओं ने ‘एलिवेशन-डिपेंडेंट वार्मिंग’ नामक विशेष घटना का उल्लेख किया है। इसका अर्थ है कि ऊंचाई वाले क्षेत्र अपने आसपास के निचले क्षेत्रों की तुलना में अधिक तेजी से गर्म हो रहे हैं। कुछ मध्यम ऊंचाई वाले केंद्रों पर प्रति दशक औसत तापमान में 0.3 डिग्री सेल्सियस तक वृद्धि दर्ज की गई। मानसून से पहले रात्रि के तापमान में प्रति दशक लगभग 0.6 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ोत्तरी देखी गई।रात्रि के तापमान का अधिक बढ़ना विशेष रूप से चिंताजनक है, क्योंकि इससे वह प्राकृतिक ठंडक कम हो जाती है, जो हिम और ग्लेशियरों को सुरक्षित रखने के लिए आवश्यक होती है।अध्ययन के अनुसार, बर्फ की परत सिकुड़ने से सूर्य के प्रकाश का परावर्तन (रिफ्लेक्शन) कम हो रहा है और भूमि अधिक गर्मी सोख रही है। इस प्रक्रिया को ‘स्नो-अल्बीडो फीडबैक’ कहा जाता है। इसके अलावा वातावरण में बढ़ती नमी भी सतह के निकट अधिक गर्मी रोक रही है, जिससे तापमान वृद्धि की गति और तेज हो रही है।हिमालय को अक्सर एशिया का ‘वॉटर टावर’ कहा जाता है। यहां से निकलने वाली प्रमुख नदियां उत्तर भारत और पड़ोसी देशों के करोड़ों लोगों का जीवन चलाती हैं। तेजी से बढ़ते तापमान के कारण ग्लेशियरों का सिकुड़ना और तेज हो सकता है। सर्दियों में बर्फबारी कम हो सकती है, नदियों का प्रवाह बदल सकता है तथा बाढ़, भूस्खलन और जल संकट का खतरा बढ़ सकता है।ये निष्कर्ष उन अनेक अध्ययनों की भी पुष्टि करते हैं, जिनमें बताया गया है कि हिंदूकुश-हिमालय क्षेत्र वैश्विक औसत की तुलना में कहीं अधिक तेजी से गर्म हो रहा है। इसके कारण दुनिया की सबसे संवेदनशील पारिस्थितिक प्रणालियों में से एक हिमालय पर लगातार दबाव बढ़ रहा है।वैज्ञानिकों ने जलवायु की कड़ी निगरानी तथा अनुकूलन (एडाप्टेशन) संबंधी उपायों पर विशेष बल दिया है। उनका कहना है कि पर्वतीय समुदायों को अभी से इन परिवर्तनों का सामना करने के लिए तैयार करना अनिवार्य हो गया है।विशेषज्ञों के अनुसार, वर्तमान समय में हिमालयी क्षेत्रों में जिस प्रकार सड़कें, होटल, मकान और अन्य आधारभूत सुविधाएं विकसित की जा रही हैं, उससे प्राकृतिक संसाधनों को व्यापक क्षति पहुंच रही है। मानव सुविधाओं के लिए प्राकृतिक संपदा का लगातार दोहन किया जा रहा है। पिछले दो दशकों में हिमालयी राज्यों की परिस्थितियों में आए बदलाव के कारण गर्मी, ठंड और वर्षा, तीनों का स्वरूप असामान्य होता जा रहा है। परिणामस्वरूप प्राकृतिक आपदाएं समय से पहले और अधिक विनाशकारी रूप में सामने आ रही हैं।

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