तरस नहीं, सम्मान चाहिए—बधिर होना मजबूरी नहीं, मेरी पहचान है

गाजियाबाद। स्वेता की प्रेरणादायी कहानी यह संदेश देती है कि शारीरिक चुनौती किसी व्यक्ति की क्षमता और आत्मविश्वास के सामने बाधा नहीं बन सकती। स्वयं बधिर होने के बावजूद स्वेता ने अपने जीवन की जिम्मेदारियों को पूरी मजबूती और आत्मविश्वास के साथ निभाया है। उनके पति और सास भी बधिर हैं, लेकिन परिवार ने कभी अपनी परिस्थितियों को कमजोरी नहीं बनने दिया।शादी के बाद जब उनकी बेटी छोटी थी, तब स्वेता के सामने मां के रूप में अनेक चुनौतियां आईं। बेटी के गिरने या रोने की आवाज सुनाई न देने के कारण उसकी सुरक्षा को लेकर उन्हें विशेष सावधानी बरतनी पड़ती थी। कई रातें उन्होंने जागकर बेटी की देखभाल में बिताईं। पति-पत्नी ने आपसी सहयोग से इस चुनौती का सामना किया और आज उनकी बेटी बड़ी हो चुकी है। परिवार आत्मविश्वास और सुकून के साथ अपना जीवन व्यतीत कर रहा है।स्वेता केवल परिवार की जिम्मेदारियां ही नहीं संभालतीं, बल्कि नौकरी और सामाजिक कार्यों में भी सक्रिय भूमिका निभा रही हैं। वह नव किरण एनजीओ, रोहिणी में विशेष बच्चों के साथ कार्य करती हैं। शुरुआत में लोगों को उनके साथ संवाद करने और उनकी बात समझने में कठिनाई होती थी।read more:https://pahaltoday.com/manveer-singh-arrested-near-nepal-border-sent-to-punjab-under-tight-security/कई बार उन्हें नजरअंदाज भी किया गया, लेकिन स्वेता ने हार नहीं मानी। धैर्य और निरंतर प्रयास से उन्होंने लोगों को अपनी बात समझाना सीखा और समाज में अपनी अलग पहचान बनाई।आज स्वेता प्रतिदिन साहिबाबाद से रोहिणी तक स्कूटी चलाकर अपने कार्यस्थल पर जाती हैं। घर, नौकरी और सामाजिक सेवा—तीनों जिम्मेदारियों को वह पूरी लगन और उत्साह के साथ निभा रही हैं। उन्हें नृत्य का भी शौक है और उनका मानना है कि जीवन की कठिन परिस्थितियों के बावजूद इसे पूरे उत्साह और सकारात्मक सोच के साथ जीना चाहिए।स्वेता कहती हैं, “लोग अक्सर सोचते हैं कि बधिर व्यक्ति कमजोर होते हैं, लेकिन मैंने खुद को मजबूत बनाया है। मुझे किसी की दया नहीं चाहिए, मुझे सम्मान चाहिए।”स्वेता का कहना है कि समाज के लोगों को सांकेतिक भाषा (Sign Language) सीखनी चाहिए, ताकि बधिरजन अपनी बात स्वतंत्र रूप से व्यक्त कर सकें और समाज में बराबरी के साथ अपनी प्रतिभा एवं क्षमताओं का प्रदर्शन कर सकें।स्वेता का मानना है कि प्रदेश सरकार द्वारा दिव्यांगजनों को आत्मनिर्भर एवं सम्मानजनक जीवन प्रदान करने की दिशा में किए जा रहे प्रयासों के साथ-साथ समाज में जागरूकता और अवसरों को भी निरंतर बढ़ावा मिलना चाहिए। उनका सपना है कि दिव्यांगजनों की पहचान उनकी कमी से नहीं, बल्कि उनकी क्षमता, प्रतिभा और उपलब्धियों से हो।स्वेता का जीवन समाज को एक मजबूत संदेश देता है कि “बधिर होना मजबूर होना नहीं है। यदि हौसला मजबूत हो तो कोई भी रुकावट इंसान को आगे बढ़ने से नहीं रोक सकती।”

*तरस नहीं, सम्मान चाहिए।
हम बधिर हैं, लेकिन बेचारी नहीं।*

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