नई दिल्ली। होर्मुज जलडमरूमध्य में भारतीय जहाज के पास हुई फायरिंग की घटना ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता बढ़ा दी है। हालांकि शुरुआती आशंकाओं के विपरीत, इसे भारत-ईरान संबंधों में गिरावट नहीं बल्कि ईरान के भीतर चल रहे सत्ता संघर्ष का परिणाम माना जा रहा है। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, यह ‘वॉर्निंग फायरिंग’ सीधे तौर पर ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची की कूटनीतिक नीति को चुनौती देने के रूप में देखी जा रही है। बताया जा रहा है कि देश की ताकतवर सैन्य इकाई इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स और विदेश मंत्रालय के बीच गंभीर मतभेद उभर आए हैं।read more:https://khabarentertainment.in/the-superintendent-of-police-took-the-salute-of-the-weekly-friday-parade-and-conducted-a-thorough-inspection-2/विशेषज्ञों का मानना है कि हालिया घटनाक्रम की जड़ें उस राजनीतिक अस्थिरता में हैं, जो कथित रूप से अली खामेनेई के बाद उत्पन्न सत्ता शून्य से जुड़ी बताई जा रही है। इस स्थिति ने देश के भीतर शक्ति संतुलन को कमजोर कर दिया है, जिससे अलग-अलग संस्थाएं अपने-अपने एजेंडे पर काम कर रही हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, आईआरजीसी प्रमुख अहमद वहिदी और उनकी टीम को यह आशंका है कि विदेश मंत्रालय पश्चिमी देशों के साथ बातचीत में नरम रुख अपना रहा है। खासकर परमाणु कार्यक्रम, मिसाइल सिस्टम और क्षेत्रीय संगठनों से जुड़े मुद्दों पर यह मतभेद और गहरा गया है। इसी कारण होर्मुज जैसे रणनीतिक क्षेत्र में सेना ने सख्त रुख अपनाते हुए अपने नियंत्रण का प्रदर्शन किया। इस बीच, इस्लामाबाद में चल रही अमेरिका-ईरान वार्ता भी इस आंतरिक संघर्ष से प्रभावित होती दिख रही है। दरअसल आईआरजीसी चाहता है कि उसका करीबी अधिकारी मोहम्मद-बाकर जोलगदर वार्ता टीम में शामिल हो, जबकि विदेश मंत्री अराघची ने इसका विरोध किया है। इससे बातचीत की प्रक्रिया जटिल हो गई है। इस पूरी स्थिति का असर न केवल भारत बल्कि वैश्विक समुद्री व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति पर भी पड़ सकता है। फिलहाल भारत-ईरान संबंध स्थिर बताए जा रहे हैं, लेकिन क्षेत्रीय अस्थिरता के चलते सतर्कता बढ़ा दी गई है।