डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा
स्टेशन के प्लेटफॉर्म नंबर चार पर सन्नाटा इतना गहरा था कि अगर कोई सिक्का गिरता, तो उसकी खनक से आधे शहर की नींद खुल जाती। पर यहाँ सिक्का नहीं, सिर्फ उम्मीदें गिर रही थीं—चुपचाप, बिना किसी शोर के। प्लेटफॉर्म की उस उखड़ी हुई बेंच पर, जिसकी लकड़ी अब याददाश्त खो चुकी थी, तीन लोग बैठे थे। एक वह जो पिछले दस साल से सरकारी परीक्षा के रिज़ल्ट का इंतज़ार कर रहा था, दूसरा वह जो रिटायरमेंट के बाद अपनी रुकी हुई पेंशन की फ़ाइल ढूँढ रहा था, और तीसरा मैं, जो बस यह देखने आया था कि इंतज़ार आखिर दिखता कैसा है। तभी एनाउंसमेंट हुआ, “यात्री गण कृपया ध्यान दें! गाड़ी संख्या 420, ‘अच्छे दिन एक्सप्रेस’ अपने निर्धारित समय से चौदह साल की देरी से चल रही है। असुविधा के लिए हमें खेद नहीं है, क्योंकि हमें आदत है।” रिटायरमेंट वाले बाबूजी ने अपनी धुंधली ऐनक साफ़ की और बोले, “बेटा, इस स्टेशन की सबसे बड़ी खूबी यही है। यहाँ ट्रेन आए न आए, घोषणाएँ बड़ी सुरीली होती हैं। सुनकर लगता है कि बस अगले ही पल सब ठीक हो जाएगा।”
मैंने पूछा, “तो आप घर क्यों नहीं जाते?”उन्होंने एक फीकी मुस्कान के साथ कहा, “घर जाकर क्या करूँगा? वहाँ बीवी पूछती है कि क्या लाए? यहाँ कम से कम यह भ्रम तो रहता है कि कुछ आने वाला है। भ्रम, बेटा, इस देश का सबसे बड़ा ऑक्सीजन सिलिंडर है।”तभी स्टेशन मास्टर की मेज पर पड़ा लाल झंडा हरे झंडे से फुसफुसाया, “भाई, तू थक नहीं जाता? दिन भर लहराता रहता है, जैसे सच में कोई क्रांति आने वाली हो।”हरा झंडा थोड़ा और तनकर लहराया और बोला, “मेरा काम क्रांति लाना नहीं, झुनझुना बजाना है। जब तक मैं हिलता रहूँगा, तब तक यह भीड़ शांत रहेगी। जिस दिन मैं स्थिर हो गया, उस दिन ये लोग इंजन ढूँढने लगेंगे। और इंजन तो कब का कबाड़ में बिक चुका है।”प्लेटफॉर्म के आखिरी छोर पर एक चाय वाला कोयले की राख से अपना हाथ पोंछ रहा था। उसकी केतली खाली थी, पर आग जल रही थी। मैंने पास जाकर पूछा, “चाय मिलेगी?”read more:https://pahaltoday.com/debate-erupts-over-traffic-jams-in-the-city-encroachment-not-e-rickshaws-is-the-real-reason/
उसने बिना ऊपर देखे कहा, “चाय तो खत्म हो गई साहब, बस भाप बची है। पीनी है तो बताइए, आजकल शहर में भाप की ही सबसे ज्यादा मांग है। कोई आश्वासन की भाप पी रहा है, कोई विकास की।”
अचानक दूर से एक लाइट चमकी। भीड़ में थोड़ी हलचल हुई। लोग अपने झोले उठाकर खड़े हो गए। धूल उड़ी, शोर बढ़ा, और एक बहुत बड़ा लोहे का ढांचा तेज़ी से प्लेटफॉर्म को चीरता हुआ निकल गया। वह ट्रेन नहीं थी, सिर्फ एक खाली मालगाड़ी थी जिस पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था—कल ने कल से कहा तुम्हारा कल, कल की तरह होगा’। भीड़ फिर से बेंचों पर बैठ गई। धूल जम गई। पेंशन वाले बाबूजी ने अपनी लाठी उठाई और चलने लगे। मैंने पूछा, “अब कहाँ?” उन्होंने जवाब दिया, “अगले स्टेशन। सुना है वहाँ की घोषणाएँ और भी मधुर हैं। कम से कम मरते दम तक संगीत तो अच्छा मिलता रहे।”मैं वहीं खड़ा रहा। स्टेशन की घड़ी की सुइयाँ अब भी वहीं थीं जहाँ मैं आया था। ऐसा लगा मानो समय चल नहीं रहा, बस अपनी जगह पर कदमताल कर रहा है ताकि हमें लगे कि हम कहीं पहुँच रहे हैं।