राष्ट्रीय जाति जनगणना भारत के लिए आवश्यक

इस समय सरकार द्वारा की जा रही जनगणना ज्वलंत मुद्दा है। 2011 के बाद 2026 में जनगणना कराई जा रही है । भारत में जनगणना 1951 से प्रति दस वर्ष बाद की जाती है। 2021 में कोविड की भीषण बीमारी के कारण जनगणना नहीं कराई जा सकी । फिर सरकार इसे टालती रही जब विपक्ष ने जातिगत जनगणना कराए जाने की जोरदार मांग की तब 2026 में सरकार ने राष्ट्रीय स्तर पर जनगणना का कार्य प्रारंभ किया। जनगणना किसी भी देश के लिए आवश्यक है। भारत में देश के विकास , सही नीतियों के निर्धारण और संसाधनों के न्याय संगत वितरण के लिए जनगणना ज़रूरी है। इससे सरकार को जानने में यह मदद मिलती है कि देश की कुल कितनी आबादी है, कितने पुरुष, महिला, बच्चे जिसमे बूढ़े, नौजवान एवं लड़के लड़किया हैं। वह किन क्षेत्रों में रहते हैं , राज्यवार राज्यों में कितनी आबादी है , वहाँ शिक्षा, चिकित्सा, रोज़गार और बेरोजगारी की क्या स्थित है इन सबकी जानकारी जनगणना द्वारा होती है। जनसंख्या के आधार पर ही लोकसभा , विधानसभा और स्थानीय निकायों के क्षेत्र भी निर्धारित किए जाते हैं। इस वर्ष की जनगणना ने जातियों को लेकर एक अजीब प्रकार की बहस छेड़ दी है। भारत में जातियां इस देश की विशेषता थीं लेकिन ऐसा लगता है कि अब यही जातियां सरकार के लिए समस्या हो गई हैं।कांग्रेस अध्यक्ष एवं राज्य सभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे और लोक सभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने जनगणना करने के सरकार के ओपन एजेंडा के सवालों पर आपत्ति की है। उन्होंने इस तरीके को भ्रामक बताया और कहा कि इसमें एक ही जाति के अलग अलग उपनामों से आंकड़े बिखर सकते हैं और ओ बी सी को नुकसान होगा। उन्होंने बिहार और तेलंगाना माडल अपनाने की बात कही है। इन राज्यों ने अपने स्तर पर जनगणना कराई है । उन्होंने सभी जातियों को एक कोड दिया है जिससे एक जाति की सभी उपजातियाँ उस कोड में सम्मिलित हो जायेंगी। ऐसा नहीं है कि भारत में जनगणना 1951 से शुरू हुई है। सबसे पहले भारत में जनगणना 1865 में में ब्रिटिश शासन में शुरू हुई और समय समय पर 1931 तक हुई थी। 1931 में पहली बार राष्ट्रीय स्तर पर सभी जातियों की जनगणना हुई थी। इसमें 4147 जातियां और उपजातियाँ बताई गई थीं। उसके बाद जनगणना 1941 में हुई लेकिन द्वितीय विश्व युद्ध के कारण जनगणना का कार्य पूरा नहीं हो सका जिस कारण यह प्रदर्शित नहीं की गई। फिर उसके बाद 1951 में जनगणना हुई जिसमे एस सी एस टी की जन संख्या को भी गिना गया जो लगभग 17% थी। इसी बीच सरकार को लगा कि कुछ और पिछड़ी जातियां रह गई हैं जिनको विशेष सुविधा दिया जाना आवश्यक है इसलिए नेहरू सरकार ने 1953 में काका कालेलकर आयोग का गठन किया जो ओ बी सी के बारे में रिपोर्ट दे वॉरगी। काका कालेलकर ने जो रिपोर्ट दी उसने पहली बार राष्ट्रीय स्तर पर 2399 पिछड़ी जातियों का उल्लेख किया और उसके हिसाब से 70% आरक्षण की बात कही लेकिन काका कालेलकर ने अपनी रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया कि इससे भीषण सामाजिक विषमता पैदा हो सकती है।read more:https://pahaltoday.com/demand-to-remove-government-country-liquor-shop-villagers-stage-protest-at-the-collectorate/#google_vignetteतत्कालीन सरकार ने इसे दो कारणों से अस्वीकार कर दिया । एक तो जो जाति निर्धारित करने की नीति आयोग ने अपनाई थी उसमे कई त्रुटियां पाई गईं और दूसरा इससे समाज में एक बिखराव हो सकता था।इसके बाद 1961, 1971, 1981, 1991, 2001 और 2011 में जनगणना हुई लेकिन किसी भी जनगणना में जातीय आंकड़े नहीं दिए गए। इसी बीच 1979 में मोरारजी देसाई की सरकार ने मंडल कमीशन का गठन किया जिसने ओ बी सी को 27 प्रतिशत के आरक्षण की सिफारिश की लेकिन उसे किसी भी सरकार ने लागू नहीं किया। 1990 में विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार ने आनन फानन में इसे लागू कर दिया जिसका ख़ामियाज़ा देश को भुगतना पड़ा था। जातीय समस्या के साथ राहुल गांधी ने महिलाओं की समस्याओं को भी उठा लिया है। पुणे में छात्राओं की गूंज कार्यक्रम में छात्राओं का रैला लग गया था जिसमें सभी धर्मों और जातियों की छात्राओं और युवा महिलाओं ने हिस्सा लिया। सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि सभी धर्मो और जातियों की महिलाओं की एक ही समस्या थी कि उन्हें उनके परिवार में लड़कों से कम आंका जाता है। उनकी समस्याओं को सुनने के बाद राहुल गांधी ने तब यह कहा था कि मनु स्मृति की सोच से उनको बाहर निकलना पड़ेगा कि लड़कियां पिता, पति और पुत्र के सहारे ही रहती हैं । उनका दर्जा किसी भी सूरत में लड़कों से कम नहीं है।इसी को लेकर भाजपा राहुल गांधी पर आक्रामक हो गई कि उन्होंने मनु स्मृति की आलोचना की है। मैं यहाँ यह बताना चाहूँगा कि हिंदू धर्म की यही विशेषता है कि उसने समय समय पर सुधार किया है। हमारा सबसे पुराना ग्रंथ वेद माना जाता है । प्राचीन काल में विद्वान ब्राह्मणों ने अथर्व वेद को मानने में पहले आना कानी किया था क्युकी उसमे तांत्रिक विद्या होती है लेकिन समय के साथ साथ विचारों में बदलाव हुआ और बाद में इसे पूरी मान्यता मिली। सती प्रथा का विरोध कर उसे रुकवाया गया।पहले कोई भी पुरुष विदेश जाता था तो उसे जाति से निष्कासित कर दिया जाता था लेकिन लोगों ने उसमें सुधार किया और विदेशों में जाकर पढ़ाई कर आज बड़ी बड़ी कंपनियों में हमारे भारतीय सी ई ओ बने हुए हैं और भारत का नाम विश्व में रोशन कर रहे हैं। इसलिए हिंदू धर्म की यही विशेषता रही है कि हम अपने धर्म में सदैव सुधार करने के लिए प्रति बद्ध रहते हैं। आज महिलाओं को पुरुषों की बराबरी का यदि अधिकार दिलाने की बात राहुल गांधी कर रहे हैं तो वह महिलाओं के पिछड़े पन के सुधार की पहल है न की धर्म विशेष की आलोचना । राहुल गांधी जब दलित, पिछड़ा , महिला और अल्प संख्यक वर्ग के सुधार और उन्हें सशक्त करने की बात करते हैं तो उसका यह कदापि अर्थ नहीं लगाना चाहिए कि वह सवर्णों के विरुद्ध हैं । कांग्रेस देश के सभी वर्गों को साथ लेकर चलने वाली पार्टी है और सदैव सवर्ण नेताओं ने ही समाज के कमजोर तबके को आगे बढ़ाने का काम किया है। राहुल गांधी भी वही कर रहे हैं इसीलिए वह दलित, पिछड़ा और महिलाओं के साथ ग़रीब वर्ग के सवर्णों के दस प्रतिशत आरक्षण को लेकर भी उतने ही गंभीर हैं। केंद्रीय मंत्री जे पी नड्डा ने आरक्षण विरोधी नेताओं से मुलाक़ात की जिनका ज़ोर आरक्षण समाप्त किए जाने का है। इसलिए कांग्रेस के नेताओं को इसे अगड़ा और पिछड़ा की लड़ाई बनाने की चाल का करारा जवाब देना चाहिए।

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