88 वर्षों की ऐतिहासिक विरासत के साथ साक्षरता से सशक्तिकरण की ओर बढ़ता भारतीय प्रौढ़ शिक्षा संघ

नई दिल्ली।वर्ष 1938 से भारत में प्रौढ़ शिक्षा और साक्षरता की अलख जगाने वाला भारतीय प्रौढ़ शिक्षा संघ वर्ष 2026 में अपनी 88 वर्षों की गौरवशाली यात्रा पूरी कर चुका है। 17वीं, इंद्रप्रस्थ एस्टेट, नई दिल्ली स्थित अपने ऐतिहासिक मुख्यालय से संचालित यह संस्था केवल एक संगठन नहीं, बल्कि भारत में प्रौढ़ शिक्षा के विकास, विस्तार और संस्थागत स्वरूप की महत्वपूर्ण आधारशिला रही है पूर्व राष्ट्रपति डॉ. जाकिर हुसैन ने भी संघ के ऐतिहासिक महत्व को रेखांकित करते हुए कहा था कि भारतीय प्रौढ़ शिक्षा संघ का इतिहास वास्तव में भारत में प्रौढ़ शिक्षा के इतिहास से जुड़ा हुआ है। भारतीय प्रौढ़ शिक्षा आंदोलन की वैचारिक पृष्ठभूमि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आयोजित प्रथम विश्व प्रौढ़ शिक्षा सम्मेलन से जुड़ती है, जो वर्ष 1929 में कैम्ब्रिज, लंदन में विश्व प्रौढ़ शिक्षा संघ द्वारा आयोजित किया गया था। इसी वैश्विक विचारधारा से प्रेरणा लेते हुए भारत में दिल्ली साक्षरता समिति ने वर्ष 1937 से प्रौढ़ शिक्षा के क्षेत्र में सक्रिय प्रयास शुरू किए और 11 मार्च 1938 को दिल्ली विश्वविद्यालय के ऐतिहासिक वाइसरॉय लॉज में प्रथम अखिल भारतीय प्रौढ़ शिक्षा सम्मेलन आयोजित किया गया। इस सम्मेलन ने भारत में प्रौढ़ शिक्षा के संगठित और राष्ट्रव्यापी आंदोलन को नई दिशा प्रदान की। इसके बाद 1 और 2 दिसंबर 1939 को बिहार के भागलपुर में दूसरा सम्मेलन आयोजित किया गया, जहां 11 मार्च 1938 के दिल्ली सम्मेलन के प्रस्ताव को सर्वसम्मति से स्वीकार किया गया और 2 दिसंबर 1939 को भारतीय प्रौढ़ शिक्षा संघ की औपचारिक स्थापना हुई। स्थापना के बाद संस्था को देशभर में प्रौढ़ शिक्षा के कार्यों को गति देने के लिए संस्थागत सहयोग प्राप्त हुआ और नई दिल्ली के इंद्रप्रस्थ एस्टेट में संघ का ऐतिहासिक केंद्र विकसित हुआ। 2 दिसंबर 1939 से लेकर वर्ष 2026 तक की अपनी लंबी और निरंतर यात्रा में भारतीय प्रौढ़ शिक्षा संघ ने राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय, क्षेत्रीय तथा राज्य स्तर पर अनेक संगोष्ठियां, शोध कार्यशालाएं, प्रशिक्षण कार्यक्रम और जागरूकता अभियान आयोजित किए है शिक्षा और साक्षरता के क्षेत्र में शैक्षणिक विमर्श को मजबूत करने के लिए संस्था द्वारा त्रैमासिक समाचार-पत्रिका, विस्तृत वार्षिक प्रतिवेदन, प्रतिष्ठित ‘भारतीय प्रौढ़ शिक्षा पत्रिका’ तथा हिंदी में ‘प्रौढ़ शिक्षा’ पत्रिका का नियमित प्रकाशन किया जाता रहा है, जिसके माध्यम से शोधकर्ताओं, शिक्षाविदों, नीति-निर्माताओं और जमीनी स्तर पर कार्य करने वाले लोगों तक प्रौढ़ शिक्षा से जुड़े विचार और अनुभव पहुंचते रहे है। वर्तमान समय में यह ऐतिहासिक संस्था अनुभवी नेतृत्व, आधुनिक दृष्टिकोण और नई कार्ययोजनाओं के साथ आगे बढ़ रही है। गांधीयन ग्रामीण संस्थान के पूर्व अधिष्ठाता एवं प्रसिद्ध शिक्षाविद प्रो. एल. राजा संघ के अध्यक्ष के रूप में संस्था को दिशा प्रदान कर रहे है, जबकि वरिष्ठ प्रौढ़ शिक्षाविद एवं सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता सुरेश खंडेलवाल महासचिव के रूप में प्रशासनिक गतिविधियों का संचालन कर रहे है। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की समृद्ध शैक्षणिक पृष्ठभूमि वाले प्रो. एस.वाई. शाह संरक्षक के रूप में संस्था को मार्गदर्शन प्रदान कर रहे है वहीं दिल्ली विश्वविद्यालय के वरिष्ठ प्रो. राजेश मार्च 2025 से निदेशक प्रभारी एवं कोषाध्यक्ष के रूप में संस्था के प्रशासनिक और वित्तीय प्रबंधन को दिशा दे रहे है। संस्था ने अपने पूर्व अध्यक्ष स्वर्गीय श्री के.सी. चौधरी की स्मृति और शिक्षा के क्षेत्र में उनके योगदान को सम्मानित करने के लिए ‘जीवनपर्यंत उपलब्धि सम्मान’ की भी शुरुआत की है बदलते समय और समाज की नई आवश्यकताओं को देखते हुए भारतीय प्रौढ़ शिक्षा संघ ने प्रौढ़ शिक्षा की अपनी परंपरागत अवधारणा को व्यापक बनाते हुए।read more:https://pahaltoday.com/ballia-police-receive-two-modern-interceptor-bikes-sp-omvir-singh-flags-them-off/अब साक्षरता से आगे बढ़कर कौशल विकास, स्वास्थ्य जागरूकता, सतत शिक्षा और आजीवन सीखने को अपने कार्यक्षेत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया है। भारत सरकार द्वारा वर्ष 2022 से 2027 तक संचालित ‘नव भारत साक्षरता कार्यक्रम’ उल्लास का उद्देश्य समाज में सभी के लिए आजीवन अधिगम की अवधारणा को मजबूत करना है। जिसके अनुसार देश के 9 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने 100 प्रतिशत पूर्ण साक्षरता की उपलब्धि हासिल की है, जो देश की साक्षरता यात्रा में एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। अब आवश्यकता इस बात की है कि साक्षरता को केवल पढ़ने-लिखने की क्षमता तक सीमित न रखकर उसे व्यक्ति के कौशल, स्वास्थ्य, रोजगार, सामाजिक जागरूकता और निरंतर सीखने की क्षमता से जोड़ा जाए। इसी व्यापक सोच के साथ भारतीय प्रौढ़ शिक्षा संघ संस्थागत और सामुदायिक स्तर पर कौशल उन्नयन, स्वास्थ्य जागरूकता तथा सतत शिक्षा के नए अवसरों को बढ़ावा देने की दिशा में कार्य कर रहा है। दिल्ली विश्वविद्यालय के साथ ‘विद्या विस्तार-द्वितीय’ जैसी पहल इसी प्रयास का उदाहरण है, जिसके माध्यम से शैक्षणिक संस्थानों और समाज के बीच ज्ञान का सेतु मजबूत करने की दिशा में काम किया जा रहा है आने वाले समय में संघ की सबसे महत्वपूर्ण प्राथमिकताओं में देश की युवा शक्ति को आजीवन सीखने के आंदोलन से जोड़ना शामिल है। इसी दूरदर्शी सोच के तहत राष्ट्रीय स्तर पर ‘भारतीय प्रौढ़ शिक्षा संघ युवा राजदूत आजीवन अधिगम’ पहल शुरू करने की परिकल्पना की गई है, जिसके माध्यम से युवाओं को साक्षरता, कौशल विकास, सामुदायिक जागरूकता और आजीवन सीखने की प्रक्रिया में नेतृत्वकारी भूमिका प्रदान की जाएगी। इस पहल का मूल विचार यह है कि युवा केवल शिक्षा प्राप्त करने वाले वर्ग के रूप में नहीं, बल्कि समाज में ज्ञान और सीखने की संस्कृति को आगे बढ़ाने वाले परिवर्तनकारी दूत बनें। इस प्रकार भारतीय प्रौढ़ शिक्षा संघ की 88 वर्षों की यात्रा साक्षरता के प्रारंभिक प्रयासों से लेकर आजीवन सीखने, कौशल विकास, स्वास्थ्य जागरूकता और युवा नेतृत्व तक के व्यापक परिवर्तन की कहानी प्रस्तुत करती है आने वाले समय में ‘उल्लास’ जैसे राष्ट्रीय अभियानों, विश्वविद्यालयों की शैक्षणिक विशेषज्ञता, सामुदायिक सहभागिता और युवा शक्ति के समन्वय से भारतीय प्रौढ़ शिक्षा संघ भारत में एक ऐसे ज्ञान-आधारित समाज के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है, जहां शिक्षा किसी निश्चित उम्र या समय तक सीमित न रहकर जीवनभर चलने वाली प्रक्रिया बने। 88 वर्षों की यह गौरवशाली विरासत अब एक नए संकल्प के साथ आगे बढ़ रही है—साक्षरता को अवसर से जोड़ना, अवसर को कौशल से जोड़ना और कौशल को सशक्तिकरण में बदलना।

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