देशभर में कुकुरमुत्ते की तरह फैल रहा नकली और मिलावटी दवाओं का अवैध कारोबार अब महज़ एक सामान्य आर्थिक या संगठित अपराध नहीं रह गया है। यह सीधे तौर पर भारतीय नागरिकों के बुनियादी संवैधानिक अधिकारों, विशेषकर जीवन के अधिकार पर सबसे क्रूर और अमानवीय प्रहार बन चुका है। बीमारियाँ जब इंसान को घेरती हैं, तो वह पूर्ण समर्पण और अटूट विश्वास के साथ अपनी गाढ़ी कमाई लेकर मेडिकल स्टोर की तरफ दौड़ता है। उसे यह भ्रम होता है कि डॉक्टर के पर्चे पर लिखी गोलियां या इंजेक्शन उसके या उसके प्रियजनों के जीवन की रक्षा करेंगे। परंतु, मुनाफे की अंधी हवस में डूबे सफेदपोश अपराधियों ने आज उस पवित्र भरोसे को मौत के जाल में तब्दील कर दिया है। हाल ही में देश के विभिन्न हिस्सों और विशेष रूप से हरियाणा में सामने आए डरावने मामलों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि दवाओं की जालसाजी का यह मकड़जाल हमारी संपूर्ण चिकित्सा और प्रशासनिक व्यवस्था की जड़ों को भीतर ही भीतर पूरी तरह खोखला कर चुका है।हरियाणा के औद्योगिक और आधुनिक केंद्र गुरुग्राम से लेकर सुदूर ग्रामीण अंचलों तक खाद्य एवं औषधि प्रशासन द्वारा किए गए हालिया खुलासे किसी भी संवेदनशील समाज की रूह को कंपा देने के लिए पर्याप्त हैं। गुरुग्राम में उच्च रक्तचाप जैसी आम लेकिन बेहद संवेदनशील बीमारी के इलाज के लिए बड़े पैमाने पर उपयोग की जाने वाली दवा ‘टेल्मा-एएम’ की भारी मात्रा में नकली खेप का पकड़ा जाना इस बात का साक्ष्य है कि रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़ी दवाएं भी अब सुरक्षित नहीं हैं। इसके साथ ही, मधुमेह और वजन नियंत्रित करने वाले करीब 70 लाख रुपये के नकली ‘मौनजारो’ इंजेक्शनों के अंतरराष्ट्रीय और अंतरराज्यीय सिंडिकेट का भंडाफोड़ होने से हड़कंप मच गया है। जांच एजेंसियों ने जब इस काले साम्राज्य के धागे टटोले, तो परत-दर-परत जो हकीकत सामने आई, वह व्यवस्था को आईना दिखाने वाली है। इन नकली दवाओं के निर्माण की कड़ियाँ उत्तराखंड के रुड़की में चल रही अवैध और बिना लाइसेंस वाली फैक्ट्रियों से जुड़ी थीं। वहां से यह जानलेवा माल उत्तर प्रदेश के रास्ते दिल्ली के थोक बाजारों में पहुंचता था और बिना किसी जांच-परख या बाधा के हरियाणा के प्रतिष्ठित मेडिकल स्टोरों और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के केमिस्ट काउंटरों पर धड़ल्ले से बेचा जा रहा था।इस भयावहता की पराकाष्ठा केवल रक्तचाप या मधुमेह की दवाओं तक सीमित नहीं है। इसी के समानांतर दिल्ली-एनसीआर, हरियाणा और मुंबई तक फैले कैंसर जैसी जानलेवा बीमारियों की नकली दवाओं के अंतरराज्यीय रैकेट की हालिया गिरफ्तारियों ने इंसानियत को पूरी तरह शर्मसार कर दिया है। इस सिंडिकेट के अपराधियों द्वारा उन लाचार और अंतिम सांसें गिन रहे कैंसर मरीजों को निशाना बनाया जा रहा था, जिनके परिवार अपनी संपत्ति और गहने बेचकर लाखों रुपये के जीवनरक्षक इंजेक्शन खरीदते हैं। उन इंजेक्शनों में जीवनदायिनी औषधियों के स्थान पर केवल डिस्टिल्ड वॉटर, उबला पानी या ग्लूकोज का घोल भरकर बेचा जा रहा था। जब कोई मरीज ऐसी नकली कीमोथेरेपी दवाओं का सेवन करता है, तो दवा के बेअसर रहने से उसका रोग अनियंत्रित गति से बढ़ता है और अंततः उसकी असामयिक व तड़प-तड़प कर मौत हो जाती है। यह किसी भी लिहाज से केवल धोखाधड़ी का मामला नहीं, बल्कि ठंडे दिमाग से की गई सामूहिक और संस्थागत हत्या है। इस जघन्य कृत्य में शामिल अपराधियों को हत्यारों की श्रेणी में ही रखा जाना चाहिए।आखिर ऐसा क्या है कि तमाम दावों और छापों के बावजूद यह धंधा देश भर में फल-फूल रहा है? इस गंभीर संकट के पीछे सबसे बड़ी वजह राज्यों की सीमाओं से परे फैला ‘मल्टी-स्टेट सप्लाई चैन’ का जटिल और पारदर्शी विहीन होना है। इसके साथ ही देश के दवा नियामक तंत्र की सुस्ती और भ्रष्टाचार भी इसके लिए बराबर के जिम्मेदार हैं। अपराधी बड़ी ही चतुराई से एक राज्य के दूरदराज या अनधिकृत इलाके में नकली विनिर्माण इकाई स्थापित करते हैं। वहां से दवाओं को दूसरे राज्य के बोगस या नकली बिलों के जरिए कागजी तौर पर वैध रूप दे दिया जाता है।read more:https://pahaltoday.com/manveer-singh-arrested-near-nepal-border-sent-to-punjab-under-tight-security/इसके बाद, तीसरे राज्य के थोक और खुदरा बाजारों में उन्हें भारी डिस्काउंट या लालच देकर खपा दिया जाता है। हरियाणा के मामले में भी यही देखा गया कि खुदरा दवा विक्रेता कंपनियों द्वारा तय एमआरपी पर भारी छूट का लालच पाकर बिना किसी वैध सोर्स या इनवॉइस की जांच किए इन दवाओं को खरीद लेते थे और मरीजों को पूरे दाम पर बेचते थे। यह सीधे तौर पर नियामक एजेंसियों की नाक के नीचे होने वाली आपराधिक लापरवाही है। देश में ड्रग्स इंस्पेक्टरों की भारी कमी और उपलब्ध अमले की कार्यप्रणाली पर उठते सवाल इस समस्या को और अधिक जटिल बना देते हैं।इस महामारी नुमा संकट से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए अब केवल पारंपरिक छापों, सीमित मात्रा में जब्ती और कागजी कानूनी औपचारिकता से काम नहीं चलने वाला है। यद्यपि हरियाणा सरकार और वहां के एफडीए द्वारा हाल ही में की गई 16 गिरफ्तारियां और कड़े कदम एक सराहनीय शुरुआत हैं, लेकिन विशालकाय अवैध साम्राज्य को देखते हुए यह महज ‘आइसबर्ग की नोक’ यानी समुद्र में तैरती बर्फ का एक छोटा सा सिरा मात्र है। इस सिंडिकेट को जड़ से उखाड़ने के लिए केंद्र और सभी राज्य सरकारों को दलगत राजनीति और क्षेत्रीय सीमाओं से ऊपर उठकर एक ठोस राष्ट्रीय नीति के तहत युद्ध स्तर पर काम करना होगा। इसके लिए सबसे पहले पूरी दवा आपूर्ति श्रृंखला में ‘ट्रैकिंग और ट्रेसिंग’ को अभेद्य बनाना अनिवार्य है। देश के भीतर निर्मित या बिकने वाली हर छोटी-बड़ी दवा की पट्टी या शीशी पर एक ऐसा यूनीक, फुल-प्रूफ और अनिवार्य क्यूआर कोड या बारकोड ट्रैकिंग सिस्टम लागू होना चाहिए जो सीधे केंद्रीय डेटाबेस से जुड़ा हो। इसके माध्यम से कोई भी साधारण नागरिक अपने स्मार्टफोन से स्कैन करके तुरंत यह जान सके कि दवा असली है या नकली, उसे किस फैक्ट्री में बनाया गया है और उसका वैध बैच नंबर क्या है। तकनीक का यह लोकतांत्रीकरण ही पारदर्शिता की सबसे बड़ी गारंटी बन सकता है।इसके साथ ही, हमारे देश के पुराने पड़ चुके कानूनी ढांचे में आमूलचूल बदलाव की महती आवश्यकता है। वर्तमान में ‘औषधि एवं प्रसाधन सामग्री अधिनियम’ के तहत मुकदमेबाजी के वर्षों तक खिंचने के कारण अपराधी आसानी से जमानत पाकर दोबारा उसी अवैध धंधे में लिप्त हो जाते हैं। समय आ गया है कि दवाओं के इस काले कारोबार को आतंकवाद के समकक्ष गंभीर अपराध माना जाए। इसके लिए देश भर में विशेष ‘फास्ट-ट्रैक कोर्ट’ का गठन हो, जहां छह महीने के भीतर मुकदमों का फैसला सुनिश्चित किया जा सके। नकली दवाओं के निर्माण, भंडारण और वितरण में शामिल मास्टरमाइंड से लेकर केमिस्ट तक, पूरे नेटवर्क के दोषियों के लिए बिना किसी रियायत के उम्रकैद या मृत्युदंड जैसी कठोरतम सजा का कानूनी प्रावधान होना चाहिए। साथ ही, उनकी अवैध रूप से अर्जित की गई चल-अचल संपत्तियों को तुरंत कुर्क कर उससे पीड़ितों या उनके परिवारों को मुआवजा देने की व्यवस्था की जानी चाहिए।दवा विक्रेताओं की जवाबदेही तय किए बिना इस लड़ाई को जीतना असंभव है। हर छोटे-बड़े केमिस्ट और हॉस्पिटल के लिए यह कानूनी रूप से अनिवार्य होना चाहिए कि वे केवल पंजीकृत और प्रमाणित थोक विक्रेताओं से ही दवाएं खरीदें और उनका पूरा पक्का इनवॉइस रिकॉर्ड बनाए रखें। जो भी मेडिकल स्टोर बिना वैध दस्तावेजों या भारी डिस्काउंट के लालच में आकर संदिग्ध स्रोतों से दवाएं खरीदता पाया जाए, उसका लाइसेंस तुरंत और स्थायी रूप से निरस्त कर दिया जाना चाहिए। इसके अलावा, उपभोक्ताओं में भी जागरूकता का प्रसार करना होगा कि वे हमेशा पक्का बिल लेने की आदत डालें और दवा की सील या पैकेजिंग में किसी भी प्रकार की विसंगति दिखने पर तुरंत स्थानीय औषधि निरीक्षक को सूचित करें। दवाएं इंसान को नया जीवन देने और पीड़ा को हरने के लिए खोजी गई थीं, उन्हें चंद सिक्कों की खातिर किसी की मौत का जरिया नहीं बनने दिया जा सकता। यदि समय रहते इस राष्ट्रीय संकट पर पूरी कठोरता और ईमानदारी से काबू नहीं पाया गया, तो देश की संपूर्ण चिकित्सा और लोकतांत्रिक व्यवस्था से आम जनता का भरोसा हमेशा के लिए उठ जाएगा।