दिव्यांगता नहीं बनी बाधा, मेहनत और आत्मविश्वास से रितु गुप्ता ने बनाई अलग पहचान

गाजियाबाद। इंदिरापुरम निवासी 45 वर्षीय *रितु गुप्ता* संघर्ष, आत्मविश्वास और सफलता की प्रेरणादायक मिसाल हैं। दाहिने पैर में पोलियो होने के बावजूद उन्होंने कभी अपनी दिव्यांगता को अपने सपनों के रास्ते में बाधा नहीं बनने दिया। आज वह दिल्ली सरकार के विद्यालय में शिक्षिका के रूप में कार्यरत हैं और शिक्षा के क्षेत्र में लगभग *25 वर्षों का अनुभव* रखती हैं।रितु का जीवन केवल शिक्षण कार्य तक सीमित नहीं है। उन्हें कविता लिखने, किताबें पढ़ने और संगीत का भी शौक है। इसके साथ ही वह जरूरतमंद लोगों की मदद करने के लिए हमेशा तत्पर रहती हैं। उनका मानना है कि समाज के लिए कुछ अच्छा करना ही जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक है।अपने कार्य, प्रतिभा और लगन के बल पर रितु ने *शिक्षा, पर्यावरण एवं फैशन शो* सहित विभिन्न क्षेत्रों में अनेक पुरस्कार प्राप्त किए हैं। उनकी उपलब्धियां यह साबित करती हैं कि किसी व्यक्ति की पहचान उसकी दिव्यांगता से नहीं, बल्कि उसकी *प्रतिभा, मेहनत और आत्मविश्वास* से होती है।रितु के जीवन में महत्वपूर्ण पड़ाव उस समय आया, जब *नीव शक्ति संस्था* ने उनकी प्रतिभा और उपलब्धियों को समाज के सामने लाने के लिए उन्हें मंच प्रदान किया। *08 मार्च 2026* को उन्हें *“दिव्य नारी पुरस्कार”* से सम्मानित किया गया। यह सम्मान उनके लिए केवल एक पुरस्कार नहीं, बल्कि वर्षों के संघर्ष, मेहनत और उपलब्धियों की पहचान था।रितु गुप्ता कहती हैं, “नीव शक्ति संस्था ने मुझे अपनी पहचान और अपनी उपलब्धियों को समाज के सामने रखने का मंच दिया।read more:https://pahaltoday.com/manveer-singh-arrested-near-nepal-border-sent-to-punjab-under-tight-security/इस सम्मान ने मेरा आत्मविश्वास और बढ़ाया है। मैं गाजियाबाद जिला प्रशासन और नीव शक्ति संस्था की हृदय से आभारी हूं।”वह दिव्यांगजनों के कल्याण एवं उन्हें समाज की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए किए जा रहे सरकारी प्रयासों की सराहना करते हुए कहती हैं कि जब दिव्यांगजनों को *अवसर, सम्मान और उचित मंच* मिलता है, तो वे अपनी क्षमताओं के बल पर समाज में महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं।रितु गुप्ता की कहानी उन सभी लोगों के लिए प्रेरणादायक संदेश है, जो किसी शारीरिक चुनौती को अपनी कमजोरी मान लेते हैं। उनकी जीवन यात्रा बताती है कि *दिव्यांगता किसी व्यक्ति की सीमा नहीं होती, बल्कि उसके संघर्ष, साहस और सफलता की कहानी का एक हिस्सा हो सकती है।*
रितु का प्रेरक संदेश है—
*“दिव्यांगता मेरे जीवन का एक हिस्सा है, मेरी पहचान नहीं। मेरी पहचान मेरी मेहनत, मेरी शिक्षा और समाज के लिए कुछ करने की इच्छा है।”*

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