मैं ही सब कुछ, यह मिथ्या भाव व्यक्तित्व के विनाश का बड़ा कारण।

भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने अहंकार को मनुष्य के पतन का प्रमुख कारण बताया है। गीता का संदेश है कि मनुष्य कर्म करे, किंतु कर्तापन का अहंकार न पालें। जब व्यक्ति स्वयं को हर कार्य का केंद्र मान लेता है, तब उसके भीतर विनम्रता समाप्त होने लगती है। वह दूसरों के योगदान को कमतर आंकने लगता है और यहीं से उसके व्यक्तित्व का अवनयन प्रारंभ हो जाता है। संत कबीर ने भी कहा है
जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाहिं।सब अँधियारा मिट गया, जब दीपक देखा माहिं।। यह दोहा केवल आध्यात्मिक सत्य नहीं, बल्कि सामाजिक जीवन का भी सार है। जहाँ अहंकार है, वहाँ सहयोग नहीं टिकता; जहाँ विनम्रता है, वहाँ संबंध भी मजबूत होते हैं और सफलता भी स्थायी बनती है।मनुष्य के व्यक्तित्व का सबसे बड़ा शत्रु बाहरी परिस्थितियाँ नहीं, बल्कि उसके भीतर बैठा हुआ मैं है। यह वही मैं है, जो धीरे-धीरे अहंकार का रूप धारण कर लेता है और व्यक्ति को यह भ्रम होने लगता है कि उसके बिना परिवार नहीं चल सकता, समाज ठहर जाएगा, उसका व्यवसाय समाप्त हो जाएगा या जिस संस्था में वह कार्यरत है, वह उसके अभाव में बिखर जाएगी। वस्तुतः यह एक मिथ्या-भाव है, जिसका वास्तविकता से बहुत कम संबंध होता है। प्रकृति का सबसे बड़ा सत्य परिवर्तन है। संसार का प्रत्येक कार्य किसी एक व्यक्ति पर नहीं टिका है। सूर्य प्रतिदिन उदित होता है, नदियाँ निरंतर बहती हैं, ऋतुएँ बदलती रहती हैं और समय अपनी गति से चलता रहता है। किसी एक व्यक्ति के होने या न होने से प्रकृति का क्रम नहीं रुकता। यही नियम समाज, परिवार और संस्थाओं पर भी लागू होता है।इतिहास साक्षी है कि जिन व्यक्तियों को अपने समय में अपरिहार्य समझा जाता था, उनके जाने के बाद भी समाज आगे बढ़ता रहा। बड़े-बड़े सम्राट, उद्योगपति, वैज्ञानिक और नेता आए और चले गए, लेकिन जीवन का प्रवाह कभी नहीं रुका। इसलिए यह मान लेना कि “मेरे बिना कुछ नहीं होगा”, स्वयं को धोखा देने जैसा है। आज का मनुष्य अपने पद, प्रतिष्ठा, धन और अधिकार के कारण स्वयं को अत्यधिक महत्वपूर्ण समझने लगता है।read more:https://khabarentertainment.in/ghosiya-nagar-panchayats-entire-system-collapsed-during-just-five-minutes-of-rain/ वह सोचता है कि कार्यालय में वही सबसे अधिक सक्षम है, परिवार उसी पर निर्भर है या समाज उसके बिना अधूरा है। किंतु यदि वह कुछ समय के लिए स्वयं को इन सब से अलग कर ले, तो उसे अनुभव होगा कि व्यवस्था अपने ढंग से चलती रहती है। लोग कुछ दिन उसकी कमी अवश्य महसूस करते हैं, परंतु धीरे-धीरे परिस्थितियों के अनुरूप स्वयं को ढाल लेते हैं। यही जीवन का स्वाभाविक नियम है।परिवार हो या समाज, प्रत्येक व्यवस्था सामूहिक सहयोग पर आधारित होती है। माता-पिता, जीवनसाथी, संतान, सहकर्मी और मित्र सभी का अपना-अपना योगदान होता है। यदि कोई व्यक्ति स्वयं को ही सब कुछ मानने लगे, तो वह दूसरों के महत्व को नकारने लगता है। परिणामस्वरूप संबंधों में दूरी, कार्यस्थल पर तनाव और जीवन में अकेलापन बढ़ने लगता है। वास्तव में मनुष्य का मूल्य उसके पद या अधिकार से नहीं, बल्कि उसके व्यवहार, संवेदनशीलता और विनम्रता से आँका जाता है। जो व्यक्ति जितना अधिक बड़ा होता है, वह उतना ही अधिक सरल और सहज दिखाई देता है। फल से लदा वृक्ष झुक जाता है; उसी प्रकार ज्ञान और अनुभव से समृद्ध व्यक्ति में अहंकार नहीं, बल्कि विनय का भाव होता है। इसलिए समय-समय पर स्वयं का आत्ममूल्यांकन आवश्यक है। कुछ समय के लिए स्वयं को केंद्र से हटाकर यह देखना चाहिए कि संसार अपनी गति से चलता रहता है। इससे व्यक्ति के भीतर का मिथ्या ‘मैं’ धीरे-धीरे समाप्त होने लगता है और उसके स्थान पर कर्तव्य, सहयोग और सेवा की भावना विकसित होती है।मूल रूप से यही कहा जा सकता है कि मैं ही सब कुछ हूँ का भाव मनुष्य को वास्तविकता से दूर ले जाता है, जबकि मैं भी सबके साथ हूँ का भाव उसे समाज से जोड़ता है। जीवन की सार्थकता स्वयं को सबसे बड़ा सिद्ध करने में नहीं, बल्कि अपने हिस्से का श्रेष्ठ योगदान देकर विनम्रतापूर्वक आगे बढ़ जाने में है। यही परिपक्व व्यक्तित्व की पहचान है और यही सुखी, संतुलित तथा सफल जीवन का मूल मंत्र भी।

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