परमपूज्य ‘बेइज्जती’ महाराज की जय

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा’
परमपूज्य बेइज्जती हमारे समाज का वह अदृश्य ऑक्सीजन है, जिसके बिना हमारी सामाजिक साँसें अटक जाती हैं। लोग कहते हैं कि इज्जत कमाने में जिंदगी गुजर जाती है, पर सच मानिए, बेइज्जती कमाने के लिए तो बस एक बार सच बोलने की जुर्रत काफी है। हमारी व्यवस्था में इज्जत उस सरकारी फाइल की तरह है जो बिना रिश्वत के आगे नहीं बढ़ती, जबकि बेइज्जती वह आवारा सांड है जो बिना बुलाए आपके वीआईपी लॉन में घुस आता है। जब तक समाज में किसी की बेइज्जती न हो, तब तक लोगों की सुबह की चाय में चीनी कम लगती है और शाम के समोसे का स्वाद फीका रहता है। दरअसल, यह वह अनमोल गहना है जिसे हर आदमी दूसरों को मुफ्त में पहनाने के लिए उतावला रहता है। जब कोई आपकी बेइज्जती करता है, तो समझिए वह आपके वजूद पर सामाजिक स्वीकृति की पक्की मुहर लगा रहा है, क्योंकि नजरअंदाज तो सिर्फ शरीफों को किया जाता है।एक दिन हमारे मोहल्ले के सबसे संभ्रांत और सफेदपोश दीनानाथ जी के घर के सामने एक अजीबो-गरीब हादसा हो गया। हुआ यह कि उनके सुपुत्र ने परीक्षा में टॉप करने की बजाय सीधे देशसेवा का शॉर्टकट चुना और मोहल्ले की ही एक कन्या के साथ स्कूटी पर फर्र से उड़ गए। अब पूरे मोहल्ले में सन्नाटा ऐसा खिंच गया जैसे किसी ने लाउडस्पीकर का प्लग निकाल दिया हो। दीनानाथ जी छाती पीटकर चिल्लाए, “हाय राम! मेरी तो नाक ही कट गई!” मैंने पास जाकर उनकी थूथन को गौर से देखा, वह अपनी जगह सुरक्षित और चमकीली थी। मैंने हंसकर कहा, “दीनानाथ भाई, सुूर्पणखा की तरह कटी हुई नाक अगर दिखती नहीं, तो समझो वह प्लास्टिक सर्जरी का कमाल है! दरअसल, आपकी नाक नहीं कटी, बल्कि समाज की आंखों का मोतियाबिंद साफ हुआ है।” वे मुझे ऐसे देखने लगे जैसे मैंने उनके जख्म पर नमक नहीं, बल्कि सीधे लाल मिर्च का पाउडर छिड़क दिया हो।बात आगे बढ़ी तो नुक्कड़ के पान वाले ने भी अपनी अकल का कत्था लगाते हुए कहा, “बाबूजी, इज्जत तो वह गुब्बारा है जिसमें हवा कम और दिखावा ज्यादा होता है, एक सुई लगी नहीं कि फुस्स!” समाज में बेइज्जती का तड़का जब तक न लगे, तब तक किसी के रसूख का असली जायका बाहर निकलकर नहीं आता। लोग अपनी तिजोरियों में इज्जत छुपाकर रखते हैं और जब वह चोरी हो जाती है, तो थाने में एफआईआर लिखाने जाते हैं। दरोगा जी हंसकर कहते हैं, “हुजूर, जो चीज कभी थी ही नहीं, उसकी गुमशुदगी की रिपोर्ट कैसे लिखूं?” हमारी दुनिया में बेइज्जती वह आईना है जिसे देखकर लोग अपनी शक्ल सुधारने की बजाय आईना तोड़ने की कसम खा लेते हैं। यह एक ऐसी करेंसी है जो हर बाजार में चलती है, बशर्ते बांटने वाला दिलदार हो।दिव्य प्रकाश दुबे की उस संजीदा और सलीके वाली भाषा में कहें, तो आज का युवा बेइज्जती को ‘फीडबैक’ समझकर इंस्टाग्राम पर रील बना देता है। पुराने जमाने में जब बेइज्जती होती थी, तो लोग हिमालय चले जाते थे या कम से कम कमरे का दरवाजा बंद करके रो लेते थे। आज के दौर में अगर कोई आपकी बेइज्जती करे, तो लोग तुरंत स्क्रीनशॉट लेकर ‘माई करंट मूड’ लिखकर स्टेटस लगा देते हैं। दुःख इस बात का नहीं है कि हमारी बेइज्जती हो रही है, मलाल तो इस बात का है कि सामने वाला इसे इतनी फुर्ती से कर गया कि हमें ‘थैंक यू’ बोलने का मौका भी नहीं मिला। यह जिंदगी भी किसी कटी हुई पतंग जैसी है, जो हवा के रुख पर नहीं, बल्कि मोहल्ले के बच्चों की लपक पर टिकी हुई है। बेइज्जती वह मोमबत्ती है जो जलती दूसरों के घर में है, पर उजाला हमारे चेहरों पर ला देती है।read more:https://khabarentertainment.in/meritorious-students-honored-at-klgm-inter-college-incentive-amount-of-%e2%82%b961000-distributed/तभी वहां से गुजरते हुए शर्मा जी ने अपनी तोंद को संभालते हुए दार्शनिक जुमला उछाला, “भाई, जिसकी जितनी बड़ी हैसियत, उसकी उतनी ही आलीशान बेइज्जती!” मुझे लगा कि ज्ञान का यह झरना सीधे कबीर के लोक से बहकर आ रहा है। गरीब की बेइज्जती तो फुटपाथ पर पड़े उस पत्थर की तरह होती है जिससे हर राहगीर ठोकर मारकर आगे निकल जाता है और कोई मुड़कर देखता तक नहीं। मगर जब किसी अमीर या रसूखदार की बेइज्जती होती है, तो बकायदा उसका लाइव टेलीकास्ट होता है, प्राइम टाइम पर डिबेट बैठती है और लोग पॉपकॉर्न लेकर टीवी के सामने जम जाते हैं। तब बेइज्जती सिर्फ एक अहसास नहीं रह जाती, बल्कि वह एक नेशनल इवेंट बन जाती है जिसमें शामिल होना हर नागरिक का पुनीत कर्तव्य हो जाता है। यही तो हमारे लोकतंत्र की सबसे खूबसूरत और जानदार नक्काशी है।”अरे भाई, तुम क्या समझोगे इस दर्द को!” दीनानाथ जी ने हाथ नचाते हुए मुझसे कहा, “जब समाज थूकता है, तो चेहरा साफ नहीं होता, दाग हमेशा के लिए लग जाता है।” मैंने उनकी बात को बीच में ही काटते हुए कहा, “दीनानाथ जी, समाज का थूक तो वह गंगाजल है जिसमें नहाकर पापी भी नेता बन जाते हैं! आप फालतू में परेशान हैं।” इस देश में बेइज्जती को पचाने का हुनर जिसके पास है, वही इतिहास के पन्नों पर सुनहरे अक्षरों में दर्ज होता है। जो लोग बेइज्जती से डरकर छुपे रहते हैं, वे कछुए की तरह जिंदगी तो लंबी जी लेते हैं, पर समंदर का मजा कभी नहीं चख पाते। बेइज्जती तो वह खाद है जिसे यदि आप अपने अहंकार की जड़ों में डाल दें, तो विनम्रता के बड़े ही मीठे फल उगते हैं, बशर्ते आपकी चमड़ी भैंस से थोड़ी ज्यादा मोटी हो।बेइज्जती आपके पास आएगा, आपके कंधे पर हाथ रखेगा और इतनी शराफत से आपकी लंका लगाएगा कि आपको लगेगा कि वह आपका शुभचिंतक है। वह कहेगा, “बुरा मत मानना भाई, मैं तो तुम्हारे भले के लिए कह रहा हूँ, वरना दुनिया तो थू-थू कर रही है।” इस ‘भले के लिए’ वाले जुमले ने जितने कत्ल किए हैं, उतने तो मुगलों की तलवारों ने भी नहीं किए होंगे। यह वह मीठा जहर है जिसे लोग बड़े चाव से चम्मच में भरकर एक-दूसरे को पिलाते हैं और फिर उम्मीद करते हैं कि सामने वाला ‘अमृत’ समझकर इसे पी जाए और मुस्कुराकर दुआएं भी दे।आखिरकार, बेइज्जती कोई अभिशाप नहीं, बल्कि इस मतलबी दुनिया में जिंदा रहने का सबसे बड़ा सर्टिफिकेट और वजूद का अहसास है। अगर आपकी जिंदगी में कोई आपकी बेइज्जती करने वाला नहीं है, तो समझिए आप इस दुनिया के लिए अप्रासंगिक हो चुके हैं, आपका होना न होना बराबर है। इसलिए जब भी कोई आपकी बेइज्जती करे, तो दुखी होने की बजाय एक गहरी सांस लीजिए, अपने कॉलर को थोड़ा सीधा कीजिए और मुस्कुराकर कहिए, “चलो, आज फिर किसी के काम आए!” क्योंकि इस दौर में मुफ्त में मनोरंजन देना भी किसी पुण्य से कम नहीं है। इज्जत तो वो कफन है जो मरने के बाद मिलता है, पर बेइज्जती वो जिंदादिल लिबास है जिसे पहनकर आदमी समाज की हर महफिल में सीना तानकर शान से घूम सकता है।

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