अशोक भाटिया
हर साल मानसून के दस्तक देते ही देश के बड़े महानगरों से लेकर टियर-2 और टियर-3 शहरों से डराने वाली तस्वीरें सामने आने लगती हैं। देश की आर्थिक राजधानी मुंबई व मुंबई के पास वसई विरार के जलमग्न ट्रैक, बेंगलुरु के टेक-कॉरिडोर में तैरती नावें, दिल्ली की सड़कों पर लगा मीलों लंबा जाम, और चेन्नई से लेकर गुवाहाटी जैसे भौगोलिक रूप से भिन्न शहरों का पानी-पानी हो जाना अब कोई ‘असाधारण घटना’ नहीं रह गया है। यह अब हमारी सालाना नियति बन चुकी है।शहरी बाढ़ आज भारत के लिए केवल एक मौसमी आपदा नहीं, बल्कि एक गंभीर संरचनात्मक, आर्थिक और नीतिगत संकट है। विश्व बैंक और प्रमुख शोध पत्रिकाओं की हालिया रिपोर्टें बताती हैं कि भारत दुनिया के उन देशों में अग्रणी है जहाँ बाढ़ संभावित क्षेत्रों में शहरी बस्तियों का विस्तार सबसे तीव्र गति से हुआ है। जब तक हम इस संकट की तह में जाकर इसके मानव-निर्मित कारणों को स्वीकार नहीं करेंगे, तब तक भारत के ‘स्मार्ट सिटी’ बनने का सपना हर मानसून में पानी में बहता रहेगा।शहरी बाढ़ को अक्सर सामान्य ग्रामीण बाढ़ की तरह समझने की भूल की जाती है, जबकि दोनों के चरित्र और प्रभाव में ज़मीन-आसमान का अंतर है। ग्रामीण बाढ़ मुख्य रूप से नदियों के जलस्तर बढ़ने या उनके तटबंध टूटने से मैदानी इलाकों में धीरे-धीरे फैलती है। इसके विपरीत, शहरी बाढ़ एक अत्यधिक केंद्रित, तीव्र और ‘मानव-निर्मित’ आपदा है।शहरीकरण के कारण कंक्रीट की अभेद्य सतहों का निर्माण होता है, जिससे जलभराव की गति सामान्य से 1.8 से 8 गुना तक बढ़ जाती है और पानी की मात्रा में 6 गुना तक की वृद्धि देखी जाती है। शहरों में घनी आबादी और अरबों रुपयों का बुनियादी ढांचा दांव पर होता है। चंद घंटों की मूसलाधार बारिश पूरे शहर के परिवहन, बिजली ग्रिड, इंटरनेट संचार और स्वास्थ्य सेवाओं को घुटनों पर ला देती है।शहरी बाढ़ के कारणों को केवल ‘प्रकृति का प्रकोप’ कहकर खारिज नहीं किया जा सकता। इसके पीछे अनियोजित विकास और प्रशासनिक लापरवाही की एक लंबी कतार है । शहरों के पास जो तालाब, झीलें और दलदली भूमि थीं, वे प्राकृतिक ‘स्पंज’ या बफर का काम करती थीं, जो अतिरिक्त वर्षा जल को सोख लेती थीं। लेकिन रियल एस्टेट और अनियोजित शहरी विस्तार की भूख ने इन जल निकायों को निगल लिया है। उदाहरण के लिए, बेंगलुरु ने पिछले कुछ दशकों में अपने अंतर्संबंधित झीलों के तंत्र का एक बहुत बड़ा हिस्सा कंक्रीट की इमारतों के कारण खो दिया है। चेन्नई और हैदराबाद में भी बाढ़ के मैदानों पर बहुमंजिला इमारतें और मॉल खड़े कर दिए गए हैं, जिससे पानी के बहने और ठहरने का प्राकृतिक रास्ता ही बंद हो गया है।भारत के अधिकांश महानगर आज भी दशकों पुराने, और मुंबई जैसे शहर तो औपनिवेशिक काल के ड्रेनेज सिस्टम पर निर्भर हैं। यह बुनियादी ढांचा उस समय की आबादी और वर्षा के पैटर्न को ध्यान में रखकर बनाया गया था। मिसाल के तौर पर, मुंबई का पुराना ड्रेनेज सिस्टम प्रति घंटे अधिकतम 25 मिमी बारिश का पानी निकालने की क्षमता रखता था, जबकि आज जलवायु परिवर्तन के कारण शहरों में प्रति घंटे 100 मिमी से अधिक की अति-तीव्र बारिश हो रही है। इस बढ़ी हुई क्षमता को संभालने में हमारे शहरों की संकरी और गाद से भरी नाली प्रणालियाँ पूरी तरह अक्षम हैं।विकास के नाम पर मिट्टी की जगह डामर और कंक्रीट ने ले ली है。 फुटपाथों से लेकर घरों के आंगनों तक को पक्का कर दिया गया है, जिससे जमीन के भीतर पानी रिसने की दर शून्य हो गई है。 रही-सही कसर हमारा खराब ठोस अपशिष्ट प्रबंधन पूरी कर देता है。 सिंगल-यूज़ प्लास्टिक, थर्माकोल और निर्माण का मलबा बरसाती नालों और नालियों के मुहानों को जाम कर देते हैं。 मानसून से पहले कागजों पर तो नालियों की सफाई दिखाई जाती है, लेकिन हकीकत पहली ही बारिश में सड़कों पर तैरते कचरे के रूप में सामने आ जाती है।आज वैश्विक तापमान में वृद्धि के कारण मानसून का मिजाज पूरी तरह बदल चुका है। अब बारिश के दिनों की संख्या तो कम हो रही है, लेकिन कम समय में अत्यधिक तीव्र वर्षा की घटनाएं कई गुना बढ़ गई हैं。 जब कुछ ही घंटों में पूरे महीने भर का पानी बरस जाएगा, तो बिना आधुनिक और वैज्ञानिक प्रबंधन के कोई भी पारंपरिक शहर पानी में डूबने से खुद को नहीं बचा सकता।शहरी बाढ़ केवल कुछ दिनों का जलभराव नहीं है, इसके दीर्घकालिक परिणाम बेहद डरावने हैं:आर्थिक चोट: रिसर्च फर्मों और की रिपोर्टों के अनुसार, केवल बेंगलुरु में 2022 की एक दिन की बाढ़ से आईटी कॉरिडोर को लगभग 225 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ था। अनुमान है कि 2030 तक भारतीय शहरों को शहरी बाढ़ के कारण सालाना 5 अरब डॉलर तक का आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है।मानवीय और सामाजिक लागत: बाढ़ का सबसे क्रूर प्रहार समाज के सबसे निचले तबके यानी झुग्गी-झोपड़ियों और दैनिक मजदूरों पर होता है। निचले इलाकों में रहने वाले इन गरीबों के आशियाने उजड़ जाते हैं, आजीविका छिन जाती है और वे विस्थापित होने पर मजबूर हो जाते हैं।महामारियाँ और स्वास्थ्य संकट: बाढ़ का गंदा पानी जब पीने के पानी की लाइनों में मिल जाता है, तो हैजा, टायफाइड, डेंगू, मलेरिया और लेप्टोस्पायरोसिस जैसी जानलेवा बीमारियों का प्रकोप तेजी से फैलता है。read more:https://pahaltoday.com/sukesh-chandrashekhar-granted-bail-in-rs-200-crore-money-laundering-case/अब समय ‘रिएक्टिव’ (आपदा आने पर जागना) रवैये को छोड़कर ‘प्रोएक्टिव’ (पहले से तैयारी) दृष्टिकोण अपनाने का है। इसके लिए निम्नलिखित बहु-स्तरीय समाधानों को युद्धस्तर पर लागू करना होगा। जैसे ‘स्पंज सिटी’ की अवधारणा को अपनाना । आज चीन और कई यूरोपीय देशों की तर्ज पर भारतीय शहरों को ‘स्पंज’ में बदलना होगा। इसका अर्थ है कि शहर की रूपरेखा ऐसी हो जो वर्षा जल को बहने देने की बजाय खुद में सोख ले। इसके लिए:शहरों में पारगम्य कंक्रीट और ऐसी सड़कों का निर्माण किया जाए जिसके नीचे पानी जमीन में जा सके।शहरी वनीकरण पार्कों और ‘रेन गार्डन्स’ को बढ़ावा दिया जाए ताकि हरी-भरी सतहें पानी के वेग को कम कर सकें।
‘ब्लू’ (जल निकाय जैसे झील, तालाब, नदियाँ) और ‘ग्रीन’ (पार्क, पेड़-पौधे) के समन्वय से ही शहरों को बचाया जा सकता है। दिल्ली के मास्टर प्लान 2041 में इस अवधारणा को शामिल किया गया है। चेन्नई नगर निगम द्वारा स्मार्ट सिटी मिशन के तहत झीलों के जीर्णोद्धार की पहल एक सराहनीय उदाहरण है, जहाँ गाद निकालकर तालाबों की जल संचयन क्षमता को बढ़ाया गया है। इस मॉडल को देशव्यापी बनाना होगा।शहरी स्थानीय निकायों को आने वाले 50 वर्षों के वर्षा अनुमानों और जलवायु परिवर्तन के आंकड़ों के आधार पर अपने ड्रेनेज सिस्टम को रीडिजाइन करना चाहिए। नालियों की केवल मानसून से पहले सफाई नहीं, बल्कि चौबीसों घंटे निगरानी होनी चाहिए। केंद्रीय लोक स्वास्थ्य एवं पर्यावरणीय इंजीनियरी संगठन के मानकों के अनुसार ड्रेनेज नेटवर्क का विस्तार अनिवार्य किया जाना चाहिए।कृत्रिम बुद्धिमत्ता , भौगोलिक सूचना प्रणाली और इंटरनेट ऑफ थिंग्स सेंसर की मदद से जलभराव वाले हॉटस्पॉट की रीयल-टाइम मैपिंग की जानी चाहिए। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के ‘मौसम ऐप’ और स्थानीय अलर्ट सिस्टम को इतना सटीक होना चाहिए कि भारी बारिश से दो घंटे पहले ही निचले इलाकों के नागरिकों को सुरक्षित निकाला जा सके या यातायात को डायवर्ट किया जा सके। इसके अलावा, अंडरपास और सबवे में पानी भरने से रोकने के लिए आधुनिक ‘इन्फ्लेटेबल फ्लड बैरियर्स’ जैसी तकनीकों का त्वरित उपयोग किया जाना चाहिए।बाढ़ के मैदानों और प्राकृतिक नालों पर निर्माण को पूरी तरह ‘नो-कंस्ट्रक्शन ज़ोन’ घोषित कर कानूनी रूप से प्रतिबंधित किया जाना चाहिए। सरकार की AMRUT 2।0 योजना के तहत बरसाती नालों को जल निकायों से जोड़ने और ‘मॉडल बिल्डिंग बाय-लॉज़’ के तहत 100 वर्ग मीटर से बड़े सभी भूखंडों पर रेन वाटर हार्वेस्टिंग (वर्षा जल संचयन) को अनिवार्य बनाने के नियम को कड़ाई से जमीन पर लागू करना होगा।शहरी बाढ़ अब केवल एक प्रशासनिक समस्या या इंजीनियरिंग की खामी नहीं है; यह हमारे विकास के प्रतिमानों पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न है। कंक्रीट के बेतरतीब जंगल खड़े करके हम खुद को ‘वैश्विक महाशक्ति’ या ‘स्मार्ट’ नहीं कह सकते, यदि हमारी अर्थव्यवस्था और जनजीवन चार घंटे की बारिश भी न झेल सके।राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने 2010 में ही शहरी बाढ़ प्रबंधन के लिए व्यापक दिशानिर्देश जारी किए थे, लेकिन वे आज भी नगर निगमों की फाइलों में धूल फांक रहे हैं। केंद्र, राज्य और स्थानीय निकायों के बीच राजनीतिक और प्रशासनिक समन्वय के बिना इस संकट से पार पाना असंभव है।यदि हम चाहते हैं कि हमारे शहर देश की आर्थिक प्रगति के इंजन बने रहें, तो हमें प्रकृति के साथ तालमेल बिठाना ही होगा। पानी अपना रास्ता खुद ढूंढ लेता है; यदि हम उसे उसका रास्ता नहीं देंगे, तो वह हमारे घरों, दफ्तरों और तरक्की के रास्तों में घुसकर सब कुछ तबाह करता रहेगा। समय आ गया है कि हम “बाढ़-लचीले” शहरी नियोजन को अपनी सर्वोच्च राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाएं, अन्यथा हर साल मानसून का आगमन उत्सव की जगह एक त्रासदी बनकर आता रहेगा।