Varanasi: इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज़ (आईएमएस), बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के ट्रॉमा सेंटर में आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (PM-JAY) की निधियों के कथित उपयोग को लेकर गंभीर प्रश्न खड़े किए गए हैं। एक विस्तृत शिकायत में वित्तीय लेन-देन, खरीद प्रक्रिया तथा सार्वजनिक धन के उपयोग की स्वतंत्र जांच की मांग की गई है। शिकायत में आरोप लगाया गया है कि आयुष्मान भारत खाते से ₹16.11 करोड़ से अधिक के लेन-देन किए गए, जिनमें से एक बड़ा हिस्सा भारत सरकार द्वारा निर्धारित दिशा-निर्देशों के अनुरूप नहीं प्रतीत होता।
शिकायत का मुख्य आरोप यह है कि कई निजी विक्रेताओं (वेंडर्स) को सीधे भुगतान किया गया, जबकि ट्रॉमा सेंटर में भर्ती आयुष्मान भारत लाभार्थियों को दवाइयाँ, उपभोग्य सामग्री (Consumables) तथा इम्प्लांट उपलब्ध कराने के लिए उमंग क्योर प्रा. लि. तथा एचएलएल लाइफकेयर लिमिटेड (अमृत फार्मेसी) को अधिकृत किया गया है। शिकायतकर्ता का कहना है कि ऐसी स्थिति में बिल इन अधिकृत एजेंसियों के नाम से होने चाहिए थे, न कि सीधे निजी विक्रेताओं के नाम पर। शिकायत के अनुसार, जांचाधीन अवधि में लगभग ₹11.61 करोड़ के प्रत्यक्ष विक्रेता बिलों का भुगतान किया गया।
शिकायत में यह भी कहा गया है कि यह पहला अवसर नहीं है जब ऐसे आरोप लगाए गए हों। इससे पूर्व भी इसी प्रकार की शिकायत केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC) को भेजी गई थी, जिसकी स्थिति अभी भी “जांचाधीन” बताई गई है। इसके बाद सतर्कता जांच से संबंधित जानकारी प्राप्त करने के लिए सूचना का अधिकार (RTI) के तहत आवेदन दायर किया गया, किंतु शिकायत के अनुसार न तो संबंधित लोक सूचना अधिकारी (CPIO) ने और न ही प्रथम अपीलीय प्राधिकारी ने कोई उत्तर दिया। शिकायतकर्ता ने यह भी प्रश्न उठाया है कि जब पूर्व शिकायत लंबित थी, तब ट्रॉमा सेंटर के प्रोफेसर इंचार्ज प्रोफेसर सौरभ सिंह को सर सुंदरलाल चिकित्सालय, आईएमएस-बीएचयू के मेडिकल सुपरिंटेंडेंट पद हेतु विचारार्थ सतर्कता स्वीकृति किस आधार पर प्रदान की गई।read more:https://pahaltoday.com/a-unique-initiative-by-the-teachers-of-pm-shri-samvilian-vidyalaya-to-show-family-like-affection-towards-the-students/शिकायत में आयुष्मान भारत निधियों से कर्मचारियों के वेतन भुगतान पर भी प्रश्न उठाए गए हैं। आरोप है कि कुछ ऐसे व्यक्तियों को योजना के तहत वेतन दिया गया, जो आयुष्मान भारत लाभार्थियों के उपचार अथवा प्रबंधन से संबंधित कार्यों में संलग्न नहीं थे। शिकायतकर्ता का कहना है कि यदि ऐसा हुआ है तो यह योजना के उद्देश्य और वित्तीय प्रावधानों के अनुरूप नहीं माना जा सकता।
लोकायुक्त के अधिकार क्षेत्र को लेकर दिया गया उत्तर, लेकिन मूल प्रश्न अब भी बरकरार शिकायतकर्ता ने यह भी उल्लेख किया है कि कार्यवाही के दौरान आरोपित अधिकारियों द्वारा प्रस्तुत उत्तर में मुख्य रूप से यह कहा गया है कि यह मामला उत्तर प्रदेश लोकायुक्त के अधिकार क्षेत्र (Jurisdiction) में नहीं आता, इसलिए लोकायुक्त इस मामले की जांच करने के लिए सक्षम प्राधिकारी नहीं हैं। हालाँकि, शिकायतकर्ता का कहना है कि यह उत्तर केवल अधिकार क्षेत्र (Jurisdiction) के प्रश्न तक सीमित है और शिकायत में लगाए गए मूल आरोपों का कोई तथ्यात्मक उत्तर नहीं देता। शिकायतकर्ता के अनुसार वास्तविक प्रश्न यह नहीं है कि उत्तर प्रदेश लोकायुक्त को इस मामले की जांच करने का अधिकार है या नहीं, बल्कि यह है कि शिकायत में वर्णित वित्तीय लेन-देन वास्तव में हुए या नहीं, क्या वे आयुष्मान भारत योजना के संचालन संबंधी दिशा-निर्देशों के अनुरूप थे, तथा क्या सार्वजनिक धन का उपयोग निर्धारित नियमों के अनुसार किया गया। शिकायतकर्ता का तर्क है कि अधिकार क्षेत्र का प्रश्न एक प्रक्रियात्मक (Procedural) विषय हो सकता है, जिसका निर्णय सक्षम प्राधिकारी द्वारा किया जा सकता है। किंतु इससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि जिन प्रत्यक्ष विक्रेता भुगतानों, खरीद प्रक्रियाओं, पृथक वित्तीय अभिलेखों के रख-रखाव, व्ययों की वैधता तथा पीएम-जय (PM-JAY) दिशा-निर्देशों के पालन से संबंधित आरोप लगाए गए हैं, उनकी स्वतंत्र एवं निष्पक्ष जांच होना आवश्यक है। शिकायतकर्ता के अनुसार, इन तथ्यों की जांच किसी भी सक्षम एजेंसी द्वारा की जानी चाहिए, चाहे वह जांच किसी भी प्राधिकरण द्वारा की जाए।स्वतंत्र एवं निष्पक्ष जांच की मांग अंततः शिकायतकर्ता ने पूरे मामले की व्यापक, निष्पक्ष एवं स्वतंत्र जांच की मांग की है ताकि यह स्थापित किया जा सके कि विवादित वित्तीय लेन-देन वास्तव में आयुष्मान भारत के लाभार्थियों से संबंधित थे या नहीं, क्या व्यय भारत सरकार के दिशा-निर्देशों के अनुरूप स्वीकृत थे, क्या पृथक लेखांकन एवं खरीद प्रक्रिया का पालन किया गया, तथा क्या सार्वजनिक धन का किसी प्रकार से दुरुपयोग हुआ। शिकायत में सक्षम प्राधिकारियों से आग्रह किया गया है कि आरोपों की तथ्यात्मक सत्यता की जांच कर, यदि कोई अनियमितता पाई जाती है, तो उसके अनुसार उचित कार्रवाई की जाए।