अशोक भाटिया
आज हमारा समाज एक अत्यंत संवेदनशील, जटिल और अभूर्व सामाजिक-मनोवैज्ञानिक बदलाव के चौराहे पर खड़ा है। पिछले कुछ समय में देश के विभिन्न हिस्सों से महिलाओं द्वारा किए जाने वाले हिंसक अपराधों, घरेलू विवादों में आक्रामकता और गंभीर वारदातों में उनकी संलिप्तता की घटनाओं में अप्रत्याशित बढ़ोतरी देखने को मिली है। यह बदलाव उस पारंपरिक भारतीय समाज के लिए एक बड़ा वैचारिक झटका है, जिसने सदियों से महिलाओं को सहज रूप से सहनशीलता, करुणा, त्याग और धैर्य के सर्वोच्च प्रतीक के रूप में देखा और परिभाषित किया है। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि ममता और संवेदनशीलता की प्रतिमूर्ति मानी जाने वाली आधी आबादी का एक हिस्सा आज इतनी हिंसक और आक्रामक प्रवृत्तियों की ओर क्यों बढ़ रहा है? क्या यह आधुनिकता का कोई विकृत रूप है, या फिर हमारे बीमार होते सामाजिक ढांचे की कोई गहरी गूंज?इस आक्रामकता के मूल कारणों की पड़ताल करें, तो इसका सबसे पहला और मुख्य सिरा आधुनिक जीवनशैली के अत्यधिक मानसिक तनाव और ‘वर्क-लाइफ’ के असंतुलन से जुड़ता है। आज की महिला एक ऐतिहासिक संक्रमण काल से गुजर रही है। वह आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होने के लिए कार्यस्थल पर पुरुषों के साथ कठिन प्रतिस्पर्धा कर रही है और करियर की ऊंचाइयों को छू रही है। लेकिन विडंबना यह है कि बाहर की इस आधुनिकता के बावजूद, घर के भीतर का सामाजिक ढांचा आज भी काफी हद तक पारंपरिक ही है। कामकाजी होने के बाद भी समाज यह उम्मीद करता है कि वह घर के चूल्हे-चौके, बच्चों की परवरिश और बुजुर्गों की देखभाल की जिम्मेदारी भी उतनी ही परफेक्शन के साथ निभाए। हर मोर्चे पर खुद को सर्वश्रेष्ठ साबित करने और ‘सुपरवुमन’ बनने का यह निरंतर सामाजिक व पारिवारिक दबाव महिलाओं को भीतर ही भीतर खोखला कर रहा है। समय की कमी, भरपूर नींद न आना और लगातार थकान मिलकर एक ऐसा मानसिक फ्रस्ट्रेशन (कुंठा) पैदा करते हैं, जो उचित ‘एंगर मैनेजमेंट’ (क्रोध प्रबंधन) न होने पर अचानक तीव्र गुस्से और हिंसक व्यवहार के रूप में फूट पड़ता है।हाल ही में पुणे (पूना) के लोहागढ़ किले में मंगेतर केतन अग्रवाल की गहरी खाई में धकेलकर की गई जघन्य हत्या के मामले ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। इस हाई-प्रोफाइल मामले में मंगेतर (जिसकी पहचान मीडिया व सामाजिक विमर्शों में केतन अग्रवाल हत्याकांड के रूप में चर्चित है) ने अपने प्रेमी चेतन चौधरी के साथ मिलकर, सामाजिक-पारिवारिक दबाव और शादी से पीछे न हट पाने के चलते, ठंडे दिमाग से हत्या की साजिश रची और उसे दुर्घटना का रूप देने की कोशिश की। ठीक इसी तरह, भोपाल के हाई-प्रोफाइल ससुराल में प्रताड़ना के बाद एक नवविवाहिता की संदिग्ध मौत की घटना, और भोपाल में ही दो सगी बहनों द्वारा अन्य लड़कियों को ब्लैकमेलिंग व शोषण के आपराधिक जाल में धकेलने का मामला भी सामने आया है। महाराष्ट्र (बीड): नशे की लत से परेशान होकर नसरीन नामक महिला ने अपने पति शरीफ पठान की तार से गला दबाकर हत्या कर दी। इसके बाद उसने इसे स्वाभाविक मौत बताने के लिए हार्ट अटैक की झूठी कहानी गढ़ी, जिसे पुलिस ने पूछताछ में उजागर कर दिया। तेलंगाना (महबूबनगर): एक महिला (कविता) ने अपने 38 वर्षीय पति नागेश की सोते समय चाकू से बेरहमी से हत्या कर दी। चीखें सुनकर दौड़े पड़ोसियों और बेटे की आंखों के सामने हुए इस मर्डर के कारणों की पुलिस जांच कर रही है। मध्य प्रदेश (इंदौर/धार): एक पत्नी (प्रियंका) ने अपने प्रेमी के साथ मिलकर पति देवकृष्ण की हत्या की खौफनाक साजिश रची। पहले इसे लूटपाट का रूप दिया गया, लेकिन जांच में खुलासा हुआ कि पत्नी ने प्रेमी के माध्यम से हत्यारों को 1 लाख रुपये की सुपारी दी थी। उत्तर प्रदेश (बागपत): एक महिला ने अपने कथित प्रेमी के साथ मिलकर पति को नींद की गोलियां दीं और फिर पेट्रोल डालकर आग लगा दी। इलाज के दौरान पति की मौत के बाद पुलिस ने दोनों को गिरफ्तार कर लिया है।read more:https://pahaltoday.com/khalsa-srcc-and-ramjas-college-win-in-pspb-baba-deep-singh-basketball/ये घटनाएं यह साबित करती हैं कि जब नैतिक व्यवस्था बिखरती है, तो अपराध और आक्रामकता का कोई जेंडर नहीं रह जाता। जहाँ एक तरफ महिलाएं आज भी बर्बर घरेलू हिंसा का शिकार हो रही हैं, वहीं दूसरी तरफ कुछ महिलाओं द्वारा विवादों से निकलने या अपनी राह का रोड़ा हटाने के लिए कत्ल और साजिश जैसे जघन्य रास्तों को चुनना यह दिखाता है कि समाज में सहिष्णुता और संवाद की जगह अब खतरनाक आक्रामकता ले रही है।इस सामाजिक बदलाव की पुष्टि केवल धारणाओं से नहीं, बल्कि देश के आधिकारिक आंकड़ों से भी होती है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की रिपोर्ट पर नजर डालें, तो भारत की जेलों में बंद महिला कैदियों (विचाराधीन और दोषी दोनों) की संख्या में पिछले दो दशकों में तेजी से बढ़ोतरी हुई है। वर्ष 2000 में जहाँ जेलों में महिला कैदियों की संख्या 9,089 थी, वहीं यह संख्या अब बढ़कर 23,700 से अधिक हो चुकी है। यानी इस अवधि में महिला कैदियों की संख्या में करीब 162% की भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जबकि इसी दौरान देश की कुल आबादी महज 30% के आसपास बढ़ी है। हालांकि कुल अपराधियों में महिलाओं की संख्या अब भी पुरुषों की तुलना में बेहद कम (करीब 4 से 6 प्रतिशत) है, लेकिन अपराध के ग्राफ में उनकी संख्या बढ़ने की यह रफ्तार बेहद डराने वाली है। इतना ही नहीं, समाजशास्त्रियों के लिए सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि अपराधों की प्रकृति भी बदल रही है। पहले जहाँ महिलाएं ज़्यादातर छोटे-मोटे घरेलू विवादों या विवशतावश किए गए छोटे अपराधों में संलिप्त पाई जाती थीं, वहीं अब गंभीर चोट पहुँचाने (Hurt), हत्या (Murder) और धोखाधड़ी जैसे गंभीर व हिंसक अपराधों के तहत महिलाओं की गिरफ्तारियां बढ़ी हैं। यह इस बात का सीधा प्रमाण है कि महिलाओं के भीतर का अवसाद और तनाव अब कानून-व्यवस्था को चुनौती देने वाले गंभीर आक्रोश में तब्दील हो रहा है।एक अन्य सामाजिक कारण संयुक्त परिवारों का तेजी से टूटना और एकल परिवारों का बढ़ना है। आज के एकल परिवारों में महिलाएं पूरी तरह अकेली हो चुकी हैं। उनके पास अपनी भावनाएं, अपनी असुरक्षाएं और अपना रोना रोने के लिए कोई भरोसेमंद कंधा या सामाजिक ‘वेंटिलेशन’ (निकासी का रास्ता) नहीं है। पड़ोसियों से संवाद खत्म हो चुका है। यह अंतहीन अकेलापन और अपनी बात न कह पाने की लाचारी धीरे-धीरे गहरे अवसाद (डिप्रेशन) और एंग्जायटी में बदल जाती है। जब इंसान के भीतर की नकारात्मक भावनाएं बाहर निकलने का रास्ता नहीं पातीं, तो वे अंततः ज्वालामुखी की तरह आक्रामक व्यवहार के रूप में फटती हैं। इसके ऊपर, इंटरनेट, सोशल मीडिया और ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर परोसी जा रही हिंसक सामग्री और रील्स कल्चर ने लोगों के मानसिक संतुलन को और बिगाड़ दिया है, जिससे स्वभाव में चिड़चिड़ापन और हिंसक प्रवृत्तियां बढ़ रही हैं।महिलाओं में बढ़ती इस आक्रामक प्रवृत्ति को केवल एक ‘लॉ एंड ऑर्डर’ (कानून-व्यवस्था) या जेंडर की समस्या मानकर नहीं छोड़ा जा सकता। यह दरअसल हमारे समूचे सामाजिक ताने-बाने के बीमार होने का एक गंभीर अलार्म है। सशक्तिकरण का सच्चा अर्थ केवल महिलाओं को आर्थिक या राजनीतिक रूप से मजबूत बनाना नहीं है, बल्कि उन्हें एक ऐसा सुरक्षित और तनावमुक्त माहौल देना भी है जहां वे मानसिक रूप से शांत और संतुलित रह सकें।यदि हमें इस पारिवारिक और सामाजिक बिखराव को रोकना है, तो परिवार के स्तर पर पुरुषों को अपनी मानसिकता बदलनी होगी और घरेलू जिम्मेदारियों में बराबर का हाथ बंटाना होगा ताकि महिलाओं पर से दोहरा बोझ कम हो सके। इसके साथ ही, मानसिक स्वास्थ्य को लेकर समाज में बैठी झिझक को तोड़ना होगा। स्कूलों, कॉलेजों और कार्यस्थलों पर ‘स्ट्रेस रिलीफ’ और काउंसलिंग सत्रों को अनिवार्य किया जाना चाहिए। हमें समझना होगा कि एक शांत, गरिमापूर्ण और अहिंसक समाज का निर्माण तभी संभव है, जब उस समाज की रीढ़ कही जाने वाली महिलाएं मानसिक और भावनात्मक रूप से स्वस्थ और सुरक्षित महसूस करेंगी।