अंतिम दवा

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा

शहर के उस आखिरी छोर पर बनी भूरी इमारत के बाहर कोई चमकीला साइनबोर्ड नहीं था। वहाँ केवल एक धुंधला सा शीशा टंगा था जिस पर लिखा था कि यहाँ खोई हुई चीजों का इलाज होता है। अंदर की हवा में सूखी गेंदे के फूलों और पुरानी कॉपियों की एक ऐसी गंध घुली थी जो सीधे अतीत के किसी बंद कमरे का दरवाजा खोल देती थी। काउंटर के पीछे एक बूढ़ा आदमी बैठा था जिसकी आँखें ठहर चुकी थीं। वह अपनी कांपती उंगलियों से कांच की छोटी शीशियों को तरतीब से लगा रहा था। उन शीशियों के भीतर कोई तरल पदार्थ नहीं था बल्कि उनमें सिर्फ एक खालीपन दिखाई देता था। एक युवक ने हाँफते हुए दुकान के भीतर कदम रखा। उसकी आँखें रोते-रोते सूज चुकी थीं और उसका पूरा वजूद किसी फटे हुए लिफाफे की तरह बिखर रहा था। उसने काउंटर पर दोनों हाथ टिका दिए। वह हांफते हुए बोला “क्या आपके पास ऐसी कोई दवा है जो मेरे सीने के इस भारीपन को हमेशा के लिए शांत कर दे” बूढ़े ने बिना नजरें उठाए एक पारदर्शी शीशी को कपड़े से पोंछा। उसने अत्यंत शांत स्वर में कहा “यहाँ हर तरह के मर्ज की खुराक मिलती है पर इसकी कीमत बहुत भारी है” युवक की आँखों से एक आंसू टपक कर काउंटर के मटमैले शीशे पर फैल गया। उसने जेब से कुछ मुड़े हुए नोट निकाले और आगे बढ़ा दिए। वह रोते हुए बोला “मैं अपनी पूरी जमापूँजी देने को तैयार हूँ बस मुझे इस दर्द से मुक्ति दिला दो” बूढ़े ने नोटों को छुआ तक नहीं और गहरी सांस लेकर खिड़की से बाहर देखने लगा जहाँ रात धीरे-धीरे पैर पसार रही थी।वहाँ का सन्नाटा इतना गहरा था कि घड़ी की टिक-टिक भी किसी के दिल के टूटने की आवाज जैसी लग रही थी। दुकान के भीतर की अलमारियाँ अजीब तरह से वर्गीकृत थीं। एक कोने में लिखा था कि यह टूटे हुए वादों का हिस्सा है और दूसरी तरफ लिखा था कि यहाँ अधूरी मुलाकातों का मलबबा रखा जाता है। युवक ने एक शीशी को छूना चाहा तो बूढ़े ने उसे टोक दिया। बूढ़े ने कहा “इन्हें मत छुओ इनमें उन लोगों का रुदन बंद है जो यहाँ से अपनी यादें बेचकर जा चुके हैं” युवक ने अपनी शर्ट की आस्तीन से आँखों को पोंछा। वह बोला “क्या कोई अपनी यादें भी बेच सकता है” बूढ़े ने सिर हिलाया। उसने कहा “जब यादें नासूर बन जाएँ तो उन्हें शरीर से अलग करना ही एकमात्र रास्ता बचता है” युवक काउंटर के पास लगी लकड़ी की बेंच पर ढह गया। उसका रोना अब सिसकियों में बदल चुका था। उसने अपनी दास्तान सुनानी शुरू की। उसने कहा “मैं उससे बहुत प्यार करता था हमने साथ जीने के सपने देखे थे पर कल सुबह उसने बिना कुछ कहे मेरा हाथ छोड़ दिया और एक ऐसी दुनिया में चली गई जहाँ से कोई वापस नहीं आता” उसकी आवाज का दर्द उस बंद कमरे की दीवारों से टकराकर वापस लौट रहा था। उपमाओं के धनी उस बूढ़े ने युवक को देखा जिसकी हालत उस पेड़ जैसी थी जो हरी पत्तियों के रहते ही भीतर से सूख चुका हो।बाहर सड़क पर गाड़ियों का शोर था पर दुकान के भीतर एक मुकम्मल खामोशी पसरी थी। संवादों का यह सिलसिला जैसे किसी पुरानी डायरी के पन्नों को पलटने जैसा था। युवक ने पूछा “इस शीशी को पीने के बाद क्या मैं सचमुच सब कुछ भूल जाऊंगा” बूढ़े ने काउंटर के नीचे से एक मटमैली पुड़िया निकाली। उसने कहा “तुम उसे पूरी तरह भूल जाओगे उसका चेहरा उसकी आवाज उसका नाम और वह सब कुछ जो तुम्हारे बीच हुआ था पर याद रखना कि इस विस्मृति के बाद तुम्हारे भीतर कुछ भी शेष नहीं बचेगा” युवक ने पुड़िया को अपने हाथ में ले लिया। उसकी उंगलियाँ थरथरा रही थीं। उसने कहा “मुझे कुछ भी नहीं बचाना है यह दर्द मेरे फेफड़ों को गला रहा है मुझे सांस लेने में तकलीफ होती है” बूढ़े की आँखों में भी एक अजीब सी नमी तैरने लगी थी जैसे वह कोई दुकानदार नहीं बल्कि खुद उस दर्द का एक हिस्सा हो जिसे वह बेच रहा था। भाषा की सरलता में छिपी वह पीड़ा पाठक के कलेजे को चीरने के लिए काफी थी। वहाँ रखा हर एक बिंब चीख रहा था। अलमारी में रखी एक शीशी अचानक खुद-ब-खुद चटक गई मानो वह उस युवक के दुख का बोझ सहन नहीं कर पाई हो।read more:https://pahaltoday.com/road-development-in-farrukhabad-gains-momentum-comprehensive-review-of-action-plan-for-2026-27/रात के दस बज चुके थे और दुकान की बत्तियाँ मद्धम होने लगी थीं। युवक ने उस पुड़िया को खोलने के लिए हाथ आगे बढ़ाया ही था कि उसकी नजर काउंटर के बगल में रखे एक बड़े आईने पर पड़ी। आईने पर धूल की मोटी परत जमी थी जिसके पार कुछ भी साफ नहीं दिख रहा था। उसने बूढ़े से पूछा “यह आईना यहाँ क्यों रखा है” बूढ़े ने एक ठंडी आह भरी। उसने कहा “यह आईना केवल उन्हें सच दिखाता है जो अपनी यादों का कत्ल करने के लिए तैयार हो जाते हैं” युवक ने उठकर अपने कांपते हाथों से उस आईने की धूल को साफ करना शुरू किया। जैसे-जैसे धूल हट रही थी उसकी धड़कनें तेज होती जा रही थीं। उसने आईने में जो देखा उसे देखकर उसकी रुलाई फूट पड़ी। आईने के भीतर उसका अपना अक्स नहीं था बल्कि उसमें उस लड़की की धुंधली तस्वीर दिख रही थी जिसे वह खो चुका था। वह लड़की रो रही थी और उसके हाथ में भी बिल्कुल वैसी ही एक मटमैली पुड़िया थी। युवक ने चिल्लाकर कहा “यह क्या तमाशा है वह इस आईने के भीतर क्या कर रही है” बूढ़े ने अपनी आँखें बंद कर लीं और उसकी पलकों के कोनों से आँसू बहने लगे।कमरे की हवा अब और भारी हो चुकी थी जैसे वहाँ कोई अदृश्य मातम फैल गया हो। युवक पागलों की तरह उस आईने को पीटने लगा। उसने बूढ़े का कॉलर पकड़ लिया। उसने गुस्से और रुलाई के मिले-जुले स्वर में कहा “मुझे सच बताओ वरना मैं इस पूरी दुकान को आग लगा दूंगा” बूढ़े ने धीरे से युवक का हाथ अपने कॉलर से हटाया। उसने बहुत ही मर्मस्पर्शी आवाज में कहा “तुम जिसे ढूंढ रहे हो वह कहीं और नहीं गई है बल्कि वह कल सुबह इसी दुकान में आई थी” युवक जड़ हो गया। उसका हाथ हवा में ही ठहर गया। उसने पूछा “वह यहाँ क्यों आई थी” बूढ़े ने काउंटर पर रखी उस खाली शीशी की तरफ इशारा किया। उसने कहा “वह भी तुम्हारी तरह इस बेइंतहा मोहब्बत के दर्द से थक चुकी थी वह अपनी जिंदगी से तुम्हें मिटाने आई थी ताकि वह शांति से जी सके” युवक का पूरा शरीर कांपने लगा। उसने पुड़िया को फर्श पर फेंक दिया। उसने कहा “इसका मतलब उसने वह दवा पी ली और वह मुझे भूल गई” बूढ़े ने ना में सिर हिलाया। उसकी आँखों से गिरते आँसू अब काउंटर पर बह रहे थे।बूढ़े ने युवक के गालों पर अपने हाथ रखे। उसने अत्यंत करुण स्वर में कहा “नहीं मेरे बच्चे उसने दवा नहीं पी थी बल्कि उसने अपनी मौत के बदले तुम्हारी यादों को इस दुकान में गिरवी रख दिया था ताकि तुम जिंदा रह सको” युवक ने चिल्लाकर कहा “तो फिर मैं कौन हूँ और तुम कौन हो” बूढ़े ने आईने की तरफ इशारा किया जहाँ अब उस लड़की का चेहरा पूरी तरह साफ हो चुका था और वह मुस्कुरा रही थी। बूढ़े ने कहा “तुम कल सुबह ही अपनी जान दे चुके हो और यह जो तुम खुद को जिंदा समझ रहे हो यह सिर्फ उस लड़की की बची हुई यादें हैं जो इस दुकान में बैठकर अपने वजूद के मिटने का इंतजार कर रही हैं और मैं कोई दुकानदार नहीं हूँ बल्कि मैं तुम्हारा वह अफसोस हूँ जो कभी खत्म नहीं होगा” युवक ने अपने हाथों को देखा तो वे हवा में धुएं की तरह बिखरने लगे थे। आईने के भीतर की लड़की ने अपनी पुड़िया खोली और उसे पी लिया। जैसे ही उसने दवा पी उधर काउंटर पर खड़ा वह युवक पूरी तरह हवा में विलीन हो गया। दुकान की अलमारियों की सारी शीशियाँ एक साथ टूट गईं और पूरे कमरे में सिर्फ उस लड़की की सिसकियों की आवाज गूँजने लगी जो अब हमेशा के लिए सब कुछ भूल चुकी थी।

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