सौरभ वार्ष्णेय
भारत में सार्वजनिक जीवन से जुड़े संगठनों की पारदर्शिता का प्रश्न समय-समय पर उठता रहा है। हाल ही में कर्नाटक के गृह मंत्री प्रियंका खरगे द्वारा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की फंडिंग, आय-व्यय, संपत्तियों और कर अनुपालन की जानकारी सार्वजनिक करने की मांग ने एक नई बहस को जन्म दिया है। प्रश्न यह है कि क्या यह केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का हिस्सा है या वास्तव में लोकतांत्रिक व्यवस्था में पारदर्शिता से जुड़ा गंभीर मुद्दा? लोकतंत्र में पारदर्शिता किसी भी संस्था की विश्वसनीयता का महत्वपूर्ण आधार होती है। राजनीतिक दलों, गैर-सरकारी संगठनों, धार्मिक संस्थाओं और सामाजिक संगठनों से अपेक्षा की जाती है कि वे अपने वित्तीय स्रोतों और व्यय का स्पष्ट लेखा-जोखा रखें। यदि कोई संगठन समाज और सार्वजनिक नीति पर व्यापक प्रभाव रखता है, तो उसके वित्तीय संचालन को लेकर प्रश्न उठना स्वाभाविक माना जा सकता है। दूसरी ओर, आरएसएस स्वयं को एक सांस्कृतिक और सामाजिक संगठन बताता है, न कि राजनीतिक दल। संघ का कहना रहा है कि उसकी गतिविधियां स्वयंसेवकों के सहयोग और समाज से प्राप्त योगदान के आधार पर संचालित होती हैं तथा वह कानून के अनुसार आवश्यक अनुपालनों का पालन करता है। संघ के समर्थकों का तर्क है कि केवल आरएसएस को निशाना बनाना राजनीतिक प्रेरणा से प्रेरित प्रतीत होता है, जबकि देश में हजारों अन्य सामाजिक, धार्मिक और वैचारिक संगठन भी सक्रिय हैं। यहीं से यह मुद्दा राजनीतिक रंग ले लेता है। चूंकि आरएसएस को व्यापक रूप से भारतीय जनता पार्टी की वैचारिक प्रेरणा का स्रोत माना जाता है, इसलिए उसके वित्तीय मामलों पर उठने वाले सवाल अक्सर राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन जाते हैं। विपक्ष इसे जवाबदेही का प्रश्न बताता है, जबकि समर्थक इसे वैचारिक विरोध का परिणाम मानते हैं। वास्तविकता यह है कि पारदर्शिता की मांग को केवल राजनीति कहकर खारिज नहीं किया जा सकता। यदि किसी संगठन की गतिविधियां व्यापक सामाजिक और राष्ट्रीय प्रभाव रखती हैं, तो उसके वित्तीय ढांचे के बारे में जानकारी सार्वजनिक होने से जनता का विश्वास बढ़ सकता है। लेकिन यह सिद्धांत केवल आरएसएस पर ही नहीं, बल्कि सभी बड़े सामाजिक, धार्मिक, वैचारिक और राजनीतिक संगठनों पर समान रूप से लागू होना चाहिए। भारत में समस्या यह है कि पारदर्शिता की मांग अक्सर चयनात्मक दिखाई देती है।read more:https://pahaltoday.com/the-ceasefire-will-have-global-implications-for-energy-the-economy-and-diplomacy-which-will-be-a-relief-for-the-general-public/जब सवाल केवल विरोधी विचारधारा वाले संगठनों पर उठाए जाते हैं और अपने निकट संगठनों पर नहीं, तब मांग की निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न लग जाता है। इसलिए आवश्यक है कि वित्तीय पारदर्शिता के लिए एक समान और सार्वभौमिक मानक विकसित किया जाए, जो सभी संस्थाओं पर समान रूप से लागू हो।
आरएसएस की फंडिंग और संपत्तियों को सार्वजनिक करने की मांग में राजनीति का तत्व अवश्य मौजूद है, क्योंकि यह एक राजनीतिक संदर्भ में उठाई गई है। किंतु इसके मूल में छिपा पारदर्शिता और जवाबदेही का प्रश्न लोकतंत्र के लिए गंभीर और महत्वपूर्ण विषय है। लोकतंत्र में किसी भी संस्था की विश्वसनीयता उसके कार्यों के साथ-साथ उसकी पारदर्शिता से भी तय होती है। इसलिए बहस का केंद्र किसी एक संगठन को घेरना नहीं, बल्कि सभी प्रभावशाली संस्थाओं के लिए समान जवाबदेही सुनिश्चित करना होना चाहिए। यही लोकतांत्रिक मूल्यों और सुशासन की वास्तविक कसौटी है।
लोकतंत्र में पारदर्शिता और जवाबदेही किसी भी बड़े संगठन की विश्वसनीयता को मजबूत करती है। जब राजनीतिक दलों, गैर-सरकारी संगठनों , ट्रस्टों और कंपनियों से वित्तीय विवरण सार्वजनिक करने की अपेक्षा की जाती है, तब स्वाभाविक रूप से इतने बड़े प्रभाव वाले संगठन के संबंध में भी यही मांग उठती है। समर्थकों का तर्क है कि यदि संघ अपनी आय के स्रोत, दानदाताओं की श्रेणियां, संपत्तियों का विवरण और कर संबंधी अनुपालन की जानकारी सार्वजनिक करता है, तो इससे उसके प्रति जनता का विश्वास और अधिक बढ़ेगा। दूसरी ओर, संघ का पक्ष यह रहा है कि वह स्वयं को एक स्वैच्छिक सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन मानता है और कानून के तहत जिन सूचनाओं को उपलब्ध कराना आवश्यक है, उनका पालन करता है। संघ से जुड़े विभिन्न ट्रस्ट, सेवा संस्थान और शैक्षणिक संगठन अलग-अलग कानूनी ढांचे के अंतर्गत कार्य करते हैं तथा आवश्यक वित्तीय विवरण संबंधित सरकारी एजेंसियों को उपलब्ध कराते हैं। विवाद का मूल प्रश्न केवल आरएसएस तक सीमित नहीं है। यह व्यापक रूप से उन सभी बड़े सामाजिक, धार्मिक और वैचारिक संगठनों पर लागू होता है जिनका सार्वजनिक जीवन पर प्रभाव पड़ता है। लोकतंत्र में पारदर्शिता का सिद्धांत कहता है कि जनहित से जुड़े बड़े संस्थानों को अपनी वित्तीय और प्रशासनिक व्यवस्था के बारे में अधिक खुलापन दिखाना चाहिए। वहीं संगठनात्मक स्वतंत्रता का सिद्धांत यह भी कहता है कि किसी संस्था पर कानून से परे अतिरिक्त दबाव नहीं डाला जाना चाहिए। ऐसे में संतुलित दृष्टिकोण यही होगा कि सरकार सभी बड़े सामाजिक, धार्मिक और वैचारिक संगठनों के लिए समान पारदर्शिता मानक विकसित करे। यदि किसी संगठन को कर छूट, सार्वजनिक दान या व्यापक सामाजिक प्रभाव का लाभ प्राप्त है, तो उसके वित्तीय और प्रशासनिक विवरणों का एक न्यूनतम स्तर तक सार्वजनिक होना लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप माना जा सकता है। यह बहस किसी एक संगठन के पक्ष या विपक्ष की नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक पारदर्शिता, जवाबदेही और संस्थागत विश्वास को मजबूत करने की है। जितनी अधिक पारदर्शिता होगी, उतना ही सार्वजनिक विश्वास बढ़ेगा और लोकतंत्र की जड़ें भी उतनी ही मजबूत होंगी।