जनादेश के विश्वास पर कुठारा घात ।स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से देश के तमाम राजनीतिक दलों ने दल बदल के इतने अलग-अलग उदाहरण पेश किए हैं कि जनता का राजनीतिक पार्टियों और राजनेताओं से विश्वास और भरोसा धीरे-धीरे कम होता जा रहा है। इतने खर्चीले चुनाव के बाद मिले जनादेश का अर्थ केवल सीटों की संख्या नहीं यह करोड़ों नागरिकों की सामूहिक इच्छा का सम्मान है। दल-बदल उसी जनादेश को छिन्न-भिन्न कर देता है। जनता ने जिस दल को विपक्ष में बैठने का दायित्व दिया था, उसके प्रतिनिधि यदि सत्ता में शामिल हो जाएँ, या जिन पर सरकार चलाने का भरोसा किया गया था वे दूसरी दिशा में चले जाएँ, तो मतदाता स्वयं को ठगा हुआ और असहाय महसूस करता है। लोकतंत्र की सबसे बड़ी पूँजी विश्वास और भरोसा है, और दल-बदल उसी विश्वास और भरोसे पर बड़ा आघात करता है।भारतीय संविधान की दसवीं अनुसूची के माध्यम से दल-बदल विरोधी कानून प्रभावशाली किया गया था ताकि निर्वाचित प्रतिनिधि निजी लाभ के लिए जनादेश का सौदा न कर सकें। किंतु समय के साथ राजनीतिक दलों ने ऐसे सुगम मार्ग खोज लिए जिनसे कानून की भावना बेबस पड़ गई। सामूहिक टूट, विलय और तकनीकी व्याख्याओं ने कानून की आत्मा को कई बार निष्प्रभावी बना दिया। परिणाम यह हुआ कि कानून मौजूद है, पर राजनीतिक नैतिकता लगातार कमजोर होती चली गई।लोकतंत्र की रक्षा केवल न्यायालय, संविधान या चुनाव आयोग नहीं कर सकते। लोकतंत्र का वास्तविक प्रहरी वह जनप्रतिनिधि है जो अपने अंतःकरण के प्रति ईमानदार हो। यदि किसी सांसद या विधायक को सचमुच अपनी पार्टी की नीतियों से गंभीर वैचारिक असहमति है, तो लोकतांत्रिक मर्यादा यही कहती है कि वह पहले अपने पद से त्यागपत्र दे, फिर नए दल के टिकट पर जनता के बीच जाकर नया जनादेश प्राप्त करे। यदि जनता उसे पुनः चुनती है, तो वही उसकी वैध राजनीतिक स्वीकृति होगी। बिना इस्तीफा दिए दल बदलना नैतिक रूप से जनादेश का अपमान है।आज राजनीति में सत्ता साधन नहीं, साध्य बनती जा रही है। मंत्री पद, राजनीतिक संरक्षण और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएँ कई बार जनहित से ऊपर दिखाई देती हैं। यही कारण है कि चुनाव के समय कटु विरोधी रहे नेता सत्ता की संभावनाएँ बनते ही एक-दूसरे के साथ खड़े दिखाई देते हैं। ऐसे दृश्य लोकतंत्र की गरिमा को कमज़ोर करते हैं और युवाओं के मन में राजनीति के प्रति अविश्वास पैदा करते हैं।भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। इसलिए यहाँ लोकतांत्रिक मर्यादाओं का स्तर भी सबसे ऊँचा होना चाहिए।लोकतंत्र केवल सरकार बनाने की व्यवस्था नहीं है, बल्कि यह जनता के विश्वास, राजनीतिक नैतिकता और जनादेश की पवित्रता पर टिका हुआ एक जीवंत तंत्र है। मतदाता जब मतदान करता है, तो वह केवल किसी व्यक्ति को नहीं चुनता, बल्कि उसके विचार, उसकी पार्टी, उसकी नीतियों और उसके सार्वजनिक वचनों पर अपना विश्वास व्यक्त करता है। इसलिए निर्वाचित प्रतिनिधि का दल बदलना केवल राजनीतिक घटना नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक आस्था पर गहरा आघात है। आज भारतीय राजनीति में दल-बदल की प्रवृत्ति जिस गति से बढ़ रही है, वह चिंता का विषय है। अनेक राज्यों में चुनाव के बाद सरकारों का स्वरूप जनादेश से कम और राजनीतिक जोड़-तोड़ से अधिक तय होता दिखाई देता है। कभी सत्ता पक्ष के विधायक विपक्ष में चले जाते हैं, तो कभी विपक्ष के सांसद सत्तारूढ़ दल का दामन थाम लेते हैं। यह प्रवृत्ति किसी एक दल तक सीमित नहीं है; लगभग सभी दल अवसर मिलने पर इसका लाभ उठाते रहे हैं। इसलिए यह किसी दल का नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्कृति के क्षरण का प्रश्न है। मूलत राजनीति का आधार विचारधारा होती है।read more:https://pahaltoday.com/us-iran-ceasefire-a-positive-step/कोई दल राष्ट्रवाद की बात करता है, कोई समाजवाद की, कोई सामाजिक न्याय की, तो कोई क्षेत्रीय अस्मिता की। किंतु जब वही नेता कुछ दिनों बाद विपरीत विचारधारा वाले दल में जाकर उसी के गुणगान करने लगते हैं, तब स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि क्या विचारधारा इतनी सस्ती है कि सत्ता के एक अवसर पर बदल जाए, यदि ऐसा है, तो चुनावी घोषणापत्र, सार्वजनिक भाषण और जनता से किए गए वादे केवल राजनीतिक अभिनय बनकर रह जाते हैं।जनादेश का अर्थ केवल सीटों की संख्या नहीं है; यह करोड़ों नागरिकों की सामूहिक इच्छा का सम्मान है। दल-बदल उसी जनादेश को विकृत कर देता है। जनता ने जिस दल को विपक्ष में बैठने का दायित्व दिया था, उसके प्रतिनिधि यदि सत्ता में शामिल हो जाएँ, या जिन पर सरकार चलाने का भरोसा किया गया था वे दूसरी दिशा में चले जाएँ, तो मतदाता स्वयं को ठगा हुआ महसूस करता है। लोकतंत्र की सबसे बड़ी पूँजी विश्वास है, और दल-बदल उसी विश्वास का क्षरण करता है।भारतीय संविधान की दसवीं अनुसूची के माध्यम से दल-बदल विरोधी कानून बनाया गया था ताकि निर्वाचित प्रतिनिधि निजी लाभ के लिए जनादेश का सौदा न कर सकें। किंतु समय के साथ राजनीतिक दलों ने ऐसे रास्ते खोज लिए जिनसे कानून की भावना कमजोर पड़ गई। सामूहिक टूट, विलय और तकनीकी व्याख्याओं ने कानून की आत्मा को कई बार निष्प्रभावी बना दिया। परिणाम यह हुआ कि कानून मौजूद है, पर राजनीतिक नैतिकता लगातार कमजोर होती चली गई।लोकतंत्र की रक्षा केवल न्यायालय, संविधान या चुनाव आयोग नहीं कर सकते। लोकतंत्र का वास्तविक प्रहरी वह जनप्रतिनिधि है जो अपने अंतःकरण के प्रति ईमानदार हो। यदि किसी सांसद या विधायक को सचमुच अपनी पार्टी की नीतियों से गंभीर वैचारिक असहमति है, तो लोकतांत्रिक मर्यादा यही कहती है कि वह पहले अपने पद से त्यागपत्र दे, फिर नए दल के टिकट पर जनता के बीच जाकर नया जनादेश प्राप्त करे। यदि जनता उसे पुनः चुनती है, तो वही उसकी वैध राजनीतिक स्वीकृति होगी। बिना इस्तीफा दिए दल बदलना नैतिक रूप से जनादेश का अपमान है. आवश्यकता इस बात की है कि दल-बदल कानून को और प्रभावी बनाया जाए। यदि कोई सांसद या विधायक स्वेच्छा से दल बदलता है, तो उसकी सदस्यता स्वतः समाप्त हो तथा उसे अनिवार्य रूप से पुनः चुनाव लड़कर जनता का विश्वास प्राप्त करना पड़े। जनादेश किसी व्यक्ति की निजी संपत्ति नहीं, बल्कि जनता की धरोहर है। साथ ही, राजनीतिक दलों को भी आत्ममंथन करना होगा। केवल दूसरे दलों के नेताओं का स्वागत करने की संस्कृति लोकतंत्र को स्वस्थ नहीं बनाएगी। यदि सभी दल सिद्धांतों को प्राथमिकता दें और अवसरवाद को अस्वीकार करें, तभी राजनीति का नैतिक स्तर ऊँचा उठ सकेगा।इस पूरी प्रक्रिया में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका मतदाता की है। लोकतंत्र में अंतिम निर्णय जनता के हाथ में होता है। यदि मतदाता बार-बार दल बदलने वाले नेताओं को चुनाव में अस्वीकार करना शुरू कर दे, तो राजनीति का चरित्र स्वतः बदल जाएगा। लोकतंत्र केवल संविधान की किताबों से नहीं चलता; वह नागरिकों की सजगता और जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही से जीवित रहता है। सत्ता का आकर्षण क्षणभंगुर है, परंतु जनविश्वास शाश्वत होता है। इतिहास ने उन नेताओं को ही सम्मान दिया है जिन्होंने पद से अधिक सिद्धांतों को महत्व दिया। कुर्सियाँ बदलती रहती हैं, सरकारें आती-जाती रहती हैं, लेकिन लोकतंत्र तब मजबूत हो सकता है जब तक उसके प्रतिनिधि जनादेश को ईश्वर के समान पवित्र मानें।आज आवश्यकता किसी व्यक्ति या दल की आलोचना करने की नहीं, बल्कि राजनीति की उस सोच को बदलने की है जिसने सिद्धांतों को सौदेबाज़ी और जनादेश को गणित में बदल दिया है। यदि समय रहते इस प्रवृत्ति पर अंकुश नहीं लगाया गया, तो लोकतंत्र का संकट विपक्ष की कमजोरी या सत्ता की ताकत नहीं होगा, बल्कि राजनीतिक चरित्र का पतन होगा।लोकतंत्र संसद की दीवारों से नहीं, जनप्रतिनिधियों की निष्ठा से जीवित रहता है। जिस दिन सत्ता से बड़ा सिद्धांत और पद से बड़ा जनादेश हो जाएगा, उसी दिन भारतीय लोकतंत्र अपनी वास्तविक गरिमा को पुनः प्राप्त कर लेगा।