अनिकेत सिंह
हर एक के हाथ में फोन है और हर फोन में सोशल मीडिया है। सोशल मीडिया आज के हाईटेक समय का एक ऐसा अनिवार्य अनिष्ट बन गया है, जिससे बच पाना लगभग असंभव हो गया है। स्टैंडअप कॉमेडी और रील्स के नाम पर जो कुछ परोसा जा रहा है, उसे देखकर बारबार यह सवाल उठता है कि क्या समाज की संवेदनाएं इतनी कुंद हो चुकी हैं कि अब किसी भी विषय पर हंसी-मजाक करना सामान्य माना जाने लगा है? क्या लाज-शर्म, संस्कार, मर्यादा और सामाजिक जिम्मेदारी जैसी बातें अब अप्रासंगिक हो गई हैं? आए दिन सोशल मीडिया पर किसी न किसी पोस्ट, वीडियो या टिप्पणी को लेकर विवाद खड़े होते रहते हैं। कुछ समय तक हंगामा चलता है, लोग विरोध करते हैं, फिर संबंधित व्यक्ति माफी मांग लेता है और मामला मानो खत्म हो जाता है। लेकिन क्या सचमुच माफी मांग लेने से सब कुछ समाप्त हो जाता है?
हाल ही में स्टैंडअप कॉमेडियन प्रणित मोरे के लाइव कॉमेडी शो ‘क्राउड वर्क’ में हुई दो घटनाओं ने लोगों को गहरे स्तर पर झकझोर दिया है। पहली घटना एक युवा वेब डेवलपर द्वारा अपनी प्रेमिका को खिलाई गई 370 रुपए की बिरयानी की कीमत ‘वसूल’ करने की बात से जुड़ी है, जबकि दूसरी घटना एक मेडिकल छात्रा डाक्टर द्वारा देहदान में प्राप्त मृत शरीरों के निजी अंगों को लेकर की गई आपत्तिजनक टिप्पणी से संबंधित है। दोनों ही घटनाएं सामाजिक संवेदनशीलता, नैतिकता और मानवीय गरिमा के प्रश्नों को सामने लाती हैं। मुंबई के एक प्रतिष्ठित अस्पताल की मेडिकल छात्रा डाक्टर सेजल पवार ने कॉमेडियन प्रणित मोरे से बातचीत के दौरान बताया कि मेडिकल कालेज की एनाटॉमी क्लास में जब पुरुषों के शव अध्ययन के लिए लाए जाते हैं, तब वे और उनके साथी छात्र मृत शरीरों के निजी अंगों के आकार को लेकर मजाक करते हैं। जिस तरह की बातें उन्होंने सार्वजनिक मंच पर कही, उन्हें दोहराना भी असहजता पैदा करता है। आश्चर्यजनक यह था कि मंच पर मौजूद कॉमेडियन भी इस पर हंस रहे थे और इसे मनोरंजन का हिस्सा बना रहे थे। यह केवल एक असंवेदनशील टिप्पणी नहीं थी, बल्कि मेडिकल एथिक्स और मानवीय गरिमा का खुला उल्लंघन भी था। जो लोग देहदान करते हैं, वे किसी निजी स्वार्थ के लिए नहीं, बल्कि चिकित्सा शिक्षा, शोध और समाजहित के लिए अपना शरीर समर्पित करते हैं। यह एक अत्यंत सम्माननीय और प्रेरणादायक कार्य है। ऐसे लोगों के प्रति इस तरह की टिप्पणियां न केवल उनका अपमान हैं, बल्कि उन हजारों लोगों की भावनाओं को भी आहत करती हैं, जो भविष्य में देहदान करने का विचार रखते हैं।read more:https://pahaltoday.com/in-which-direction-are-raghav-chadhas-political-steps-moving-he-seems-interested-in-forming-his-own-party/ यदि किसी पुरुष डाक्टर ने किसी महिला के मृत शरीर के बारे में ऐसी टिप्पणी की होती तो संभवतः समाज की प्रतिक्रिया कहीं अधिक तीखी होती। यही कारण है कि इस घटना ने व्यापक असंतोष और आलोचना को जन्म दिया। बाद में डाक्टर सेजल पवार ने सार्वजनिक रूप से माफी मांगते हुए अपनी गलती स्वीकार की, लेकिन सवाल यह है कि क्या केवल माफी मांग लेने से उस मानसिकता का प्रभाव समाप्त हो जाता है, जो ऐसी बातों को मनोरंजन का विषय मानती है? दूसरी घटना भी कम चिंताजनक नहीं है। 23 वर्षीय वेब डेवलपर हिमांशु जांगड़ा ने उसी शो में अपनी प्रेमिका के साथ हुई एक डेट का अनुभव साझा करते हुए बताया कि उसने लड़की को 370 रुपए की चिकन बिरयानी खिलाई थी। बाद में जब लड़की ने उसे घर छोड़ने के लिए कहा, तो उसने मजाकिया अंदाज में कहा कि उसे उस बिरयानी की कीमत ‘वसूल’ करनी थी। इसके बाद उसने लड़की को एक बगीचे में ले जाकर उसके साथ जो कुछ किया, उसका विवरण उसने बेहद बेशर्मी और गर्व के साथ सार्वजनिक मंच पर सुनाया। मंच पर मौजूद लोग और स्वयं कॉमेडियन इस बात पर हंसते रहे, यहां तक कि उसे इनाम भी दिया गया। यह केवल एक घटिया मजाक नहीं था, बल्कि महिलाओं और उनकी भावनाओं का घोर अपमान था। इस तरह की बातें युवाओं के बीच किस प्रकार की सोच को जन्म देती हैं, इसका अंदाजा लगाना कठिन नहीं है। यदि किसी लड़की पर किए गए खर्च को इस प्रकार ‘वसूल’ करने की मानसिकता को हास्य के रूप में प्रस्तुत किया जाएगा, तो यह रिश्तों की गरिमा, सहमति के महत्व और स्त्री सम्मान जैसे मूल्यों को कमजोर ही करेगा। इस घटना के बाद जिस कंपनी में हिमांशु जांगड़ा कार्यरत था, वहां से उसे नौकरी से निकाल दिया गया। वहीं प्रणित मोरे की भूमिका पर भी गंभीर सवाल उठे, क्योंकि उन्होंने न केवल ऐसी बातों को मंच दिया, बल्कि उन्हें प्रोत्साहित भी किया। आज सोशल मीडिया पर ऐसे कंटेंट की भरमार है, जिसमें सेक्स, गालियां, अश्लीलता और व्यक्तिगत अपमान को हास्य का पर्याय बना दिया गया है। कई तथाकथित कॉमेडियन अपनी लोकप्रियता बढ़ाने के लिए पत्नी, परिवार, रिश्तों और सामाजिक मूल्यों तक का मजाक उड़ाने से नहीं हिचकते। पिछले वर्ष एक चर्चित सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर द्वारा माता-पिता के संबंधों को लेकर की गई अनुचित टिप्पणी भी इसी प्रवृत्ति का उदाहरण थी। धीरे-धीरे निर्मल हास्य और स्वस्थ व्यंग्य की जगह सस्ते और अश्लील मनोरंजन ने ले ली है। सोशल मीडिया पर गालियां देने वाले, अभद्र हरकतें करने वाले और सनसनी फैलाकर फॉलोअर्स जुटाने वाले लोगों की बड़ी फौज खड़ी हो गई है। चिंता की बात केवल इतनी नहीं है कि ऐसा कंटेंट बनाया जा रहा है, बल्कि यह भी है कि लाखों लोग उसे देख रहे हैं, पसंद कर रहे हैं और साझा कर रहे हैं। जो लोग ऐसे कंटेंट को लगातार प्रोत्साहित करते हैं, उनकी जिम्मेदारी भी कम नहीं है। यदि समाज बिना सोचे-समझे हर चीज को मनोरंजन मानकर स्वीकार करता रहेगा, तो संवेदनशीलता, नैतिकता और सामाजिक जिम्मेदारी जैसे मूल्य धीरे-धीरे कमजोर पड़ते जाएंगे। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं हो सकता कि किसी की गरिमा, भावनाओं या सामाजिक मूल्यों की कीमत पर कुछ भी कहा या किया जाए। जिस दिशा में सोशल मीडिया और तथाकथित कॉमेडी का एक बड़ा हिस्सा बढ़ रहा है, वह केवल चिंताजनक ही नहीं, बल्कि भविष्य के लिए खतरनाक और जोखिम भरा संकेत भी है।