मुख्य अतिथि बनने के अचूक उपाय

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा
साहित्यिक आयोजनों की सबसे बड़ी और कड़वी खूबी यह होती है कि वहाँ मुख्य अतिथि का चयन ज्ञान के तराजू पर तौलकर नहीं, बल्कि आयोजकों द्वारा अपने स्वार्थ की मलाई चाटने के उपक्रम से तय किया जाता है। मंच पर बैठे उस तथाकथित मसीहा को बुलाने के पीछे एक पूरा व्यापारिक गणित छिपा होता है। मसलन यदि वह सरकारी गलियारों में तगड़ी पैठ रखता है, तो आयोजक मंडल उसके तलवे इस उम्मीद में चाटता है कि भविष्य में उनके कई रुके हुए सरकारी टेंडर, जमीन के कागजात और अवैध निर्माण के काम मक्खन की तरह पूरे हो जाएँगे। यदि वह मुख्य अतिथि किसी बड़ी धनराशि वाले साहित्यिक सम्मान की मानद समिति में बैठा है, तो आयोजक उसे पान-इलायची खिलाकर मन ही मन उस मलाईदार पुरस्कार और उसकी मोटी रकम को हथियाने का चक्रव्यूह रच रहे होते हैं। अगर मुख्य अतिथि महोदय किसी नामचीन अखबार या पत्रिका के बड़े संपादक निकल गए, तो मंच पर उनकी आरती इस लालच में उतारी जाती है कि अगले रविवार के अंक में आयोजकों की दो कौड़ी की घिसी-पिटी रचनाएँ पहले पन्ने पर सज जाएँगी। और यदि वह व्यक्ति ज्ञान से पूरी तरह पैदल लेकिन नोटों से लबालब भरा कोई धनाढ्य सेठ हुआ, तो उसे मंच पर केवल इसलिए बिठाया जाता है ताकि कार्यक्रम के तंबू, कुर्सियों, समोसों और मुख्य अतिथि के खुद के बुके का खर्च ‘स्पॉन्सर’ के रूप में उसी की जेब से हँसते-हँसते झटक लिया जाए। आज की शाम भी कुछ ऐसी ही स्वार्थ-गंगा में गोता लगाने वाली थी, जहाँ हिंदी जगत के महाप्राण सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की स्मृतियों में एक विराट गोष्ठी का आयोजन किया गया था, जहाँ मुख्य अतिथि को निराला के ‘छंद’ से ज्यादा अपनी ‘साख’ और आयोजकों के ‘धंधे’ से सरोकार था। लब्बोलुआब यही है कि मुख्य अतिथि का चयन उसके रुतबे के वजन को देखकर किया जाता है। मंच के केंद्र में विराजमान मुख्य अतिथि महोदय की शारीरिक मुद्रा किसी मध्ययुगीन सम्राट से कम नहीं लग रही थी। उन्होंने एक पैर पर दूसरा पैर इस तरह से चढ़ा रखा था मानो पूरी दुनिया का भूगोल उनके एक घुटने के नीचे दबा हो। उनके चेहरे पर छाई गंभीर रहस्यमयी मुस्कान को देखकर नीचे बैठे श्रोता भ्रम में थे कि वे कविता की गहराई समझ रहे हैं या फिर मन ही मन रात के भोजन के मेनू का हिसाब लगा रहे हैं। वे बार-बार अपने कुर्ते की आस्तीन को ऊपर चढ़ाते और सामने खड़े कैमरामैन को तिरछी नजरों से देखकर एक ऐसी फोटोजेनिक मुद्रा धारण कर लेते जिसे देखकर अच्छे-अच्छे अभिनेता भी पानी भरने लगें। उनकी आँखों में एक ऐसा आत्मसंतोष तैर रहा था जो केवल उसी व्यक्ति के चेहरे पर आ सकता है जिसने जीवन में कभी किसी पुस्तक के दो पन्ने लगातार पलटने का कष्ट न उठाया हो।read more:https://pahaltoday.com/pm-modi-explained-the-importance-of-every-vote-and-said-that-everyone-should-use-their-vote/जब भी कोई वक्ता मंच पर निराला जी के छंदों की विवेचना करता तो मुख्य अतिथि महोदय इस तरह से अपना सिर हिलाते मानो निराला जी रोज़ सुबह उनके घर आकर अपनी कविता का पहला ड्राफ्ट उन्हें सुनाते थे और उनसे हरी झंडी मिलने के बाद ही उसे छपने के लिए भेजते थे। सच्चाई यह थी कि उन्हें निराला जी के बारे में उतनी ही जानकारी थी जितनी एक साधारण बिल्ली को अंतरिक्ष विज्ञान के सिद्धांतों के बारे में होती है मगर अपनी इस अज्ञानता को वे अपनी राजसी मुखमुद्राओं के पीछे इस तरह छिपा रहे थे कि सारा सभागार उनके इस मौन पानाडित्य के सामने नतमस्तक दिखाई दे रहा था।
जब मुख्य अतिथि महोदय को भाषण के लिए आमंत्रित किया गया तो उन्होंने सबसे पहले अपने चश्मे को उतारकर जेब से निकाले रेशमी रूमाल से अत्यंत धीमेपन के साथ साफ करना शुरू किया क्योंकि मंच पर आने के बाद सीधे बोलना शुरू कर देना नौसिखियों की निशानी माना जाता है। उन्होंने पोडियम पर दोनों हाथ टिकाए और पूरे सभागार को इस तरह से निहारा जैसे कोई शेर अपनी शिकारगाह में हिरणों के झुंड को देखता है। उन्होंने अपने कंठ को दो-तीन बार साफ किया और एक गंभीर भारी आवाज में बोले “साथियों जैसा कि आप जानते हैं निराला जी कवि थे, कवि ही नहीं बल्कि बड़े कवि थे, जैसा कि मेरे पूर्व वक्ताओं ने कहा भी है, वे बहुत अच्छी कविताएँ लिखते थे इसलिए उनकी कविताएँ पाठ्यक्रमों में भी पढ़ाई जाती हैं।” इस ऐतिहासिक उद्घाटन वाक्य को सुनते ही अग्रिम पंक्ति में बैठे कुछ चाटुकारों ने इस तरह से तालियाँ बजाईं मानो उन्हें ब्रह्मांड का कोई परम सत्य मिल गया हो। मुख्य अतिथि महोदय ने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए श्रोताओं को सम्बोधित किया “अब जो कविताएँ विद्यालयों, महाविद्यालयों में पढ़ाई जाती हों, वो अच्छे तो होंगी ही और जब कवितायें अच्छी होंगी तो इन्हें लिखने वाला कैसा होगा, आप सब लोग एक साथ बताइये।” इस पर पूरी भीड़ ने अपनी बची-कुची चेतना को समेटते हुए एक स्वर में चिल्लाकर उत्तर दिया “अच्छा”। मुख्य अतिथि ने मंच पर पानी का गिलास उठाया और एक घूंट पीकर ऐसे देखा मानो उन्होंने कोई बहुत बड़ा युद्ध जीत लिया हो और इस सीधी साधी बात को निराला साहित्य का सबसे बड़ा शोध पत्र बनाकर पेश कर दिया हो।इसके बाद मुख्य अतिथि महोदय ने अपने भाषण के उस तरकश से तीर निकालना शुरू किया जिसके दम पर वे जीवन भर बिना एक भी पन्ना पढ़े हर बड़े मंच के मसीहा बने फिरते थे। उन्होंने बिना पढ़े मंच लूटने का पहला अचूक नियम लागू किया जिसे साहित्य की भाषा में विषयांतर की कला कहा जाता है। उन्होंने कहा “मित्रों, असली कवि वह नहीं होता जो केवल महलों की बात करे बल्कि असली कवि वह होता है जो धरती से जुड़ा हो और निराला जी तो इतने जमीनी थे कि उन्होंने कुकुरमुत्ते पर भी कविताएँ लिखी हैं, उन्हें कुकुरमुत्तों से बहुत प्रेम था, जहाँ भी उन्हें कुकुरमुत्ता दिखता वे वहीं कविताएँ लिखने बैठ जाते थे।” इस अद्भुत और अलौकिक रहस्योद्घाटन को सुनकर सभागार के अंतिम छोर पर बैठे एक बुजुर्ग साहित्यकार के हाथ से उनकी डायरी छूटकर नीचे गिर गई मगर मुख्य अतिथि महोदय अपनी ही रौ में बहते जा रहे थे। उन्होंने बिना ज्ञान के मंच पर दहाड़ने के उस शाश्वत नियम का प्रदर्शन किया जिसके तहत वक्ता अपनी अज्ञानता को समय की कमी का बहाना बनाकर एक गरिमापूर्ण विदाई में बदल देता है। उन्होंने अपनी कलाई घड़ी की तरफ बेहद नाटकीय अंदाज में देखा और चेहरे पर एक गहरी चिंता की लकीरें खींचते हुए बोले “मित्रो मैं निराला पर और भी बहुत कुछ बोलता मगर समय बहुत हो चुका है और आप सब भी ऊब गए होंगे इसलिये आज बस इतना ही, आगे फिर कभी आप मौका देंगे तो उनके बारे में ऐसी ऐसी बातें बताऊँगा जो स्वयं निराला जी को भी पता नहीं रही होंगी।read more:https://pahaltoday.com/retired-officers-house-in-up-notes-everywhere-currency-found-scattered-everywhere/जय हिन्द, जय भारत।”मुख्य अतिथि महोदय का यह भाषण दरअसल उन तमाम अकादमिक सूत्रों का एक जीवंत संकलन था जो बिना किसी तैयारी के किसी भी गोष्ठी को पूरी तरह से वश में करने के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं। जब किसी वक्ता को विषय की हवा भी न लग रही हो तो उसका सबसे पहला अचूक फॉर्मूला यही होता है कि वह अपने पूर्ववर्ती वक्ताओं के नामों की एक लंबी सूची तैयार करे और उन सभी की बातों का अंधाधुंध समर्थन करना शुरू कर दे। दूसरा नियम यह कहता है कि जब आपके पास कहने को कुछ न हो तो आप जनता से सीधे सवाल पूछना शुरू कर दें जिससे श्रोताओं को लगता है कि वे किसी व्याख्यान में नहीं बल्कि किसी सामूहिक विमर्श का हिस्सा हैं और वे उत्साह में आकर तालियाँ पीटने लगते हैं। तीसरा सूत्र यह है कि विषय से जुड़े किसी भी एक अजीबो-गरीब शब्द को पकड़कर उसे पूरे भाषण का केंद्र बिंदु बना दिया जाए जैसा कि महोदय ने कुकुरमुत्ते के साथ किया जिससे गंभीर चर्चा भी एक झटके में बेहद लोक-लुभावन और मनोरंजक बन जाती है। चौथे नियम के अनुसार वक्ता को अपनी शारीरिक भाषा को इतना आक्रामक और आत्मविश्वास से भरपूर रखना चाहिए कि सुनने वाले को अपने ही ज्ञान पर शक होने लगे कि कहीं उसने ही निराला जी को गलत तो नहीं पढ़ लिया है। पाँचवाँ और सबसे महत्वपूर्ण नियम यह है कि भाषण के अंत में एक ऐसा रहस्यमयी सस्पेंस छोड़ दिया जाए जिससे लोगों के भीतर यह उत्सुकता बनी रहे कि इस व्यक्ति के पास ज्ञान का कोई ऐसा गुप्त खजाना है जो आज समय की कमी के कारण बाहर नहीं आ पाया और इस तरह एक अज्ञानी व्यक्ति भी मंच से परम ज्ञानी बनकर विदा होता है।इस पूरे तमाशे के दौरान मंच के ठीक नीचे बैठी जनता की हालत देखने लायक थी जो इस अद्भुत बौद्धिक जुगाली को पचाने की कोशिश में लगातार अपनी आँखें मटका रही थी। सामने की पंक्ति में बैठे विभागाध्यक्ष महोदय अपनी गर्दन को इस तरह से हिला रहे थे मानो वे मुख्य अतिथि के हर एक खोखले वाक्य की गहराई में डूबकर सीधे पाताल लोक पहुँच चुके हों। कुछ नौजवान छात्र जो केवल समोसों और चाय के लालच में इस गोष्ठी की शोभा बढ़ाने आए थे वे इस कुकुरमुत्ता पुराण को सुनकर अपनी हँसी को रोकने के लिए अपने मुँह पर रूमाल दबाए बैठे थे। मुख्य अतिथि महोदय का आत्मविश्वास इस स्तर पर पहुँच चुका था कि वे अपनी हर एक मूर्खतापूर्ण पंक्ति के बाद जनता की तरफ इस तरह देखते थे मानो वे उनसे अपनी इस अभूर्व वैचारिक खोज के लिए किसी राष्ट्रीय पुरस्कार की उम्मीद कर रहे हों। उन्होंने अपने भाषण के दौरान अपने दोनों हाथों को हवा में इस तरह से लहराया जैसे वे निराला जी की कविताओं के सारे छंदों को हवा में ही पकड़कर सीधे जनता की झोली में डाल रहे हों। पूरी सभा में तालियों की गड़गड़ाहट इस बात का प्रमाण नहीं थी कि लोगों को उनका भाषण पसंद आया था बल्कि वह इस बात का सामूहिक उत्सव था कि आखिरकार यह महाभाषण समाप्त हुआ और अब मंच से मुक्ति मिलने का समय आ गया है।साहित्यिक मंचों पर अपनी धाक जमाने का एक और अचूक नुस्खा यह भी होता है कि आप विषय के मूल तत्व को छुए बिना उसके चारों तरफ शब्दों की ऐसी जलेबी बनाना शुरू कर दें कि सुनने वाला खुद ही रास्ता भटक जाए। मुख्य अतिथि महोदय ने इस कला में भी महारत हासिल कर रखी थी क्योंकि उन्होंने निराला जी के दर्शन या उनकी प्रगतिशीलता पर एक शब्द भी बोले बिना केवल उनकी पाठ्यपुस्तकीय उपस्थिति को आधार बनाकर अपना पूरा महल खड़ा कर दिया था। जब वे बोल रहे थे तो उनकी आँखें कभी छत की कड़ियों को निहारतीं तो कभी अचानक सामने बैठे किसी सीधे-साधे श्रोता पर टिक जातीं जिससे वह बेचारा डर के मारे अपनी रीढ़ की हड्डी सीधी करके बैठ जाता कि कहीं मुख्य अतिथि जी अगला सवाल सीधे उसी से न पूछ लें। इस प्रकार का भाषण दरअसल उन लोगों के लिए एक वरदान की तरह होता है जो बिना किसी अध्ययन के समाज के हर क्षेत्र में अपनी चौधराहट कायम रखना चाहते हैं और अपनी अज्ञानता को एक आभूषण की तरह पहनकर घूमते हैं। मंच पर बैठे अन्य विशिष्ट अतिथि भी इस कला से भली-भाँति परिचित थे इसलिए वे भी मुख्य अतिथि की हर एक हास्यास्पद बात पर अपनी आँखें बंद करके इस तरह से मुस्कुरा रहे थे मानो वे किसी महान सूफी संत के प्रवचन का आनंद ले रहे हों।इस अभूतपूर्व भाषण के समापन के बाद जब मुख्य अतिथि महोदय वापस अपनी सोफ़ानुमा कुर्सी पर आकर बैठे तो उनके चेहरे पर एक ऐसी चमक थी जो केवल किसी बड़े साम्राज्य को जीतने के बाद किसी राजा के चेहरे पर आ सकती है। उन्होंने तुरंत जेब से अपना चमचमाता हुआ मोबाइल निकाला और सामने खड़े फोटोग्राफर को इशारा किया कि वह उनके इस विजयी मुद्रा की कुछ तस्वीरें विभिन्न कोणों से खींच ले ताकि वे इसे तुरंत अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर साझा कर सकें। उन्होंने मंच पर रखे पानी के पूरे गिलास को एक ही सांस में खाली कर दिया मानो कुकुरमुत्ते पर दिए गए इस ऐतिहासिक भाषण ने उनके भीतर के सारे ज्ञान के सोतों को पूरी तरह से सुखा दिया हो। नीचे बैठे श्रोता अभी भी इस सदमे से उबरने की कोशिश कर रहे थे कि उन्होंने निराला जी के बारे में क्या सुना और क्या समझा मगर मुख्य अतिथि को इसकी कोई परवाह नहीं थी क्योंकि उनका काम मंच लूटना था जो वे बेहद शालीनता और धूर्तता के साथ बखूबी अंजाम दे चुके थे। पूरा वातावरण इस समय एक ऐसे अजीबोगरीब सन्नाटे और दबी हुई हँसी के बीच झूल रहा था जिसकी कल्पना शायद स्वयं निराला जी ने भी अपनी सबसे क्लिष्ट कविताओं को लिखते समय कभी नहीं की होगी।कार्यक्रम के ठीक बाद वीआईपी लाउंज में मुख्य अतिथि महोदय के लिए विशेष जलपान की व्यवस्था की गई थी। वहाँ पहुँचते ही शहर के एक अति-उत्साही पत्रकार ने हाथ में माइक लेकर मुख्य अतिथि को घेरा और बड़े ही भोलेपन के साथ पूछा “सर आज का आपका व्याख्यान तो निराला साहित्य की नई दिशा तय करने वाला था लेकिन क्या आप हमारे दर्शकों को बताएँगे कि निराला जी का वह कौन सा कुकुरमुत्ता था जिससे वे सबसे ज्यादा प्रभावित थे और क्या आज के दौर में भी वह कुकुरमुत्ता प्रासंगिक है?” मुख्य अतिथि महोदय ने अपने कुर्ते को झटका, अपनी मूंछों पर ताव दिया और अत्यंत आत्मविश्वास के साथ पत्रकार के कंधे पर हाथ रखकर बोले “देखिए भाईसाहब, निराला जी मूल रूप से वनस्पति विज्ञान के बहुत बड़े डॉक्टर थे और उन्होंने जिस कुकुरमुत्ते की खोज की थी उसे आजकल के लोग अंग्रेजी में मशरूम कहते हैं, इसीलिए मैं रोज़ सुबह उठकर मशरूम का सूप पीता हूँ ताकि मेरे भीतर भी निराला जैसी काव्य ऊर्जा बनी रहे और रही बात प्रासंगिकता की तो आज बाज़ार में मशरूम दो सौ रुपये किलो बिक रहा है, इससे बड़ी प्रासंगिकता भला और क्या हो सकती है।” यह सुनते ही पास खड़ा वेटर समोसे की प्लेट समेटकर वहीं जमीन पर बैठ गया और पत्रकार महोदय अपना माइक छोड़कर लाउंज के कोने में जाकर दीवार पर सिर पीटने लगे जबकि मुख्य अतिथि महोदय बड़े चाव से काजू कतली चबाते हुए अगले किसी गोष्ठी में कबीरदास पर बोलने के लिए इंटरनेट पर उनके पिता का नाम खोजने में व्यस्त हो चुके थे।

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