डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा
सड़कों पर दौड़ते वाहन केवल वाहन नहीं होते, बल्कि चलती-फिरती दर्शनशास्त्र की यूनिवर्सिटी होते हैं। जब कोई नौसिखिया ड्राइवर अपनी चमचमाती कार में बैठकर स्टियरिंग थामता है तो उसे लगता है कि वह सड़क का सिकंदर है लेकिन असली ज्ञान तो उस खटारा ट्रक के पीछे लिखा होता है जो धुएं का गुबार छोड़ते हुए कहता है “मालिक की ज़िंदगी, चेले की ऐश… उड़ाओ कैश”। यह लाइन पढ़ते ही कार के गियर में हाथ लगाए बैठे मध्यमवर्गीय इंसान का सारा घमंड वैसे ही पिघल जाता है जैसे चिलचिलाती धूप में कुल्फी पिघलती है। हमारे देश की सड़कों पर ट्रैफिक रूल्स की कॉपियां भले ही धूल खा रही हों पर इन ट्रकों और ऑटो के पीछे लिखे जीवन के गहरे फलसफे हर आने-जाने वाले की आत्मा को झकझोर कर रख देते हैं। आप किसी भी बड़े शहर के चौराहे पर खड़े हो जाइए आपको यमराज की ड्यूटी और इंसानी मजबूरी का ऐसा लाइव कॉम्बिनेशन कहीं और देखने को नहीं मिलेगा जो इन गाड़ियों के बंपर पर मुफ्त में उपलब्ध रहता है। यह इस देश का सबसे सस्ता और टिकाऊ मनोरंजन है जिसे देखने के लिए किसी मल्टीप्लेक्स का टिकट नहीं कटाना पड़ता बस अपनी आंखें खुली रखनी पड़ती हैं।सड़क पर निकलते ही पहला मुकाबला उस बिरादरी से होता है जो जीवन को एक रेस समझती है और जिनकी गाड़ियों के पीछे लिखा होता है “धीरे चलोगे तो बार-बार मिलोगे, तेज़ चलोगे तो हरिद्वार मिलोगे”। इस एक लाइन में जीवन और मृत्यु का जो अद्भुत ककहरा सिखाया गया है उसे पढ़कर बड़े-बड़े संतों की समाधि भंग हो सकती है। लोग सुबह-सुबह ऑफिस जाने की जल्दी में अपनी बाइक को हवाई जहाज बनाने की कोशिश करते हैं तभी उनके सामने कोई ऐसा ही ऑटो आ जाता है जिसके पीछे बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा होता है “हँस मत पगली, प्यार हो जाएगा… ब्रेक मत मार, एक्सीडेंट हो जाएगा”। इसे पढ़कर अच्छे-अच्छे रोमियो अपनी गाड़ी की स्पीड चालीस से नीचे कर लेते हैं क्योंकि मोहब्बत और हाईवे दोनों में ही जब ब्रेक फेल होता है तो नुकसान सीधा दिल और बंपर का ही होता है। भारतीय सड़कों पर ड्राइविंग करना किसी युद्ध के मैदान में उतरने जैसा है जहाँ आपको हर मोड़ पर एक नई चुनौती का सामना करना पड़ता है। यहाँ यमराज किसी कोने में बैठकर चाय की चुस्की ले रहे होते हैं और उनके प्रतिनिधि के रूप में हमारी गाड़ियों के पीछे लिखा होता है “दम है तो पास कर, वरना बर्दाश्त कर”। यह सीधा सा संदेश उस पूरी व्यवस्था पर करारा तमाचा है जो हर वक्त आगे निकलने की अंधी दौड़ में अंधी हो चुकी है।
सच्ची मोहब्बत की तलाश में भटके हुए आशिकों के लिए तो ये गाड़ियां किसी मंदिर के चबूतरे जैसी हैं जहाँ हर टूटे दिल की दास्तान पेंट से लिखी होती है। जब कोई आशिक अपनी महबूबा की शादी के गम में देवदास बनने की बजाय ट्रक का ड्राइवर बन जाता है तो वह अपनी गाड़ी पर लिखवाता है “दिल दिया था जिसको, वो चली गई विप्रो, अब ढूँढ रहा हूँ उसको मेट्रो-मेट्रो”। यह महज़ एक शायरी नहीं बल्कि कॉरपोरेट जगत की उस कड़वी सच्चाई का दस्तावेज़ है जहाँ भावनाएं सैलरी पैकेज के सामने घुटने टेक देती हैं। ऐसी ही एक गाड़ी के पीछे जब लिखा मिलता है “तूने ठुकराया मेरा प्यार, अब देख मेरी कार का गियर” तो समझ आता है कि इश्क में मिला धोखा ही इंसान को बड़ा बिज़नेसमैन या फिर भारी वाहन का मालिक बनाता है। सड़कों पर चलता हुआ यह दर्द जब गियर के साथ बदलता है तो रात के सन्नाटे में हेडलाइट की रोशनी में एक और लाइन चमकती है “महबूबा की याद में, गियर बदला रात में”। इस देश के सारे आशिक अपनी नाकामी का जश्न इन सड़कों पर गाड़ियां दौड़ाकर मनाते हैं मानो उनका क्लच और ब्रेक ही उनके जीवन का एकमात्र सहारा बचा हो। प्यार में जुदाई झेल रहे इन जाबाँजों की बातें सुनकर तो पत्थर का दिल भी पिघल जाए और वह भी अपनी गाड़ी की डिक्की पर कुछ ऐसा ही लिखवाने को मजबूर हो जाए।आर्थिक मंदी और मध्यमवर्गीय परिवारों के संघर्ष की जो गाथा इन लोहे के शेरों पर लिखी होती है वह किसी अर्थशास्त्र की किताब में नहीं मिल सकती। जब एक आम आदमी बैंक से लोन लेकर अपने सपनों की गाड़ी सड़क पर उतारता है तो उसकी पहली प्रार्थना यही होती है “मालिक की दया, बैंक का कर्जा”। यह लाइन उस अंतहीन चक्रव्यूह को बयां करती है जिसमें फंसा इंसान हर महीने की तारीख आने से पहले ही कांपने लगता है। इसके ठीक बगल में कोई पुरानी खटारा गाड़ी अपनी जर्जर हालत पर हंसती हुई कहती है “ये मत देख कि कितनी पुरानी है, ये देख कि कितनी तूफानी है”। यह आत्मविश्वास ही इस देश की असली ताकत है जो संसाधनों की कमी के बावजूद आसमान छूने का हौसला रखता है। किश्तों के बोझ तले दबे हुए ड्राइवर्स का दर्द तब और गहरा हो जाता है जब उनकी गाड़ी के पीछे लिखा होता है “किश्तों पर ज़िंदा हूँ, मालिक का परिंदा हूँ”। यह पंक्तियां किसी बड़े कवि की कविता से कम नहीं हैं जो सीधे समाज के उस हिस्से पर रोशनी डालती हैं जो दिन-रात पसीना बहाकर देश का चक्का चलाता है। लोन पर ली गई गाड़ियों के मालिक जब दुनिया की बुरी नज़रों से परेशान होते हैं तो साफ लिख देते हैं “लोन पर ली है भाई, घूर कर नज़र मत लगा” जिससे बुरी नज़र वाले का मुंह खुद ही काला हो जाता है।इन वाहनों के पीछे छिपा शुद्ध देसी हास्य रस ऐसा होता है जो डिप्रेशन के मरीजों के लिए रामबाण इलाज की तरह काम करता है। किसी सिग्नल पर खड़े होकर जब अचानक नज़र पड़ती है “हॉर्न पो पो… दीदी गो गो” तो चेहरे पर हंसी की ऐसी लहर दौड़ जाती है जिसे रोकना नामुमकिन हो जाता है। यह लाइन हमारे समाज के उस स्टीरियोटाइप पर एक मीठा सा कटाक्ष है जो महिलाओं की ड्राइविंग को लेकर अक्सर चुटकुले बनाता रहता है। वहीं दूसरी तरफ पारिवारिक सुख और सामाजिक ताने-बाने को एक साथ समेटे हुए एक लंबा सा ट्रक कहता है “छोटा परिवार, सुखी परिवार… और ये लंबा ट्रक, सबका यार”। सड़कों पर चलने वाले इन मुसाफिरों का अपनी गाड़ियों से ऐसा रिश्ता होता है कि वे उन्हें महज़ मशीन नहीं बल्कि अपने जिगर का टुकड़ा समझते हैं। जब कोई मनचला अपनी गाड़ी को हवा में उड़ाने की कोशिश करता है तो उसे रोकने के लिए पीछे लिखा होता है “धीरे चलो, घर पर कोई इंतज़ार कर रहा है शायद बेलन लेकर”।read more:https://pahaltoday.com/three-deputy-superintendents-of-police-were-given-a-warm-farewell-and-their-work-was-appreciated-by-the-police-family/ यह बेलन का डर ही है जो इस देश के शादीशुदा पुरुषों को सुरक्षित घर पहुँचाने में पुलिस प्रशासन से ज़्यादा मददगार साबित होता है और सड़कों पर होने वाले हादसों को रोकता है।जीवन के परम ज्ञान और सस्पेंस की जो बातें इन गाड़ियों के पिछले हिस्से में छिपी होती हैं उन्हें समझने के लिए थोड़ी दार्शनिक दृष्टि की जरूरत होती है। जब आप अपनी गाड़ी को बहुत संभाल कर चला रहे होते हैं तभी सामने वाले ट्रक पर लिखा होता है “नज़र हटी, दुर्घटना घटी… सब्जी पूरी बंटी”। यह लाइन मौत के बाद होने वाले भोज की तरफ इतना सटीक इशारा करती है कि पढ़ने वाला तुरंत अपनी सीट बेल्ट और हेलमेट को ठीक करने लगता है। जीवन की नश्वरता को इससे बेहतर तरीके से कोई और नहीं समझा सकता जहाँ एक पल की लापरवाही आपको सीधे परलोक का टिकट दिला सकती है। समय के चक्र और इंसान की औकात को याद दिलाते हुए एक और सूक्ति वाक्य मिलता है “समय बलवान है, इंसान तो बस मेहमान है”। इन पंक्तियों को पढ़कर लगता है कि जैसे कोई सूफी संत अपनी कुटिया छोड़कर हाईवे पर ट्रक चलाने आ गया हो और लोगों को मोक्ष का रास्ता दिखा रहा हो। इसी सस्पेंस और चेतावनी के बीच जब लिखा मिलता है “आज नकद, कल उधार… गाड़ी पर लिखना मना है यार” तो समझ आता है कि इस आध्यात्मिक दुनिया के पीछे भी व्यापार का असली नियम पूरी कड़ाई से लागू होता है।छोटे वाहनों और दोपहिया गाड़ियों के पीछे का टशन तो बड़े-बड़े राजा-महाराजाओं के ठाट-बाठ को भी फीका कर देने का माद्दा रखता है। एक छोटा सा ऑटो रिक्शा जब संकरी गलियों से सांप की तरह बलखाते हुए निकलता है तो उसके पीछे लिखा होता है “ऑटो है छोटा, पर दिल है बड़ा”। यह लाइन उस ड्राइवर के स्वाभिमान को दर्शाती है जो भले ही रोज़ का चंद रुपया कमाता हो पर किसी अमीर की अमीरी के आगे झुकना नहीं जानता। वहीं कॉलेज जाने वाले किसी लड़के की बाइक पर जब लिखा होता है “नो गर्लफ्रेंड, नो टेंशन” तो साफ़ समझ आता है कि यह दिल टूटने के बाद का वैराग्य है जो बाइक की रफ्तार में तब्दील हो चुका है। चालान के डर से कांपते हुए इस दौर के युवाओं का दर्द भी गाड़ियों पर बखूबी उभर कर सामने आता है जब वे लिखवाते हैं “चालान से डर नहीं लगता साहब, खाली जेब से लगता है”। कानून के लंबे हाथों और ट्रैफिक पुलिस के कैमरों के बीच ये छोटी गाड़ियां अपनी आज़ादी का परचम लहराते हुए कहती हैं कि हवा से बातें करना और सड़कों से नाता जोड़ना ही इनका असली मक़सद है।सड़क का यह पूरा सफरनामा अजीबोगरीब घटना से होती है। हाईवे पर एक बहुत ही शानदार, महंगी और विदेशी स्पोर्ट्स कार फर्राटा भर रही होती है, जिसे देखकर ऐसा लगता है मानो वह सड़क पर नहीं बल्कि हवा में उड़ रही हो। उस कार का मालिक चश्मा चढ़ाए, स्टीयरिंग पर उंगलियां थिरकाते हुए खुद को दुनिया का शहंशाह समझ रहा होता है। तभी उसके आगे एक बहुत ही पुराना, जंग लगा हुआ और भयंकर काला धुआं छोड़ता हुआ कबाड़ ट्रक आ जाता है, जिसके पीछे बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा होता है “जो हमसे टकराएगा, वो सीधा गैरेज जाएगा”। स्पोर्ट्स कार का घमंडी मालिक उस खटारे को देखकर खीझ जाता है और उसे ओवरटेक करने के लिए लगातार हॉर्न पर हॉर्न बजाने लगता है। वह खिड़की से हाथ बाहर निकालकर चिल्लाता है “ए भाई! साइड हटा अपनी इस बैलगाड़ी को!”तभी वह खटारा ट्रक अचानक बीच सड़क पर रुक जाता है और उसके रुकते ही स्पोर्ट्स कार वाले को भी इमरजेंसी ब्रेक लगाने पड़ते हैं, जिससे उसकी कार के टायर चीख उठते हैं। कार का मालिक गुस्से में लाल-पीला होकर नीचे उतरता है और उस ट्रक के केबिन का दरवाज़ा खटखटाते हुए चिल्लाता है “बाहर निकल! गाड़ी चलानी नहीं आती तो रोड पर क्यों आ जाते हो?” जैसे ही ट्रक का खटखटाता हुआ दरवाज़ा चरमराकर खुलता है, अंदर से कोई साधारण ड्राइवर नहीं बल्कि खुद यमराज नीचे उतरते हैं। यमराज ने पैरों में हवाई चप्पल पहन रखी होती है, गले में गेंदे की सूखी माला होती है और हाथ में भैंसे की रस्सी की जगह एक चमचमाती डिजिटल चालान मशीन होती है। कार का मालिक उन्हें देखकर हक्का-बक्का रह जाता है और उसकी घिग्घी बंध जाती है।यमराज बड़े प्यार से मुस्कुराते हैं, उस अमीर लड़के के कंधे पर हाथ रखते हैं और ठेठ बनारसी अंदाज़ में कहते हैं “काहे इतना भौकाल टाइट कर रहे हो बाबू? बहुत देर से तुम हमारी गाड़ी के पीछे लिखी लाइनें पढ़ रहे थे न? अब जरा इस मशीन पर अपनी उंगली का अंगूठा लगाओ।” लड़का कांपते हुए पूछता है “प्रभु, आप यहाँ ट्रक चला रहे हैं?” यमराज हंसते हुए जवाब देते हैं “अरे भाई! धरती पर इतना ट्रैफिक और प्रदूषण हो गया है कि भैंसे को सांस लेने में दिक्कत होती है, इसलिए हमने भी लोन पर यह सेकंड हैंड ट्रक उठा लिया है। वैसे तुम्हारी कार का बीमा और तुम्हारी सांसों का परमिट दोनों ही आज इसी वक्त समाप्त हो चुके हैं, चलो अब चुपचाप पीछे वाले केबिन में बैठो, वहाँ पहले से ही तीन ओवरस्पीडिंग वाले आशिक बैठे ‘महबूबा की याद में’ गियर बदल रहे हैं!”