डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा
मई की उस तीखी दोपहर धूप इतनी नग्न थी कि जिला शिक्षा अधिकारी के दफ्तर की दीवार से चूना नहीं, गरिमा झड़ रही थी। तरुण श्रीवास्तव अपनी टूटी चप्पल की रबर को तागे से बांधते हुए काउंटर नंबर चार की जाली पर नाक सटाए खड़ा था। गणित में सौ में से सात नंबर पाकर वह हैरान नहीं था, वह तो बस उस क्लर्क की उंगलियों की रफ्तार देख रहा था जो पान चबाते हुए देश का भविष्य थूक रहा था। तरुण ने अपनी उत्तर पुस्तिका की दोबारा जांच के लिए प्रार्थना पत्र आगे बढ़ाया, तो क्लर्क ने उसे ऐसे देखा जैसे किसी ने लंगर में पनीर की सब्जी मांग ली हो। उसने बिना सिर उठाए कहा, “लड़के, ये सरकारी स्याही है, गंगाजल नहीं कि हर पापी को पवित्र कर दे।” तरुण की आंखों में आंसू नहीं, बारहवीं क्लास की पूरी मुफ़लिसी तैर गई, जिसने रातों को जागकर अपना खून सुखाया था। उसने धीमे से कहा, “सर, मेरी री-टोटलिंग कर दीजिए, मेरे घर में मां की दवाई के पैसे इसी वजीफे से आने थे।” क्लर्क ने जोर से हंसते हुए कहा, “बेटा, यहां दिल की री-टोटलिंग नहीं होती, जाओ घर जाकर हल चलाओ।”अगले दिन जब अखबार के कोने में एक छोटी सी खबर छपी कि एक मेधावी छात्र के नंबरों की हेराफेरी हुई है, तो शहर के नामचीन न्यूज चैनल ‘सत्य का तांडव’ के दफ्तर में हलचल मच गई। शाम आठ बजे स्टूडियो की बत्तियां ऐसे चमकीं जैसे किसी मुजरे की महफिल सजी हो। एंकर ने अपनी टाई सीधी की, चेहरे पर थूक की तरह चमकता राष्ट्रवाद पोता और कैमरे की तरफ उंगली तानकर चिल्लाया, “क्या शिक्षा तंत्र को बदनाम करने की ये कोई गहरी साजिश है।” पर्दे पर तरुण का सीधा-साधा, डरा हुआ चेहरा दिखाई दे रहा था। एंकर ने अपनी आवाज को पांचवें गियर में डालते हुए कहा, “यह लड़का जो खुद को श्रीवास्तव बता रहा है, क्या इसकी जड़ों के तार सरहद पार से नहीं जुड़े हैं।” स्टूडियो की वातानुकूलित हवा में देशभक्ति का ऐसा रायता फैला कि मर्यादा के सारे बर्तन टूट गए। तरुण अपनी मां का हाथ पकड़े टीवी स्क्रीन को देख रहा था, जहां उसकी अठारह साल की मेहनत को पल भर में बारूद की ढेरी पर बिठा दिया गया था। मुहल्ले के लोग जो कल तक तरुण को देखकर अपनी बेटियों को पढ़ने की नसीहत देते थे, अचानक अपनी खिड़कियां बंद करने लगे। परचून वाले गुप्ता जी ने उधार का नमक देने से मना कर दिया क्योंकि अब वह नमक देशद्रोही की सब्जी में उबलने वाला था। शाम को जब तरुण गली से निकला, तो कुछ लड़कों ने उसे देखकर नारा लगाया। तरुण रुक गया, उसने अपनी फटी जेब में हाथ डाला जहां स्क्रूटनी की रसीद रखी थी। उसने सामने खड़े अपने सबसे पक्के दोस्त से पूछा, “क्या तुम्हें भी लगता है कि मेरी कॉपी में पाकिस्तान का नक्शा बना था।” दोस्त ने थूकते हुए कहा, “भैया, टीवी झूठ नहीं बोलता।” बात इतनी छोटी सी थी, पर कलेजे को ऐसे चीर गई जैसे सूखी लकड़ी पर कुल्हाड़ी की मार। मां ने रात को चूल्हा नहीं जलाया क्योंकि गेंहू के आटे में अब साज़िश की बू आने लगी थी। दोनों चुपचाप अंधेरे कमरे में बैठे रहे, जहां सिर्फ एंकर की चीखें दीवार से टकराकर गूंज रही थीं। तरुण ने रोते हुए मां का पल्लू पकड़ लिया और सुबकने लगा। उसने कांपती आवाज में कहा, “मां, मुझे इस शहर में अब एक पल भी नहीं रहना, यह जगह इंसानों के रहने लायक नहीं है।” मां ने उसके आंसू पोंछते हुए ढांढस बंधाया,read more:https://pahaltoday.com/mohsina-kidwai-passes-away-an-era-has-come-to-an-end/“चल बेटा, हम अपने पुरखों के गांव लौट चलते हैं, वहां की मिट्टी अपने पराए का भेद नहीं करती।” तरुण जिद पर अड़ गया और रात में ही दोनों ने गांव की बस पकड़ ली। लेकिन शहर की केबल लाइनें और मोबाइल के टावर गांव की पगडंडियों से ज्यादा तेज निकले। सोशल मीडिया की जहरीली हवा वहां पहले ही पहुंच चुकी थी। सुबह जब दोनों गांव के अड्डे पर उतरे, तो चचेरे भाई ने गले लगाने के बजाय हाथ पीछे खींच लिए। पंचायत के चबूतरे पर कानाफूसी होने लगी और बूढ़े काका ने दूर से ही चिल्लाकर कहा, “हमारे गांव का पानी अपवित्र मत करो, अपनी गद्दारी की गंध वहीं शहर में छोड़कर आते।” सच्चाई की तलाश में जब शिक्षा बोर्ड के अध्यक्ष ने एक जांच कमेटी बैठाई, तो पाया गया कि कंप्यूटर के एक छोटे से वायरस की वजह से पांच हजार बच्चों के नंबर आपस में बदल गए थे। तरुण के वास्तव में निन्यानवे प्रतिशत नंबर थे, वह पूरे सूबे का टॉपर था। इस बात की आधिकारिक घोषणा करने के लिए बोर्ड ने एक भव्य प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई। चैनल ‘सत्य का तांडव’ का वही एंकर अपनी नई जैकेट पहनकर माइक संभाले सबसे आगे खड़ा था। उसने कैमरे पर अपनी गलती नहीं मानी, बल्कि एक नया कोण ढूंढ निकाला। उसने चिल्लाकर कहा, “देखिए हमारी पत्रकारिता का असर, कैसे एक भटके हुए नौजवान को मुख्यधारा में वापस लाया गया।” पूरा देश तालियां बजा रहा था, सोशल मीडिया पर बधाई के संदेशों की बाढ़ आ गई थी और लोग उस लड़के की तारीफों के कसीदे पढ़ रहे थे जिसने व्यवस्था की खामी को सुधारा था। एंकर अपने कैमरामैन के साथ सीधे तरुण के गांव की तरफ दौड़ा ताकि लाइव स्क्रीन पर उसकी मां के बहते हुए खुशी के आंसू दिखाकर टीआरपी का नया कीर्तिमान स्थापित किया जा सके। गांव के मुहाने पर भारी भीड़ जमा थी, लेकिन वहां उत्सव का माहौल नहीं था। एंकर माइक तानकर भीड़ को चीरते हुए आगे बढ़ा, जहां नीम के पुराने पेड़ से एक रस्सी लटक रही थी। तरुण ने अपनी ही शर्ट का फंदा बनाकर अपनी अठारह साल की जिंदगी को मुकम्मल कर लिया था। उसकी लाश के पैर जमीन से दो फीट ऊपर हवा में झूल रहे थे, और नीचे मिट्टी में गिरी उसकी जेब से वही री-टोटलिंग की रसीद हवा में फड़फड़ा रही थी। एंकर ने झिझकते हुए माइक तरुण की रोती हुई मां के मुंह के पास सटाया और कहा, “अरे, यह क्या हुआ, आपका बेटा तो टॉपर निकला, पूरा देश उसे ढूंढ रहा है।” मां ने पथराई आंखों से एंकर की तरफ देखा, उसकी फटी रसीद को उठाया और एंकर की चमचमाती जैकेट पर चिपकाते हुए कहा, “साहब, अब इस पर निन्यानवे नंबर नहीं, सौ नंबर लिख दो, क्योंकि उसने आज अपनी देशभक्ति का आखिरी इम्तहान भी पास कर लिया है।” एंकर का माइक हाथ से छूटकर गोबर में गिर गया और कैमरे का लेंस उस खाली फंदे पर टिक गया जो अब पूरी व्यवस्था को मुंह चिढ़ा रहा था।