दक्षिण एशिया की राजनीति में नदियाँ सिर्फ पानी का जरिया नहीं हैं, वे भूगोल को इतिहास से जोड़ती हैं और देशों की तक़दीर, बग़ावत व दोस्ती की इबारत लिखती हैं. पिछले दिनों बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी यानी सत्तारूढ़ पार्टी बीएनपी के कद्दावर नेता मिर्ज़ा फखरुल इस्लाम आलमगीर के एक तीखे बयान ने भारत और बांग्लादेश के कूटनीतिक गलियारों में एक बार फिर जल शतरंज़ की बिसात बिछा दी है. आलमगीर ने साफ शब्दों में चेतावनी दी है कि भविष्य में भारत और बांग्लादेश के द्विपक्षीय रिश्ते काफी हद तक गंगा जल बंटवारा समझौते के स्थायी समाधान पर निर्भर करेंगे. उन्होंने केवल एक अल्पकालिक या कामचलाऊ व्यवस्था को खारिज करते हुए आरोप लगाया कि भारत द्वारा साझा नदियों पर बनाए गए बांधों ने बांग्लादेश के प्राकृतिक जल प्रवाह को प्रभावित किया है, जिससे उनके देश के सामने एक बड़ा संकट खड़ा हो गया है.इस राजनीतिक बयानबाजी के पीछे की टाइमिंग और भूराजनीतिक हकीक़त को समझना बेहद जरूरी है, क्योंकि यह केवल एक पार्टी का बयान नहीं, बल्कि बदलते बांग्लादेश की नई राजनीतिक धुरी का संकेत है.भारत और बांग्लादेश के बीच नदी जल विवाद का सबसे बड़ा और कानूनी केंद्र बिंदु 1996 की गंगा जल संधि रही है. तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री एच.डी. देवेगौड़ा और बांग्लादेश की तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना के बीच हस्ताक्षरित यह ऐतिहासिक संधि 30 वर्षों के लिए थी, जिसकी समयसीमा इस साल के दिसंबर में समाप्त होने जा रही है.यही वजह है कि ढाका की राजनीति में इस समय पानी को लेकर उबाल चरम पर है. 1996 का समझौता फरक्का बैराज से पानी के बंटवारे का एक गणितीय फॉर्मूला तो तय करता है, लेकिन बांग्लादेश की बदली हुई आंतरिक परिस्थितियों में अब वहां की राजनीतिक ताकतें भारत से स्थायी, निर्बाध और संस्थागत गारंटी की मांग कर रही हैं. संधि के नवीनीकरण के मुहाने पर खड़ा यह साल दोनों देशों के राजनयिकों के लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है.भूगोल के अपरिवर्तनीय नियम के मुताबिक, भारत अपर रिपेरियन यानी ऊपरी बहाव वाला देश है और बांग्लादेश लोअर रिपेरियन यानी निचले बहाव वाला देश, जहाँ नदियां बंगाल की खाड़ी में मिलने से पहले पहुंचती हैं. दोनों देश आपस में लगभग 54 नदियां साझा करते हैं.बांग्लादेशी विश्लेषकों और विशेषकर बीएनपी का मुख्य आरोप रहा है कि सर्दियों और गर्मियों के दौरान भारत अपने बंदरगाहों, जैसे कोलकाता पोर्ट, को गाद से बचाने के लिए फरक्का पर पानी रोक लेता है, जिससे बांग्लादेश के हिस्से में सूखी रेत और कृषि संकट हो जाता है. इसके ठीक उलट, मानसून के दौरान जब भारत के जलाशय ओवरफ्लो होते हैं, तो अचानक पानी छोड़े जाने से बांग्लादेश के निचले इलाके विनाशकारी बाढ़ की चपेट में आ जाते हैं.read more:https://pahaltoday.com/on-the-instructions-of-mayawati-vipin-diwan-was-declared-the-bsp-candidate-from-assembly-59/मीठे पानी के प्रवाह में कमी के कारण बांग्लादेश के सुंदरवन और तटीय इलाकों में खारापन बढ़ रहा है, जिससे वहां की कृषि, मत्स्य पालन और पूरी इकोसिस्टम पर गहरा असर पड़ा है.गंगा समझौते के साथ साथ तीस्ता नदी का मुद्दा भी एक दशक से अधिक समय से सुलग रहा है. उत्तरी बांग्लादेश की जीवनरेखा मानी जाने वाली तीस्ता का जल समझौता साल 2011 में ही फाइनल होने वाला था, लेकिन भारत की आंतरिक राजनीति विशेषकर पश्चिम बंगाल सरकार के कड़े विरोध के कारण यह आज तक ठंडे बस्ते में है. भारतीय संविधान के तहत पानी राज्य का विषय होने के कारण केंद्र सरकार पश्चिम बंगाल की सहमति के बिना आगे बढ़ने में असमर्थ रही है.इसी गतिरोध का फायदा उठाने के लिए चीन लंबे समय से ताक में बैठा है. बीजिंग ने बांग्लादेश को तीस्ता नदी व्यापक प्रबंधन और बहाली परियोजना के लिए अरबों डॉलर के निवेश का प्रस्ताव दिया है. यदि भारत समय रहते पानी के इस संकट को नहीं सुलझाता है, तो रणनीतिक रूप से संवेदनशील इस क्षेत्र में चीन की एंट्री भारत की चिकन नेक यानी सिलिगुड़ी कॉरिडोर की सुरक्षा के लिए एक बड़ा सिरदर्द बन सकती है.अगस्त 2024 में शेख हसीना सरकार के पतन और अंतरिम व्यवस्था के बाद से बांग्लादेश की राजनीतिक धुरी पूरी तरह बदल चुकी है. अवामी लीग के दौर में भारत के साथ जो सुनहरा अध्याय था, उसकी जगह अब एक अधिक मुखर, संप्रभु और कभी कभी इंडिया आउट जैसे नैरेटिव से प्रभावित राजनीति ने ले ली है.मिर्ज़ा फखरुल इस्लाम आलमगीर का यह बयान केवल पानी के अधिकार की मांग नहीं है, बल्कि यह बांग्लादेश की घरेलू जनता को यह संदेश देने की राजनीतिक कवायद है कि नई व्यवस्था में ढाका, नई दिल्ली के सामने अपनी शर्तों पर बात करेगा. आगामी चुनावों को देखते हुए वहाँ की कोई भी राजनीतिक पार्टी अब भारत के प्रति नरम दिखने का जोखिम नहीं उठा सकती.यह एक स्थापित अंतरराष्ट्रीय सत्य है कि नदियां देशों को बांटने के लिए नहीं, बल्कि उन्हें जोड़ने के लिए बहती हैं. भारत और बांग्लादेश के संबंध केवल सरकारों के स्तर पर नहीं, बल्कि संस्कृति, इतिहास और भूगोल के स्तर पर जुड़े हैं. भारत की नेबरहुड फर्स्ट यानी पड़ोसी पहले की नीति की वास्तविक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह पड़ोस में आए इस राजनीतिक बदलाव को कितनी परिपक्वता से संभालता है.2026 में गंगा जल समझौते का एक ऐसा न्यायसंगत, वैज्ञानिक और स्थायी नवीनीकरण खोजना होगा, जो बांग्लादेश की जनता के अविश्वास को दूर कर सके और साथ ही भारत के घरेलू राज्यों के हितों की भी रक्षा करे. यदि नई दिल्ली और ढाका वॉटर डिप्लोमेसी के इस चक्रव्यूह को भेदने में सफल रहते हैं, तो यह पूरे दक्षिण एशिया के लिए उपक्षेत्रीय सहयोग की एक नई मिसाल बनेगा. अन्यथा, राजनीति के इस खेल में यदि नदियां यूं ही सूखती रहीं, तो अविश्वास की जो खाई खोदेगी, उसे पाटना भविष्य की पीढ़ियों के लिए मुमकिन नहीं होगा.