नई दिल्ली, । दिल्ली प्रदेश कांग्रेस कमेटी में पुराने नेता दरकिनार किए गए और जानाधार विहीन नेताओं को उपाध्यक्ष और महासचिव का पद दिया गया। दिल्ली में कांग्रेस आलाकमान ने खुद ही बंटाधार करने का बीड़ा उठा रखा है। दिल्ली कांग्रेस में लंबे समय से असंतोष व्याप्त है, जो मुख्य रूप से पार्टी के अंदरूनी कलह, बीते चुनाव में टिकट वितरण में असमानता, और शीर्ष नेतृत्व के फैसलों के प्रति नाराजगी से उपजा है।read more:https://pahaltoday.com/complaints-should-be-resolved-on-the-ground-and-not-on-paper-asp/ताजा हालात में इसी हफ्ते अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी ने दिल्ली कांग्रेस को पुनर्जीवित करने के लिए 12 उपाध्यक्षों और 26 महासचिवों की नियुक्ति की है। लेकिन इन नियुक्तियों में दिल्ली कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं की अनसुनी करने और ऐसे नेताओं को आगे लाने का प्रयास किया गया है, जो दिल्ली कांग्रेस में जान फूकना तो दूर की बार उसे पुनर्जीवित करने में किसी भी रूप में भूमिका अदा नहीं कर सकते। कांग्रेस के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि 2007 में जिस गुर्जर नेता और जमीनी समझ रखने चतर सिंह ने परिसीमन का खाँका खींचकर दिल्ली में कांग्रेस को जिंदा किया, पूर्व केंद्रीय मंत्री अजय माकन के बहुत गरीबी रहे उसी चतर सिंह को लंबे समय से दरकिनार किया जा रहा है। नई कमेटी में न कोई पंजाबी है, ना ही कोई सरदार। दिल्ली के ग्रामीण बहुल इलाके में लगातार मेहनत कर रहे डॉक्टर नरेश, दक्षिणी दिल्ली के पुराने कांग्रेसी नेता वीरेंद्र कसाना, पांच बार के विधायक रहे सुल्तानपुरी के मरहूम विधायक जय किशन, दिल्ली कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष चौधरी प्रेम सिंह के बेटे तक को किसी भी रूप में जगह नहीं मिली। यही नहीं कांग्रेस नेता पीएस बाबा, कालकाजी से लगातार निगम पार्षद रहे दलित नेता खविंद्र सिंह कैप्टन, पंजाबी बिरादरी के कद्दावर नेता और कई बार के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष, पूर्व विधायक सुभाष चोपड़ा और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अजय माकन के साथ पूर्व अनिल चौधरी के किसी भी कार्यकर्ताओं को प्रदेश कांग्रेस में जगह नहीं मिली। हां, यह अलग बात है कि इन कुछ वरिष्ठ नेताओं का मन रखने के लिए इन्हें पीएसी में जगह दे दी गई। लेकिन उनके कार्यकर्ताओं को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। पार्टी सूत्रों का कहना है कि बंगाल में कांग्रेस साफ हो गया। असम में स्थिति खराब हो गई। और पंजाब में अगले साल चुनाव होना है। ऐसे में कांग्रेस ने दिल्ली को मजबूत करने का ऐसा नकली काम किया है कि आने वाले चुनाव में कांग्रेस का जमीनी कार्यकर्ता आम आदमी पार्टी और भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो जाए तो उसमें कोई अचरज वाली बात नहीं होगी। सालों से पार्टी में काम करने वाले कुछ कार्यकर्ताओं पर कहना है कि कांग्रेस का बंटाधार यूं ही नहीं हुआ है। पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व कुछ ऐसे लोगों से घिरे पड़े हैं, जिसे जमीनी कार्यकर्ताओं की समझ नहीं है और इस हालत में बिना जनाधार वाले नेताओं को जगह देकर पार्टी को डूबाने का ठेका ले रखा है। दिल्ली में पार्टी के खराब प्रदर्शन और लगातार हार के बाद से यह असंतोष और गहरा गया है।असंतोष के प्रमुख कारण संगठनात्मक कमजोरी और निराशा है। लगातार तीन चुनावों में शून्य सीटें मिलने के बाद, कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं और जमीनी कार्यकर्ताओं में असंतोष बढ़ गया है, जो पार्टी की चुनावी रणनीति और संगठन की कमजोरी पर सवाल उठा रहे हैं। चुनाव के समय टिकट वितरण के दौरान अक्सर असंतोष सामने आता है, जिससे नेताओं के बीच नाराजगी का सिलसिला बना रहता है। कांग्रेस के अंदर ही यह दुविधा बनी रहती है कि वह गठबंधन की राजनीति करे या अकेले चुनाव लड़े, जिससे भ्रम की स्थिति पैदा होती है। कुछ नेताओं का मानना है कि पार्टी के शीर्ष नेतृत्व द्वारा जमीनी कार्यकर्ताओं की उपेक्षा की जा रही है। इससे यह स्थिति पैदा हो रही है।