लखनऊ : वैश्विक ऊर्जा अनिश्चितताओं और भू-राजनीतिक तनावों के चलते ईंधन आपूर्ति श्रृंखलाएं लगातार बाधित हो रही हैं। ऐसे में भारत को भू-तापीय ऊर्जा और प्राकृतिक हाइड्रोजन जैसे उभरते संसाधनों में निवेश तेज करके अपने ऊर्जा मिश्रण को और विविध बनाना होगा। यह बात एमआईटी वर्ल्ड पीस यूनिवर्सिटी यानी (एमआईटी-डब्लूपीयू) के वार्षिक भू-तापीय सम्मेलन मैग्मा 2026 में विशेषज्ञों ने एक स्वर में कही।read more:https://khabarentertainment.in/vitamin-d-and-future-brain-health-in-middle-age-a-study-based-analysis-dr-archita-mahajan/
भू-तापीय ऊर्जा की खोज और उत्पादन पर केंद्रित इस पांच दिवसीय विशेष कार्यशाला में दुनियाभर के 16 से अधिक संगठनों की भागीदारी रही। सेरोस एनर्जी, जो इस समय भारत की पुगा घाटी में भू-तापीय कुएं खोद रही है, इस कार्यक्रम की मुख्य प्रायोजक थी।इस कार्यक्रम का उद्घाटन मुख्य अतिथि के रूप में सेरोस एनर्जी के मैनेजिंग डायरेक्टर और सीईओ डॉ. आशीष अग्रवाल ने किया। उन्होंने कहा कि देश की ऊर्जा सुरक्षा के लिए भू-तापीय ऊर्जा का विकास बेहद जरूरी है और सेरोस इसके लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है।मैग्मा 2026 के समापन समारोह के मुख्य अतिथि और इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ पेट्रोलियम एंड एनर्जी के निदेशक डॉ. शालिवाहन ने कहा, “भारत में भू-तापीय ऊर्जा को उसकी स्थान-विशेष प्रकृति और ज्यादा खोज लागत को देखते हुए चरणबद्ध और जिम्मेदार तरीके से विकसित किया जा रहा है।